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जैविक सब्जियों की खेती  -बाबा मायाराम

“मैं अपनी छत पर सब्जियों की खेती करता हूं। गमले में या पुराने टूटे -फूटे टीन के डिब्बों में हरी सब्जियां लगाता हूं। पालक, मैथी, बैंगन, टमाटर, ककड़ी, लौकी, गिलकी, भिंडी लगी है। इससे हमारे परिवार को पूरे हफ्ते हरी ताजी सब्जियां मिलती हैं।” यह रोहना गांव के राजेश सामले थे, जो मध्यप्रदेश के होशंगाबाद में रहते हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता राजेश सामले होशंगाबाद जिले की सबसे पुरानी गांधीवादी संस्था ग्राम सेवा समिति से भी जुड़े हैं। वे न खुद जैविक सब्जी बाड़ी लगाते हैं बल्कि ग्राम सेवा समिति के माध्यम से गांवों में इसे बढ़ावा देते हैं, जैविक खेती का प्रशिक्षण देते हैं। इस संस्था ने एक जमाने में जब तवा बांध से दलदलीकरण की समस्या हुई थी तब मिट्टी बचाओ आंदोलन चलाया था।

राजेश सामले बताते हैं कि खेती में उनकी रूचि छुटपन से है। इस साल रबी के मौसम में बैंगन, टमाटर, पालक, मैथी, धनिया, अदरक, पुदीना, अजवाइन आदि सब्जी लगाई है। यह हरी ताजी सब्जियां परिवार की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त हैं। बारी-बारी से ताजी सब्जियां तोड़कर पूरे सप्ताह पकाकर खाते रहते हैं। 

उन्होंने बताया कि इससे उनकी प्रतिदिन 30 रूपए की बचत हो रही है।  अगर बाजार से सब्जी लानी पड़ती तो लगभग इतनी राशि खर्च हो जाती। यानी एक महीने में 900 रूपए की बचत होती है। यह उनके लिए बड़ी राशि है, क्योंकि वे उनका समय समाज कार्य में लगाते हैं और कोई अतिरिक्त काम नहीं करते, जिससे आय हो। वे यह खेती पूरी तरह देसी बीजों से करते हैं। और बिना रासायनिक खाद व कीटनाशक के सब्जियां उगाते हैं। गोबर व केंचुआ खाद का इस्तेमाल करते हैं और कीट लगने पर जैव कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं, जो वे स्वयं तैयार करते हैं।

राजेश सामले बताते हैं कि संस्था के कार्यकर्ताओं ने गांव- गांव जाकर देसी बीजों की तलाश की और उन्हें एकत्र किया। पारंपरिक देसी बीजों से जुड़ी जानकारी भी एकत्र की। देसी बीज बैंक बनाया। देसी बीज ऋतु के प्रभाव से पकते हैं, चाहे उन्हें देरी से बोया जाए, उनकी फसल समय पर ही पककर तैयार हो जाती है। जो बीज गांव में नहीं मिलते, उन्हें बाजार से भी खरीदा जाता है। 

वे आगे बताते हैं कि देसी बीज यानी प्राकृतिक बीजों की खास बात है कि उन्हें हर साल बदलना नहीं पड़ता। हर फसल के पकने पर उसमें से ही बचा लेते हैं। बाद में उन्हें सुखाकर बंद मिट्टी की हांडियों में व कोठियों में रख देते हैं और अगले साल उन्हें ही बो देते हैं। पारंपरिक रूप से भी गांवों में बीज संभाल कर रखते हैं।

उन्होंने बताया कि पारंपरिक देसी बीजों को किसान सैकड़ों पीढ़ियों से अपने खेतों में उगाते आए हैं। विविध तरह के बीज अलग-अलग परिवेश, मिट्टी पानी के हिसाब से विकसित किए गए हैं। इनसे जुड़ी खान-पान की तकनीक, रखरखाव की किसानों को अच्छी समझ है। बीज चयन से लेकर साफ-सफाई सभी कुछ किसान पीढ़ियों से करते आ रहे हैं। इसमें महिलाओं की प्रमुख भूमिका है। यह गांव समाज की साझी विरासत है। इसे बचाना जरूरी है। 
राजेश सामले बताते हैं कि सब्जी के कुछ बड़े बीज सीधे बो दिए जाते हैं। जैसे लौकी, तोराई, सेमी के बीज जमीन में बो दिए जाते हैं। जबकि कुछ बीजों की छोटी क्यारियों में पौध तैयार की जाती है। बैंगन, टमाटर व मिर्ची की पौध तैयार की जाती है। जब पौध थोड़ी बड़ी हो जाती है तब उसे उखाड़कर दूसरी जगह लगाते हैं। इसमें सावधानी यह बरतनी पड़ती है कि उनकी जड़ों को नुकसान न हो। पौधों को रोज पानी देने की जरूरत नहीं होती, उसके लिए नमी ही पर्याप्त है। गर्मी की सब्जियां ज्यादा पानी मांगती हैं।

उन्होंने बताया कि वैसे तो सब्जी बाड़ी की परंपरा पुरानी है। लेकिन कई कारणों से इसमें कमी आ रही थी। लेकिन ग्राम सेवा समिति की कोशिश है कि इसे फिर से पुनर्जीवित किया जाए।  
राजेश सामले सब्जी बाड़ी का काम करनेवाले अकेले नहीं हैं, इस काम में महिला समूहों की महिलाएं भी जुड़ी हैं। इससे 8 गांव की करीब 80 महिलाएं जुड़कर सब्जी बाड़ी का काम कर रही हैं। रोहना, पतलई, पलासी, देशमोहनी, बाईखेड़ी, बीसारोड़ा, चंद्रपुरा, निटाया गांव में यह काम किया जा रहा है। 

बाईखेड़ी गांव की सीताबाई ने बताया कि उनके बाड़े ( घर के पीछे की जगह) में साल भर सब्जी भाजी लगी रहती है। साथ ही बेर, नींबू, सीताफल, मुनगा, इमली, पपीता जैसे फलदार पेड़ भी लगे हैं। 
देशमोहनी गांव की बिटट्न बाई ने भी उनके बाड़े में 22 प्रकार की सब्जी-भाजी और फलदार पेड़ लगाए हैं। और अतिरिक्त होने पर इटारसी  जैविक बाजार में बेचते हैं।

ग्राम सेवा समिति के सुरेश दीवान ने बताया कि जैविक खेती करनेवाले किसानों के सामने चुनौती होती है कि उनके उत्पाद का उचित दाम नहीं मिलता। इसलिए हमने होशंगाबाद जिले के इटारसी शहर में जैविक बाजार की शुरूआत की है। इसमें नवाचार करनेवाले किसानों व जागरूक नागरिकों व नवधान्य संस्था ने भी मदद की है। यह वर्ष 2019 से शुरू हुआ है जिसमें होशंगाबाद, हरदा व बैतूल जिले के जैविक खेती करनेवाले किसान उत्पाद लाते हैं और बेचते हैं। यह बाजार हर रविवार को लगता है। इससे शहरी उपभोक्ताओं को भी जैविक उत्पाद उपलब्ध होते हैं और किसानों को भी आय होती है। इससे जैविक खेती के बारे में जागरूकता भी आती है। कोविड-19 की तालाबंदी के दौरान जैविक बाजार बंद था, पर अब इस साल फरवरी से फिर से शुरू हो गया है। 

कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि छत की खेती, सब्जी बाड़ी, जैविक खेती से लेकर देशी बीजों का संरक्षण, संवर्धन, जैविक उत्पाद बेचने का काम किया जा रहा है। फलदार पेड़ों से लोगों के भोजन में हरी ताजी सब्जियां और फल शामिल हो रहे हैं। बिना रासायनिक खाद व कीटनाशक के पूरी जैविक तरीके से सब्जियां मिल रही हैं। सब्जियों पर खर्च होनेवाली राशि की बचत हो रही है। जैविक बाजार से किसानों को उनकी फसल का उचित दाम भी मिल रहा है और शहरी उपभोक्ताओं को जैविक उत्पाद भी उपलब्ध हो रहे हैं। छत पर खेती शहरी क्षेत्र में भी की जा सकती है, ऐसे भूमिहीन भी कर सकते हैं जिनके पास जमीन नहीं है। और सब्जी बाड़ी की पुरानी खान-पान की संस्कृति की वापिसी हो रही है। जैव विविधता व पर्यावरण का संरक्षण हो रहा है, जो सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय भी है। 


फोटो- राजेश सामले