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प्रधानमंत्री जी, इस गांव के किसान खुद के पैसे से बना रहे हैं सड़क- रोहित कुमार पोरवाल

ये सड़क सरकार ने नहीं बनाई है, न ही किसी एनजीओ ने। करीब आधा किलोमीटर लंबी सड़क रेत-मिट्टी के गारे से बनी भले ही लगे, लेकिन हकीकत में ये सड़क 'अन्नदाता' की खुद की रकम, खून-पसीने और हाड़-तोड़ मेहनत से बनी है। डेढ़ किलोमीटर का काम अब भी बाकी है, इसलिए माटी के लाल जी जान से इस सड़क को पूरा करने में लगे हैं।

ये दरअसल, एक सड़क नहीं, बल्कि एक 'सबक' है करोड़ों लोगों के लिए, 29 सूबों में फैली सियासत के लिए और उस सियासत को चला रहीं सरकारों के लिए।

अब ये सड़क खेतों के अलावा 5000 हजार दिलों को भी जोड़ती है। अब ये अन्नदाता की गरिमा, मर्यादा, आत्मसम्मान की सड़क है। जो पैगाम देती है... 'ग्रो इन इंडिया का।'

'ग्रो इन इंडिया' किसी नेता के भाषण से निकला सियासी जुमला लगता है। लेकिन है नहीं। ये किसानों के पुरुषार्थ से निकला भरोसे का वाक्य है कि अगर मेक इन इंडिया की तरह कारखानों को दी जाने वाली मोहलत और संसाधन किसानों को, उनके खेतों को मिलें तो देश की तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी।

ये महाराष्ट्र की सीमा से सटे मध्य प्रदेश के एक गांव के उन 100 किसानों की आवाज है, जिनमें पांच साल के बच्चे लेकर कांपते हाथों से लाठी थामने वाले उम्रदराज किसान भी शामिल हैं। लेकिन तारीफ करनी होगी 21 वर्षीय गणेश ढोके, और कलाकार/मूर्तिकार श्वेता भत्तड़ की। दोनों इसी गांव में पले-बढ़ें हैं। आज निस्वार्थ रूप से समाजसेवी के तौर पर खेती-किसानी के हालातों को उबारने में पूरी निष्ठा से लगे हैं।

लेकिन ये कहानी महज इन दो की सफलता बयां नहीं करती है। ये कहानी पूरे गांव की कामयाबी की कहानी है। जो किसानों की कर्मठता, आत्मविश्वास और जज्बे को बयां करती है। हालांकी जिस सफलता की दरकार है, उसकी शुरुआत भर हुई है। इनके प्रयास इतने सराहनीय और करोड़ो लोगों को प्रेरणा देने लायक है कि हमने इन्हें कुछ शब्दों के माध्यम से सहेजने की कोशिश की है। ताकि प्रधानमंत्री तक इनकी पुकार पहुंच सके।

एक सार्थक मुहिम की पूरी सक्सेस स्टोरी यहां क्लिक करके पढ़ें. बयान कर रहें रोहित कुमार पोरवाल