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Resource centre on India's rural distress
 
 

घरेलू नौकरों के जीवन और जीविका की दशा पर परिचर्चा


इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज, सीएसडीएस,

द्वारा आयोजित परिचर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं

 

विषय- Work like any other? Accounting for domestic work in India

वक्ता:

भारती बिरला, राष्ट्रीय परियोजना समायोजनक, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन(ILO)

 

नीता पिल्लई, प्रोफेसर, सेंटर फॉर विमेन्स डेवलपमेंट स्टडीज       

 

अमरजीत कौर, राष्ट्रीय सचिव, ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस

 

मैक्सिमा एक्का,डोमेस्टिक वर्कर्स फोरम


ब्रदर वर्गीज थेकनाथ- समायोजक, डोमेस्टिक वर्कर्स फोरम ऑव इंडिया

 

तारीख: 19 फरवरी स्थान: प्रेस क्लब ऑव इंडिया समय: 11 बजे दिन से 1.00 अपराह्न तक

 

बीते एक दशक(साल 1999-2000 से 2009-10) में भारत के शहरी इलाकों में घरेलू नौकरों की संख्या में 68 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। अनुमानों के मुताबिक भारत में घरेलू नौकरों की संख्या तकरीबन 1 करोड़ है। श्रमशक्ति का यह हिस्सा देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान करता है। इसके बावजूद समाज इन्हें कामगार के रुप में स्वीकार करने के मामले में अभी पीछे है और घरेलू नौकर के रुप में काम करने वाले लोग श्रम-कानूनों से हासिल होने वाले लाभ से वंचित हैं।उन्हें वैसी सेवाएं या फिर फायदे हासिल नहीं होते जो किसी अन्य श्रेणी के कामगार को हासिल हैं। महिलाओं के लिहाज से देखें तो घरेलू नौकर के रुप में उन्हें श्रमशक्ति में भागीदार होने के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर मिलता है। यह बात अनपढ़ महिला श्रमशक्ति के लिए भी सही है और पढ़ी-लिखी महिला श्रमशक्ति के बारे में भी क्योंकि पढ़ी-लिखी महिलायें अपने घरेलू कामकाज का भार नौकरानियों को सौंपकर श्रम-बाजार में हिस्सेदारी कर पाती हैं।


परिचर्चा में निम्नलिखित बिन्दुओं पर बातें रखी जायेंगी:


·         क्या घरेलू परिचारक का काम अन्य काम की तरह ही है? क्या घरेलू नौकर का काम करने वाले अन्य कामगारों के समान हैं? समाज उन्हें इस रुप में कैसे स्वीकार करे? परिचर्चा भारत के मौजूदा विधानों में जारी कार्य शब्द की परिभाषा पर विचार करते हुए इस बिन्दु पर प्रकाश डालेगी.

 

·         हकदारी, अधिकार, फायदे, प्रतिनिधित्व और आवाज बुलंद करने के मामले में घरेलू नौकरों के लिए चुनौती और बाधायें- परिचर्चा में स्रोत और लक्ष्य / घरेलू नौकरों के कार्यस्थल सहित कुछेक अनुकरणीय उदाहरणों पर बातचीत की जायेगी.

 

·          प्लेसमेंट एजेंसियां: दोस्त या दुश्मन;कौन हैं प्लेसमेंट एजेंसियां , उनका पता-ठिकाना क्या है और उनकी जरुरत क्यों है? परिचर्चा में प्लेसमेंट एजेंसियों की भूमिका और जरुरत पर बातचीत की जायेगी।मेहनताने, काम की दशा तथा सुरक्षा तय करने के मामले में प्लेसमेंट एजेंसियों द्वारा निभायी जा रही भूमिका पर बल दिया जायेगा। साथ ही एजेंसियों के नियमन के संबंध में बातें रखी जायेंगी।

 

·         घरेलू नौकरों के नियोक्ता कौन हैं और उनकी क्या अपेक्षाएं हैं- परिचर्चा में नियोक्ता के परिप्रेक्ष्य से आवश्यकताओं मसलन कुशल कामगार की जरुरत , विश्वास और पेशेवराना रवैये की बहाली आदि पर बात की जायेगी। पारस्परिक सम्मान, गरिमा तथा विश्वास को व्यक्त करने वाले कुछ सकारात्मक दृष्टांतों की भी चर्चा होगी।