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मनरेगा का उद्देश्य कभी नहीं रहा कि मजदूरों का जातीय आधार पर वर्गीकरण हो: ज्यां द्रेज

-डाउन टू अर्थ,

केंद्र सरकार ने कुछ समय पहले मनरेगा भुगतान की प्रक्रिया में संशोधन किया है, जिसके चलते राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में मनरेगा मजदूरों को मजदूरी मिलने में काफी देरी हुई। यह देरी ऐसे समय में हुई जब कोविड-19 की दूसरी लहर देशभर में कहर ढा रही थी। डाउन टू अर्थ ने पिछले दो हफ्ते के दौरान देश के सबसे अधिक आबादी वाले पांच राज्यों में चल रहे मनरेगा कार्यों की जमीनी हकीकत जानने की कोशिश की। और उसे सिलसिलेवार अपने पाठकों तक पहुंचाया। इन सब हकीकत को ध्यान में रखते हुए डाउन टू अर्थ ने इस योजना के शुरू करने वाले शिल्पकारों में से एक अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज से इस संबंध में विस्तार से बातचीत की। ध्यान रहे कि यह योजना जब 2006 में शुरू हुई थी तब इस योजना के मसौदे को तैयार करने में देश के मुख्य अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज का प्रमुख योगदान रहा है।

सवाल- मनरेगा के संदर्भ में सरकार नई नोटिफिकेशन लेकर आई है, जिसमें एससी, एसटी और पिछड़ा एवं सामान्य वर्ग को अलग-अलग वर्गीकृत कर उन्हें उसके अनुसार काम और पैसे देने की बात कही गई है। इससे क्या दिक्कतें आ रही हैं और क्या मनरेगा का जो मूल उद्देश्य है, उसके प्राप्ति के मार्ग में बाधा डालेगी?

-केंद्र सरकार ऐसा नोटिफिकेशन क्यों लेकर आई है और इससे क्या हासिल करना चाहती है, उसके बारे में मुझे अभी तक किसी ने बताया नहीं है। लेकिन यह निश्चित है कि इससे लोग बड़ी संख्या में प्रभावित होने लगे हैं और इसको लेकर मैं एक विस्तृत अध्ययन करने वाला हूं और जल्द ही इससे संबंधित सभी जानकारी आप सबसे से साझा करूंगा। लेकिन जहां तक मनरेगा का मूल उद्देश्य अफर्मेटिव एक्शन की बात है। उसके मुताबिक, मांग के आधार पर काम दिया जाना है। अतः उद्देश्य तो प्रभावित नहीं होगा, लेकिन लोगों को जो काम मिल रहा है या फिर देर से पैसे मिलने की शिकायतें हैं, उसमें वृद्धि हो सकती है। इससे परेशानियां बढ़ेगी। मनरेगा का सृजन ही इसलिए किया गया था कि जो भी मजदूर व गरीब व वंचित तबका है, उसे इस योजना से लाभ मिले। जाहिर ही एससी, एसटी तबका में गरीबी ज्यादा है और उनकी तादाद भी अधिक है। अतः उन्हें इससे ज्यादा रोजगार मिलता था, लेकिन मनरेगा का उद्देश्य कभी नहीं रहा है कि यह उनका जातीय आधार पर वर्गीकरण किया जाए, उनमें विभेद करें, फूट डालें। ऐसा करना मनरेगा और मजदूर दोनों के हित में नहीं है। 

सवाल- कोरोना महामारी व लॉकडाउन के इस दौर में मनरेगा मजदूरों की एक बड़ी संख्या ऐसी है जिसने काम तो कर लिया है लेकिन उनके खातों में पैसे नहीं आया है। वो भी तब जब सरकार कह रही है कि पैसे डाल दिया?

-सरकार के मुताबिक 4 प्रतिशत पेमेंट रिजेक्ट हो गए। यह एक बड़ी रकम है। कई गांव व हजारों मजदूर ऐसे होंगें जिनका पैसा उनके खाते में आया ही न हो। मनरेगा भुगतान में चार प्रकार की दिक्कतें हैं- देर से भुगतान (डिलेड पेमेंट), रिजेक्टेड पेमेंट, डायवर्टेड पेमेंट, एवं लॉक्ड पेमेंट। मनरेगा को देख रहे केंद्र सरकार के एक उच्च अधिकारी ने मुझे बताया है कि खाते में पैसे नहीं आने के करीब 200 से भी अधिक कारण हो सकते हैं। लेकिन कुछेक प्रमुख कारण हैं, जिस अकाउंट से मनरेगा मजदूरी भुगतान लिंक किया गया हो उसका बेमेल होना, मसलन मस्टररोल में जो नाम हो उस नाम से बैंक अकाउंट का न होना, केवाईसी का न होना, गलत डेटा इंट्री होना, अकाउंट का मृत (डॉरमेंट) हो जाना, और लगातार भुगतान के तरीके में बदलाव करना। कई बार तो व्यक्ति के पास कई खाते आधार से लिंक रहने पर उन्हें पता ही नहीं चलता पैसा किस खाते में आया। कई बार आधार से गलत व्यक्ति के अकाउंट में लिंक हो जाना आदि।

सवाल- अगर मजदूरी भुगतान में देरी हो तो आर्थिक दंड का प्रावधान है

-फंड ट्रांसफर आर्डर जब देरी से जमा किया जाता है तो पैसा देरी से ही निकलता है। मनरेगा में प्रावधान है कि अगर 15 दिन की देरी भुगतान में हो तो सरकार को दंड देना पड़ेगा। एक-एक दो-दो वर्ष से अधिक से पैसे अटके पड़ें हैं पर आज तक किसी भी मजदूर को मजदूरी सरकार ने लेट फाईन (बोनस) के साथ नहीं दी।

सवाल- लेकिन अगर आधार से खाता लिंक है तो अच्छी बात है। इससे भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी?

-आधार से खाता लिंक होना यह बताता है कि जिस व्यक्ति का मस्टर रोल में नाम है उसी व्यक्ति के खाते में पैसा जाएगा। लेकिन मनरेगा तो इसलिए था जिसने काम किया है, उसको पैसा मिले। मनरेगा में काफी संख्या में ऐसे लोगों को भी पैसा मिल रहा है जिसने काम तो नहीं किया लेकिन मस्टररोल में नाम है तो पैसा खाते में जाता है। लेकिन जिन्होंने काम किया उन्हें अगर पैसे नहीं मिल रहा है तो यह भ्रष्टाचार से भी बढ़कर है। क्योंकि मनरेगा का उद्देश्य ही था मांग के आधार पर काम और जब लोगों को वक्त पर पैसा ही नहीं मिलेगा तो निश्चित रूप से मजदूर को इसको लेकर नाराजगी बढ़ेगी। वे इसमें काम करना नहीं चाहेंगें। अतः सरकार को आधार पेमेंट सिस्टम को त्याग कर अकाउंट पेमेंट सिस्टम अपनाना चाहिए।

सवाल-पेमेंट सिस्टम में सर्वाधिक प्रयोगों ने दिक्कतें ज्यादा पैदा कीं हैं। इसे आप स्पष्ट कीजिए?

-किसी भी पेमेंट सिस्टम को अच्छे तरीके से अमल में लाने में समय लगता है और जब सरकार के पास एक जांचा परखा अकाउंट पेमेंट सिस्टम था ही तो उसे इसमें इतना अत्याधिक प्रयोग करने की जरूरत नहीं थी। उसमें जो दिक्कतें आ रही थीं, उन तकनीकी दिक्कतों को दूर किया जाना था। पहले कहा गया कि सरकार नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम से मजदूरी खातों में भेजेगी, फिर आधार पेमेंट ब्रिज सिस्टम लाया गया, उसके बाद यह कहा गया कि जनधन खातों में पैसा जाएगा, यूपीआई एवं एयरटेल वालेट सिस्टम लाने की बात कही गई। धरातल पर जो वस्तु स्थिति है, वह यह कहती है कि मजदूरों को समय पर उनका मेहनताना नहीं मिल रहा है।

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