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उच्च जातियों को भी मिलना चाहिए 15 फीसदी आरक्षण: केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान

केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान नरेंद्र मोदी सरकार में दलित चेहरा हैं। बिहार से आने वाले और लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के अध्यक्ष राम विलास पासवान ने हमारे सहयोगी अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स के कुमार उत्तम से एससी/एसटी एक्ट पर मार्च में सु्प्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सरकार द्वारा किए गए बदलाव, पदोन्नति में आरक्षण और उच्च जातियों को आरक्षण आदि के मुद्दों पर बातचीत की। पढ़ें इंटरव्यू:


सवाल- एससी/एसटी अधिनियम और पदोन्नति में आरक्षण पर सरकार की स्थिति के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए हैं। क्या यह सरकार के लिए चिंता का विषय है?


जवाब- बिल्कुल भी नहीं। छह महीने पहले, हमें कई प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा था। मंत्रियों को आना जाना मुश्किल पड़ने लगा था। मोदी सरकार को लोग 'एंटी दलित' और 'एंटी बैकवर्ड' कहने लगे थे। लोगों ने मुझसे पूछा कि, 'पासवान जी, आप दलितों के मसीहा हैं, इस मुद्दे पर शांत क्यों हैं? बहुत सारे काम किए गए लेकिन एक धारणा की समस्या थी। आज, धारणा बदल गई है। मैं अक्सर कहता हूं कि वीपी सिंह और नरेंद्र मोदी ही ऐसे केवल दो नेता हैं जिन्होंने बीआर आंबेडकर को उनकी देनदारी दी।


सवाल- छह महीने में सरकार की दलित विरोधी धारणा कैसे बदल गई?


जवाब- जब सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी कानून पर फैसला सुनाया तो यह सरकार के लिए एक तरह परीक्षा थी। युवाओं ने सड़कों पर प्रदर्शन शुरू कर दिए थे। अगर पहले ही दिन यह अध्यादेश ले आया गया होता तो फिर मामला इतना बिगड़ता नहीं। गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली समिति में हमने तय किया फौरन इस मामले में अध्यादेश लाया जाए। लेकिन नौकरशाही की अपनी गति होती है। लेकिन जो कुछ भी हुआ, वह अच्छे के लिए ही हुआ। अगर कोई प्रदर्शन नहीं होता तो फिर लोगों को पता नहीं चलता कि पीएम मोदी ने क्या किया है।


सवाल- तो क्या सरकार की दलित विरोधी छवि पूरी तरह से बदल गई?


जवाब- नरेंद्र मोदी दलित विरोधी नहीं हैं लेकिन एक धारणा बन गई थी। मैंने हिन्दुस्तान टाइम्स को एक साक्षात्कार में छह महीने पहले बताया था कि वीपी सिंह एक क्षत्रिय थे। जब हमने उनकी धारणा को बदल दिया तो फिर पीएम मोदी न तो कोई राजा हैं और न ही उच्च जाति से आते हैं। आज न सिर्फ उनके लिए धारणा में बदलाव हुआ है, बल्कि कई लोग उन्हें उच्च जाति


सवाल- क्या यह नई धारणा सरकार की मदद करेगी, या उच्च जातियों के बीच नुकसान पहुंचाएगी?


जवाब- यह मदद करेगी। लेकिन इस सरकार ने कुछ नया नहीं किया है। सरकार ने केवल सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदला है। अगर सरकार ने कुछ नया किया होता तो फिर अगर सरकार ने कुछ नया दिया था, तो आप शिकायत कर सकते थे कि मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का पक्ष लिया। यह प्रदर्शन केवल तीन चुनाव राज्यों तक ही सीमित क्यों है? क्या अन्य राज्यों में उच्च जातियां नहीं हैं?


सवाल- लेकिन क्या इससे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कोर वोट बेस में बदलाव आएगा?


जवाब- जो धरने में बैठे हुए हैं, क्या वे बीजेपी के लोग हैं? यह सबकुछ आने वाले चार से छह महीनों में शांत हो जाएगा। उच्‍च जाति बीजेपी का वोटबेस है और वे बीजेपी के प्रति निष्ठावान बने रहेंगे। आपको क्या लगता है कि क्या वे लालू प्रसाद जो उन्हें रोजाना अपशब्द बोलते हैं, उनके साथ जाएंगे? या फिर वे मायावती या अखिलेश यादव को वोट देंगे?


सवाल- तो क्या आप यह बता रहें हैं कि बीजेपी का कोर वोट बैंक तो उनके पास रहेगा ही, दलित भी उनके समर्थन में आ जाएंगे?


जवाब- बिल्कुल। दलित वोट बीजेपी से दूर हो गया था। रोहित वेमुला, जेएनयू और ऊना केस के बाद ये बदलाव हुए थे। पीएम मोदी को दलित विरोधी बुलाया जाने लगा था। लेकिन स्थिति अब ऐसी नहीं है।


सवाल- एससी और एसटी की तुलना में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) बड़ी संख्या में हैं। क्या उनका विरोध चुनाव परिणामों पर असर डालेगा?


जवाब- कोई विरोध प्रदर्शन नहीं है। जो कुछ भी था, वह पूरी तरह से अस्थायी था। मैं कहता था कि ओबीसी आरक्षण दलित आरक्षण के लिए 'डबल लॉक' था। मैंने दलित नेताओं को बताया था कि कोई भी आपसे आपका कोटा छीन नहीं सकता है। अगर वे एससी/एसटी एक्ट और पदोन्नति में आरक्षण की वकालत आज नहीं करेंगे तो कल अपने लिए कैसे इसकी मांग करेंगे?


सवाल- आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि कोई विरोध प्रदर्शन नहीं है?


जवाब- क्योंकि एससी और ओबीसी का खून का संबंध है।


सवाल-क्या आप ऐसा महसूस करते हैं कि उच्च जातियों के लिए भी कुछ किया जाना चाहिए?


जवाब- कुछ क्यों? उन्हें 15 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए।


सवाल- क्या यह कोटा पर 50% सीमा का उल्लंघन नहीं होगा?


जवाब- तमिलनाडु में 69% आरक्षण है। अगर सभी राजनैतिक दल तय कर लेते हैं तो फिर कोई परेशानी नहीं होगी।


सवाल- क्या सरकार का यह अगला कदम होने जा रहा है?


जवाब- बीजेपी की कभी भी उच्च जाति विरोधी धारणा नहीं रही है। उच्च जातियां बीजेपी की रीढ़ की हड्डी रही है। वे पार्टी के प्राकृतिक सहयोगी हैं।