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देश की हर गृहिणी को मिलेगी रसोई गैसः प्रधान

दुनिया में पर्यावरण व प्रदूषण पर जारी बहस के बीच पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने देश की करोड़ों गृहिणियों को लकड़ी और उपले से खाना बनाने से छुटकारा दिलाने का वादा किया है। 'नईदुनिया' के सहयोगी अखबार 'दैनिक जागरण' के विशेष संवाददाता जयप्रकाश रंजन के साथ खास बातचीत में प्रधान ने केंद्र सरकार की एलपीजी क्रांति के बारे में विस्तार से बताया।

सीधे जनता के हाथ में नकद सब्सिडी की योजना पहल ने विश्व रिकॉर्ड बना लिया है। अब आगे इसको लेकर क्या तैयारी है?

-बिल्कुल सही कहा आपने। गिनीज बुक ने 'पहल' योजना के तहत जून, 2015 तक 12.57 करोड़ ग्राहकों को सीधे एलपीजी सब्सिडी देने को विश्व रिकॉर्ड माना है। हमें इसका प्रमाणपत्र दिया गया है। लेकिन मैं बता दूं कि पिछले हफ्ते तक 14.62 करोड़ ग्राहकों के बैंक खाते में सीधे सब्सिडी मिलने लगी है। इस योजना की सफलता मामूली नहीं है। यह सोच को बदलने वाली है, जो आने वाले दिनों में सरकार के कई कदमों में भी दिखाई देगा। एलपीजी यानी रसोई गैस के क्षेत्र में एक नई सोच से काम करने जा रहे हैं।

रसोई गैस को लेकर नई सोच....???

-बिल्कुल। नई सोच यह है कि देश की हर गृहिणी तक हम स्वच्छ ईंधन के तौर पर एलपीजी पहुंचाने जा रहे हैं। अभी देश की 60 फीसद गृहिणियों को ही एलपीजी कनेक्शन मिला हुआ है। हम 2018 तक 75 फीसद रसोई घरों को एलपीजी देने का रोडमैप तैयार कर चुके हैं। हमारा डाटाबेस तैयार हो चुका है। 16.27 करोड़ एलपीजी ग्राहकों की सूची तैयार है। इनमें से 14.62 करोड़ सब्सिडी ले रहे हैं। इनमें से आठ करोड़ का आधार कार्ड से सत्यापन हो चुका है। शेष बचे छह करोड़ के सत्यापन का काम जल्द पूरा हो जाएगा। इसके अलावा हमें देश में 10 करोड़ नए एलपीजी कनेक्शन देने होंगे। इनके लिए बड़े पैमाने पर नई वितरक एजेंसियां खोलने की जरूरत पड़ेगी। सरकार जल्द ही नई एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर नेटवर्क की नीति लाएगी। इस बारे में सभी सांसदों और राज्य सरकारों से सुझाव मांगे गए हैं कि वे बताएं कि उनके इलाकों में कहां-कहां एलपीजी एजेंसी खोलने की आवश्यकता है। नई एजेंसियां ग्रामीण इलाकों या कम आबादी वाले क्षेत्रों में ज्यादा खोली जाएंगी। सरकार पूरे हिमालयी क्षेत्र यानी कश्मीर से लेकर हिमाचल होते हुए असम-अरुणाचल व त्रिपुरा तक के इलाकों में गैस पहुंचाएगी। इसके साथ ही बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ के अधिकांश दुर्गम इलाकों में रहने वाली गृहिणियों तकभी एलपीजी पहुंचेगी।

लेकिन सिर्फ वितरक एजेंसी खोलने से ही लोग एलपीजी कनेक्शन थोड़े ही ले लेंगे?

-सही कह रहे हैं आप। इसलिए कई अन्य तरीकों से भी प्रोत्साहन देने की तैयारी है। सबसे पहले तो हम एलपीजी कनेक्शन की लागत घटाने जा रहे हैं। अभी नए गैस कनेक्शन के लिए 3,000-3,200 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। गरीबों के लिए 1,600 रुपये का योगदान सरकार करती है, लेकिन इस लागत को और घटाना चाहते हैं। यह काम पांच या दो किलो के गैस सिलेंडर से हो सकता है। इससे गरीबों को जब जितनी जरूरत होगी, उतनी मात्रा की एलपीजी सिलेंडर लेने की छूट होगी। हम स्थानीय तौर पर एलपीजी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए कई नए बॉटलिंग प्लांट लगाएंगे। देश के कई हिस्सों में नए एलपीजी टर्मिनल भी खोले जाएंगे। इसका रोडमैप कुछ महीनों में तैयार हो जाएगा। तेल कंपनियों को कहा गया है कि वे वैश्विक बाजार में स्टील की कम हो चुकी कीमतों का फायदा उठाने के लिए ज्यादा एलपीजी सिलेंडर का निर्माण करवाएं, ताकि ज्यादा से ज्यादा आपूर्ति हो सके।

क्या देश में इतनी मात्रा में एलपीजी है कि सभी को इसकी आपूर्ति की जा सके?

-अभी देश की मांग के मुताबिक हमें 1.90 करोड़ टन एलपीजी चाहिए, जबकि घरेलू उत्पादन से महज एक करोड़ टन की आपूर्ति ही हो पाती है। शेष 90 लाख टन का हमें आयात करना पड़ता है। इंडियन ऑयल की पारादीप रिफाइनरी में उत्पादन शुरू हो जाने के बाद घरेलू आपूर्ति बढ़ेगी। साथ ही पूरे देश में एलपीजी पाइपलाइन का राष्ट्रीय ग्रिड भी तैयार हो रहा है। इससे सीधे घरों तक एलपीजी पहुंचाने का काम सीधा हो जाएगा। लेकिन इसके साथ ही केंद्र सरकार एलपीजी ग्राहकों की अन्य समस्याओं को सुलझाने की पूरी व्यवस्था भी नए सिरे से बदलने जा रही है। ग्राहकों की हर शिकायत को समय रहते सुलझाया जाएगा। सूचना तकनीकी का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर ग्राहकों की सुविधा बढ़ाई जाएगी। पूरे देश में यह व्यवस्था होगी कि किसी को भी गैस कनेक्शन लेने या रिफिलिंग करने के लिए गैस एजेंसी के पास जाने की जरूरत ही नहीं होगी। हर काम स्वचालित तरीके से होगा।