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नियमगिरि की जीत देश के हर गांव की जीत है : निखिल डे

जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे ने नियामगिरी के निर्णय को काफी अहम बताया है. उन्होंने कहा कि यह मानकर चलना कि दिल्ली में बैठकर कुछ अधिकारियों द्वारा या कंपनियों के प्रतिनिधियों द्वारा गांव के लोगों के विकास के लिए लिया गया फैसला बिल्कुल सही है, और ग्रामसभा जो कि अपने गांव के विकास के लिए इन फैसलो का विरोध करती है, वह गलत है, एक तरह से उनकी समझ पर सवाल खड़ा करना है. सर्वोच्च अदालत ने जिस तरह से ग्रामसभा की बात को स्वीकार किया है, और उनसे बिना पूछे कोई भी खनन की गतिविधि संचालित नहीं किये जाने का आदेश दिया है, इससे न सिर्फ ग्राम सभा मजबूत होगी, बल्कि विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को बल मिलेगा और हम समावेशी विकास की दिशा में बढेंगे. पेश है पंचायतनामा के लिए संतोष कुमार सिंह की निखिल डे से विशेष बातचीत

देश के अलग-अलग इलाकों में प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार को लेकर कई स्तर पर संघर्ष चल रहे हैं? इसी तरह का संघर्ष उड़ीसा के नियामगिरी में लंबे समय से चलाया जा रहा था जहां एक निजी कंपनी द्वारा लौह अयस्क के खनन को लेकर स्थानीय लोगों द्वारा विरोध किया जा रहा था? हाल ही में अदालत ने यह फैसला दिया है कि बिना ग्रामसभा की अनुमति के किसी भी खनन गतिविधि की इजाजत नहीं दी जा सकती? इस फैसले पर क्या कहना चाहेंगे.

नियमगिरि का मामला कोई नया नहीं है. वहां लंबे समय से स्थानीय लोग प्राकृतिक संपदा के दोहन के खिलाफ एक जुट होकर संघर्ष करते रहे हैं. इस पर्वत के इर्द-गिर्द जितने भी गांव हैं लगभग सभी गांवो में ग्रामसभाओं द्वारा कराये गये रेफरेंडम में यह बात सामने आयी थी कि लोग खनन के खिलाफ हैं. बावजूद इसके इस बात की इजाजत दी गयी. लेकिन अब चूंकि अदालत ने कह दिया है कि आदिवासियों की सुरक्षा, उनके धार्मिक अधिकार और उनके देवताओं का सम्मान किया जाना चाहिए. इन्होनें अदालत के सामने दावा किया था कि यह पर्वत हमारे लिए भगवान है, और इसे हम बहुत पवित्र मानते हैं, और यह हमारे लिए जीविकोपाजर्न के साधन भी हैं. इस आधार को ध्यान में रखते हुए अदालत का फैसला काफी महत्व रखता है. यह सिर्फ ग्राम सभा को अधिकार दिये जाने तक सीमित नहीं है बल्कि इससे यह भी स्थापित होता है कि प्राकृतिक संसाधनों पर जिस पर सरकार यह कहते हुए दावा करती रही है उन्हें अब ऐसी किसी भी खनन की अनुमति देने के पहले स्थानीय रीति रिवाज और परंपराओं को भी समझना होगा.

लेकिन तर्क  तो यह भी दिया जाता है कि खान और खनन को बढावा देने से विकास की गतिविधियां तेज होंेगी, और स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा? लेकिन साथ ही यह भी आरोप लगाया जाता है कि स्थानीय लोगों का इस विकास योजनाओं के प्रति विरोध नहीं होता बल्कि बाहरी लोग अर्थात एनजीओ द्वारा आंदोलन को बल दिया जाता है?
देखिए, इस देश के नीति निर्माता पहले से ही यह मान कर चलते हैं कि हम जो निर्णय ले रहे हैं वह पूरी तरह सही है. आदिवासी इलाकों में किस तरह का विकास चाहिए, यह तय करने के लिए उनसे पूछा जाना जरूरी नहीं समझा जाता, यह तय करते हैं सरकारी अधिकारी, और कंपनियों के प्रतिनिधि. यह कोई नहीं सोचता कि देश में पंचायती राज संस्थाएं भी हैं,और ग्राम सभाएं भी. अपने हित के विषय में कौन सबसे अच्छा निर्णय लेगा इस बात को लेकर अक्सर विरोधाभाष की स्थिति रहती है. कई बार तो ग्रामीणों की समझ और उनकी शिक्षा को लेकर भी सवाल खड़ा किया जाता है. कोई यह समझने के लिए तैयार नहीं है कि आदिवासी, दलित, पिछड़े अपने विषय में सही निर्णय ले सकते हैं. यहां तक कि कई जगहों पर ग्राम सभा द्वारा लिये गये निर्णय को गलत ठहराने के लिए  ग्राम सभा को तोड़ने का भी प्रयास किया जाता है. केवल नियमगिरि ही नहीं बल्कि पॉस्को, नबी मुंबई सब जगह पर स्थानीय लोगों ने एकजुट होकर सरकार और कंपनियों को यह संदेश देने का प्रयास किया कि हमारे लिए बेहतर क्या है? लेकिन उनकी सुनी नहीं जाती,और यही कारण है कि या तो उनका संघर्ष सतत चलते रहता है या फिर अदालती आदेशों के जरिए इस तरह के केंद्रीकृत फैसलों को रोका जाता है. इसे आप एनजीओ द्वारा प्रायोजित विरोध का नाम दें या स्थानीय लोगों द्वारा तथ्य यही है कि आम लोग अपने अधिकार के विरुद्ध लिये गये निर्णयों के खिलाफ उठ खड़े होते हैं.

आदिवासी और दलित इलाके अभी भी विकास से वंचित हैं, और अगर विकास कार्य को तेज करने के लिए अगर सरकार कुछ उद्योगों को खनन की इजाजत देती है, जिससे रोजगार सृजन में मदद मिलता है, और देश की आर्थिक प्रगति होती है, तो इसमें बुराई क्या है?
जैसा कि मैनें कहा कि क्यों पिछड़े हैं और किस तरह का विकास हो ताकि उन्हें अधिकाधिक फायदा हो इसका निर्णय कौन ले? निश्चित रूप से जब आपने उन्हें मतदान का अधिकार दिया है, और वे देश के नागरिक हैं तो इस बात को भी जानते हैं कि उनके इलाके का विकास किस तरह की गतिविधियों को चलाने से होगा. विकास के नाम पर यह किये जाने की इजाजत तो नहीं ही दी जा सकती कि आप वैसे गांव जो एक बड़े संसाधन पर हजारों वर्षो से बैठा है. न सिर्फ उन्हें बचा रहा है बल्कि अंधाधुंध दोहन की प्रक्रिया का विरोध करते हुए आगे आने वाले पीढियों के लिए भी सुरक्षित कर रहा है. आप वैसे लोगों को निर्णय की प्रक्रिया में भागीदार बनाने के बजाय उन्हें लालच देकर, लाभ के एक बड़े हिस्से में से एक बहुत ही मामूली हिस्सा देकर उनके संसाधनों का विकास के नाम पर दोहन कर बाहरी इलाकों में भेज रहे हैं, इसे किसी भी कीमत पर समावेशी विकास नहीं कहा जा सकता. अन्य इलाकों की बात अगर छोड़ भी दें तो पेसा इलाकों में जहां स्थानीय लोगों को जल, जंगल और जमीन पर व्यापक अधिकार मिले हुए हैं, वहां तो कम से कम उनसे पूछकर ही विकास की प्रक्रिया को संचालित करें. उन्हें अपने गांव के विकास के लिए अधिकार दिया जाना चाहिए. ऐसा किये जाने पर न सिर्फ संसाधनों और सेवाओं के बेहतर इस्तेमाल कर पायेंगे बल्कि उनके द्वारा ऐसा न किये जाने पर जवाबदेह भी ठहराया जा सकता है.

लगभग देश के सभी इलाकों में पंचायती राज संस्थाएं काम कर रही हैं, ग्राम सभा को व्यापक अधिकार मिले हुए हैं, यह सबकुछ इसलिए किया गया है कि विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को बल मिले?
देखिए, पंचायती राज के तहत काम किये जा रहे हैं. ग्राम सभा को गठित करने के लिए भी कानून बनाया गया है लेकिन ये सब चीजें केवल कागजों पर हुई हैं. पंचायती राज के नाम पर मुखिया राज और सरपंच राज स्थापित किया गया है, जहां कुछ साधन संपन्न लोग चाहे वे किसी भी जाति-बिरादरी के क्यों न हों ज्यादातर निर्णय समाज हित के बजाय के खुद के हित में लेने लगते हैं. ग्राम सभा को व्यापक अधिकार दिये जाने के बावजूद ग्राम सभाएं ठीक से काम कर पा रही हैं. जाति आधारित समाज में गरीब महिलाएं, दलितों और अल्पसंख्यकों को कागजी खानापूर्ती के लिए तो ग्राम सभाओं में अधिकार दिया गया है लेकिन उनकी आवाज को उतनी तरजीह नहीं मिलती जितनी मिलनी चाहिए. यही कारण है कि कथित तौर पर ग्रामसभा और ग्रामपंचायतों द्वारा लिये गये निर्णय लोकतांत्रिक तरीके से लिए गये निर्णय कहे जाते हैं, लेकिन हकीकत में ऐसा होता नहीं है.


ग्राम सभाओं में फैले भ्रष्टाचार की बात अक्सर उठायी जाती है. ऐसे में हाल में राजनीतिक दलों द्वारा लिये गये निर्णय जिसके तहत आरटीआई के तहत राजनीतिक दलों को न शामिल किये जाने की बात कही गयी है? क्या प्रभाव पड़ेगा?

निश्चित रूप से ग्राम पंचायतो और गांव पर इसका असर होगा. हाल के दिनों में जिस तरह से मुखिया और सरपंच बनने के लिए धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल बढा है, और इसके फलस्वरूप पंचायत का चुनाव लड़ना और जीत हासिल करना आम लोगों के लिए मुश्किल हो रहा है, यही कारण है कि पंचायत में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है. आजकल तो कई राज्यों में पंचायत चुनाव भी दलगत आधार पर लड़े जा रहे हैं. दल प्रत्याशी खड़ा करता है, उन्हें समर्थन देता है, उनके पीछे पैसा लगाता है इसे देखते हुए राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे से बाहर किये जाने का प्रभाव बहुत व्यापक होगा. अभी बड़े राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों द्वारा यह दलील दी जा रही है कि वे चुनाव आयोग के समक्ष और आयकर विभाग के समक्ष अपने खर्च का ब्यौरा देते हैं, आगे चलकर पंचायत प्रतिनिधि भी इसी दलील के बलबूते यह तर्क परोसेंगे कि वे चुनाव आयोग को अपना हिंसाब देंगे, न कि आरटीआई द्वारा पूछे गये किसी प्रश्न के जवाब में. हालांकि तथ्य यह भी है कि आरटीआई कानून के जरिए देश के बड़े भ्रष्टाचार तो उजागर हुए ही हैं, जो कि समाचार पत्रों और टीवी समाचारों की सुर्खिया बने. लेकिन इसी कानून ने हजारों की संख्या में ग्रामीणों को न्याय पाने की उम्मीद को बलवती बनाने में काफी मदद किया है.