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भेंटवार्ता जोन पी मेंशे से- वकार अहमद सईद


नृत्त्वशास्त्र की अध्येता जॉन पी मेंशे से की गई यह भेटवार्ता फ्रंटलाइन से साभार ली गई है।

Mencher 

प्रोफेसर जोन पी मेंशे नृत्तत्वशास्त्र की अध्येता हैं। उन्होंने बरसों तक सिटी यूनिवर्सिटी ऑव न्यूयार्क के ग्रेजुएट सेंटर और इसी यूनिवर्सिटी के लेहमान कॉलेज में अपने विषय का अध्यापन किया है। प्रोफेसर मोंशे सेकेंड चांस फाऊंडेशन नामक एक नॉट फॉर प्राफिट संस्था की अध्यक्ष भी हैं। यह संस्था भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका में टिकाऊ विकास के मसले पर गरीबों और छोटे किसानों के बीच काम करने वाली तृणमूल स्तर के संगठन की मदद करती है।प्रोफेसर मेंशे का अध्ययन क्षेत्र मुख्य रुप से दक्षिण भारत रहा है लेकिन उन्होंने थोड़े दिनों के लिए पश्चिम बंगाल में भी काम किया। पिछले पचास सालों से उनके अध्ययन के दायरे में पर्यावरण, जाति, भूमि सुधार, खेती और महिला जैसे विषय प्रमुख रहे हैं। इन मुद्दों पर बहुप्रकाशित प्रोफेसर मेंशे यूएनडीपी और यूएनएफपी की सलाहकार भी रही हैं। प्रोफेसर मेंशे ने विश्वबैंक के भारत संबंधी कामों में भी सलाहकार की भूमिका निभायी है। यहां प्रोफेसर मेंशे एक साथ फ्रंटलाइन में प्रकाशित एक भेंटवार्ता के संक्षिप्त अंश साभार दिए जा रहे हैं।
 
प्रश्न- आपके जानते हरित क्रांति से हिन्दुस्तान में खेती को क्या नुकसान पहुंचा है।
 
उत्तर- मेरे जानते, सबसे बड़ा नुकसान तो कीटनाशकों और कृत्रिम उर्वरक के इस्तेमाल के कारण मिट्टी का हुआ है। फसल चक्र भी बहुत ज्यादा बदला। हरित क्रांति के दौर में बहुफसली खेती से एकफसली खेती की तरफ झुकाव हुआ।खेती के बदले हुए तौर तरीकों के कारण पानी का इस्तेमाल भी बहुत बढ़ा। इन सबका होना अपने आप में आश्चर्यजनक तथ्य है। इस हरित क्रांति का एक नतीजा तो यही हुआ कि सिर्फ बड़े किसान फायदे में रहे।मुझे याद है कि कैसे किसान मुझसे कहा करते थे- हम बनावटी खाद नहीं डालना चाहते, यह हमें पसंद नहीं है, लेकिन उनके पास कोई विकल्प नहीं था क्योंकि उनके अड़ोस-पड़ोस के किसान बनावटी खाद ही नहीं बनावटी कीटनाशकों का भी इस्तेमाल कर रहे थे। कीटनाशकों के इस्तेमाल के कारण पास के खेतों से कीट उड़कर कीटनाशक ना इस्तेमाल करने वाले किसानों के खेतों में आ रहे थे। जो खेतीहर जमीन वर्षाजल से सिंचित थी वहां तो किसान पुरानी रीति से खेती करते रहे लेकिन सिंचाई की सुविधायुक्त खेतीहर इलाकों के किसान पुरानी रीति से खेती ना कर सके।
फसलचक्र में भी भारी बदलाव आया। भारत विषयक अपने एक पुराने अध्ययन में मैंने इस बात को नोट किया है कि तमिलनाडु के एक गांव में कैसे किसान पहले रागी फिर चावल की अदल-बदल कर खेती करते थे। वे कुछ मोटहन भी उपजाते थे। फिर एक वक्त आया कि बाकी फसलों की खेती इस गांव में रुक गई, किसान सिर्फ चावल उपजाने लगे जबकि मोटहन चावल की तुलना में कहीं ज्यादा पौष्टिक होता है
 
प्रश्न- दूसरे विश्वयुद्ध से पहले अमेरिका में सरकार ने खाद्य-नीतियों का एक कारपोरेट मॉडल अपनाया। इसकी वजह से वहां खेती के तौर-तरीकों में सुनिश्चित बदलाव आये। आखिर भारत में इस मॉडल को क्यों अपनाया गया।

उत्तर- इस जटिल सवाल का उत्तर देने से पहले मैं शुरुआती तौर पर यह बताना चाहूंगी कि कैसे अमेरिका के कृषि-विश्वविद्यालयों में शोध पर अंकुश लगाया गया और इसका भारत से क्या रिश्ता बना।

अमेरिका में जब पहले पहल कृषि-विश्वविद्यालय बने तो विश्वविद्यालयों को खेतिहर जमीन दी गई और उस वक्त सारे शोधों का खर्चा सूबों की सरकारों के मत्थे था।संघीय सरकार इन शोधों पर एक पाई नहीं खर्च करती थी। जब खाद्य पदार्थों से जुड़े व्यवसायिक घराने ज्यादा ताकतवर हुए तो शोधों का ज्यादातर खर्च वे ही उठाने लगे। धीरे-धीरे अमेरिका में शोध के लिए धन देने का काम कंपनियों द्वारा होने लगा और सरकार पीछे हट गई।इसका एक असर यह हुआ कि शोधों की स्वतंत्रता जाती रही। सारा शोधों के मूल में लाभदायकता का एजेंडा हावी हो गया। शोध अब इस लिहाज से  होने लगे कि निवेशक को रुपये पैसों का कितना फायदा पहुंचे। इनका उद्देश्य किसानों को लाभ पहुंचाने का ना रहा।

अमेरिका में खेती के तौर-तरीकों में बदलाव दूसरे विश्वयुद्ध के समय से कहीं पहले आरंभ हो चुका था।यह डॉव केमिकल और डूपान्ट जैसी कंपनियों का दौर था जो अमेरिकी सरकार के लिए जहरीली गैस बना रही थीं। जब युद्ध समाप्त हुआ तो ये कंपनियां खेती के लिए रासायनिक पदार्थ  बनाने लगीं। कंपनियों ने खाद, कीटनाशक और खरपतवारनाशक दवाइयां बनाना शुरु किया। शुरुआती दौर में इस काम में ढेर सारी कंपनियां लगीं थी फिर वे एक छतरी के नीचे इक्कठ्ठा होने लगीं। कंपनियों की संख्या कम हुई मगर उनका आकार बढ़ गया। यह सारा कुछ चंद सालों में नहीं एक लंबी अवधि (50 सालों) में हुआ। हरित क्रांति के जरिए यही विचार भारत चला आया।

सन् 1960 का दशक भारत के लिए काफी कठिन था। देश में भारी सूखा पडा था और अमेरिका ने भारत को सहायता देने की बात कही लेकिन भारत को इस सहायता को हासिल करने के लिए शर्तें स्वीकार करनी पड़ीं। भारत के कई युवा और मेधावी कृषिविज्ञान के अध्येता अमेरिका भेजे गए। वहां अध्ययन के दौरान उनके दिमाग पर नए विचारों की परत चढ़ायी गई। हालात यहां तक आ पहुंचे कि भारत में कृषि-विश्वविद्यालय भी अमेरिकी खेती के इस मॉडल के प्रभाव से अछूते नहीं रह सके और उनमें अमेरिका के समान ही कारपोरेटी हितसाधक पाठ्यक्रम पढ़ाया जाने लगा। कृषि वैज्ञानिकों की पूरी दो पीढी ने अपने दिमाग पर अमेरिका में बिछाई गई विचारों की परत के असर में एक खास तर्ज पर सोचना शुरु किया। दरअसल अमेरिकी कृषि विश्वविद्यालयों और हिन्दुस्तानी कृषि विश्व विद्यालयों के सरोकारों में यह साझा लगातार चला आ रहा है ।   
 
ये सारे लोग एक खास तरह से आधुनिक हलाने वासे शिक्षाशास्त्र के असर में थे। इस शिक्षाशास्त्र में मॉडर्न का मतलब था कि हाथ गंदे नहीं करने बल्कि मशीनों का इस्तेमाल करना है। मॉडर्न का मतलब था खेती में आदमी का कम से कम और ज्यादा से ज्यादा मशीनों का इस्तेमाल। एक विश्वास ने चतुर्दिक जड़ जमायी कि आधुनिकता, वृद्धि और प्रगति पर्यायवाची हैं और एक ही रास्ते पर चलकर इन्हें हासिल किया जा सकता है।उस वक्त की नीतियों में इन विश्वासों की रसाई हुई क्योंकि दुनिया आर्थिक रुप से जर्जर थी, बेरोजगारी बेतहाशा थी और विश्वव्यापी स्तर पर खाद्यसंकट था।खाद्यसंकट के तर्क का इस्तेमाल करके किसानों को उनकी चयन की स्वायत्तता, परंपरागत खेती के साजोसामान और ज्ञान से वंचित किया गया। भारत सहित पश्चिमी दुनिया के लोगों को बड़े लुभावने तरीके से कारपोरेटी विचार पद्धति में यह कहते हुए दीक्षित किया गया कि व्यक्तिवाद सबसे कारगर तरीका है या फिर यह कि समाजवाद के कई रुप हैं और हर रुप समान ढंग से कारगर नहीं। इस विश्वास को बढ़ावा दिया गया कि मात्र निजी उद्योगों के बल पर दुनिया से खाद्यसंकट खत्म किया जा सकता है।
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प्रश्न- वे कौन सी प्रक्रियाएं थीं जिन्होंने भारतीय खेती का चेहरा ही बदल दिया।
 
उत्तर- तीन प्रक्रियाओं ने भारत की परंपरागत खेती में आमूलचूल बदलाव किया। पहला, हरित क्रांति। दूसरा, 1991 में भारत में किया गया आर्थिक उदारीकरण और तीसरा, जार्ज बुश और मनमोहन सिंह जुलाई 2005 का महामेल जिसमें खेती को लेकर अमेरिका और भारत में ज्ञानात्मक नवाचार पर सहमति हुई। इससे अमेरिका की बड़ी खाद्य-निर्माता कंपनियों के लिए भारत के दरवाजे खुल गए।

बहरहाल, अब भी लोग हैं जो परंपरागत खेती के पुनरोद्धार की कोशिशों में लगे हैं। एक खास बात से सतर्क रहने की जरुरत है। बड़ी कंपनियां इस विचार को फैलाने में लगीं हैं कि अगर कोई उनके वैज्ञानिक नवाचारों का विरोध कर रहा है तो वह विज्ञान और तकनीक का विरोधी है और ठीक इसी कारण वह आधुनिकता का भी विरोधी है। मेरा कहना यह है कि ये कंपनियां जिसे आधुनिकता कहती हैं वह आधुनिकता है ही नहीं और फिर एक बात यह भी है कि ये कंपनियां पर्यावरण विज्ञान की बातों की खुद ही भरपूर अनदेखी करती हैं। कॉलेज कार्यसाधक ज्ञान देने के मामले में तो बढ़चढ़ कर आगे आते हैं लेकिन पर्यावरण विज्ञानों को खास तरजीह नहीं देते। पर्यावरण से संबंधित विज्ञानों में शोध हो तो उसे बड़ी सीधा-सादा बनाने पर जोर रहता है जबकि जोर बाकी विज्ञानों के समान इसमें भी पर्याप्त बढ़ावा देने पर होना चाहिए।

प्रश्न- आपके मौजूदा सरोकार क्या हैं।

मेरे मौजूदा सरोकार टिकाऊ विकास पर आधारित खेती और वैकल्पिक खेती से जुड़े हैं। दो बातों की मुझे खास चिन्ता है। एक तो यही कि पर्यावरण का तेजी से विनाश हो रहा है और कीटनाशकों, खरपतवारनाशकों , जीनसंशोधित बीजों आदि के जरिए पूरा पर्यावरण संदूषित हो रहा है। दूसरे, खेती पर व्यवसायिक कंपनियां हावी हो रही हैं और उनकी ताकत बढते जा रही है। मुझे याद है, एक जगह मैंने पढ़ा कि मोन्साटो का एक पब्लिक रिलेशन का बंदा कह रहा है- जब हम धरती, पानी और समुद्र पर नियंत्रण कर सकते हैं तो हम दुनिया का पेट भी भर सकते हैं। मैं यह पढ़ कर बड़ी हैरत में थी। इसका सीधा मतलब यह था कि एक या चंद कंपनियां पूरी मानवता के हिस्से में आने वाले आहार पर कब्जा जमा सकती हैं। यह तो बड़ी भयावह बात है।

ऐसा भी नहीं है कि कई बड़ी कंपनियों का दुनिया की खाद्य-व्यवस्था पर नियंत्रण है।मेरे जानते कुल चार-पाँच कंपनियां ही ऐसी हैं। दिलचस्प यह तथ्य है कि इन कंपनियों के डायरेक्टर हर जगह मौजूद होते हैं।एक की बैठक में दूसरा मौजूद होता है। यहां तक कि भारत में भी, बुश और मनमोहन सिंह के बीच हुए करार के बाद जिस तरह से बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए दरवाजे खोले गए हैं वह अपने आप में भयावह है। मेरे ख्याल से उदारीकरण के बाद से भारतीय उद्योगों की कमर टूट चुकी है। एक तो उदारीकरण ने भारतीय उद्योगों की स्वायत्तता पर चोट की। एक बार आप बहुराष्ट्रीय निगमों का हिस्सा बन जायें तो आप पैसे भले ज्यादा कमा लें लेकिन आपकी स्वायत्तता जाते रहती है। भारत की अर्थव्यवस्था बड़ी तेजी से बढ़ रही है लेकिन इससे फायदा किसको हो रहा है। यह फायदा अभी तक गरीबों के हिस्से में तो आया नहीं है। खेतिहर मजदूरों को इससे क्या फायदा हुआ है।
  
प्रश्न- भारत के अर्थशास्त्रियों और कृषि-वैज्ञानिकों को अब किन बातों पर ध्यान देना चाहिए।
 
उत्तर- भारतीय कृषि-वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों को गरीब किसानों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। उन्हें यह नहीं मानना चाहिए कि एक हेक्टेयर क्षेत्रफल का खेत छोटा होता है। उन्हें छोटे खेतों पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए। मुझे उम्मीद है कि कृषि-विभाग छोटे जोत को बढ़ावा देगा और वैकल्पिक पद्धति की खेती को प्रोत्साहित करेगा। खेती को भोजन, भूमि, बीज और पानी के अधिकार से जोड़कर देखने की जरुरत है।खेती के परंपरागत ज्ञान की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए ।