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अधिक बच्चे पैदा करने की शक्तियों जैसे जुमलों से गुमराह होने वाले मतदाताओं को इससे संबंधित आधिकारिक डेटा जरूरी देखने चाहिए!

अन्य धार्मिक समुदायों के पुरुषों की तुलना में मुस्लिम पुरुषों द्वारा बच्चे पैदा करने को अक्सर एक राजनैतिक प्रोपैगेंडा के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है और चुनाव से ठीक पहले भारतीय बहुसंख्यक हिंदुओं से वोट प्राप्त करने के लिए एक विभाजनकारी प्रोपैगेंडा बनाया जाता है. मानव विकास, रोजगार सृजन, और गरीबी में कमी जैसे सकारात्मक एजेंडे पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, चुनावों से ठीक पहले राजनीतिक अभियान अक्सर केवल सांप्रदायिक प्रचार भर तक समेट दिए जाते हैं(जब प्रतिद्वंद्वियों के बीच सूचित बहस और चर्चा के बदले बहुत कुछ होता है). हमारे समाज में जहां एक व्यक्ति की व्यक्तिपरकता वस्तुनिष्ठ सत्य से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है, डेटा-आधारित विश्लेषण शायद हमें एक स्पष्ट तस्वीर (या निष्पक्षता के साथ) देखने में मदद करे.

अतीत में, 'हम पांच, हमारे पचीस' जैसे अफवाहबाजी नारे का इस्तेमाल एक से अधिक बार इस मिथक को बनाने के लिए किया गया है कि मुस्लिम पुरुष अन्य धार्मिक पृष्ठभूमि के पुरुषों की तुलना में अधिक पौरुष (यानी, यौन सक्रिय) हैं. नतीजतन, मुस्लिम पुरुषों पर एक से अधिक बार शादी करने का आरोप लगाया जाता है और उनकी एक से अधिक पत्नियां होती हैं जिनसे कई-कई बच्चे पैदा होते हैं. इस तथ्य के कारण, भारत की कुल जनसंख्या में मुसलमानों का अनुपात हिंदुओं की तुलना में बढ़ रहा है. मुस्लिम पुरुषों की कथित पौरुष शक्तियों को उनके मांसाहारी भोजन (लाल मांस - मटन, बीफ, आदि सहित), प्याज, लहसुन, और गर्म मसालों / अन्य मसालों की अत्यधिक खपत, भोजन और उनके धार्मिक विश्वास और प्रथाओं से जोड़ा गया है.

यौन सक्रियता

इस न्यूज अलर्ट में, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 के आंकड़ों का उपयोग करते हुए, हम समझने की कोशिश करेंगे है कि क्या सच में ही मुस्लिम पुरुष अन्य धार्मिक पृष्ठभूमि के पुरुषों की तुलना में अधिक पौरुष (या यौन सक्रिय) हैं.

तालिका 1: धार्मिक पृष्ठभूमि के अनुसार, पिछले संभोग के समय के आधार पर 15-49 वर्ष की आयु के पुरुषों का प्रतिशत वितरण, भारत, 2015-16

नोट: 1. पिछले 1 सप्ताह के भीतर यौन संबंध रखने वाले पुरुष शामिल नहीं हैं

2. पिछले 1 और 4 सप्ताह के भीतर संभोग करने वाले पुरुष शामिल नहीं हैं

3. उनमें से जिन्होंने कभी संभोग किया है

स्रोत: तालिका 6.9.2 सबसे हाल की यौन गतिविधि: पुरुष, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 की रिपोर्ट, 666 का पृष्ठ 205, देखने के लिए कृपया यहां क्लिक करें

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2015-16 में, राष्ट्रीय स्तर पर, कभी भी संभोग न करने वाले पुरुषों का अनुपात मुसलमानों (37.5 प्रतिशत) में सबसे अधिक था, इसके बाद ईसाई (35.3 प्रतिशत), जैन (33.4 प्रतिशत), हिंदू (32.3 प्रतिशत), बौद्ध / नव-बौद्ध (32.1 प्रतिशत), और सिख (31.1 प्रतिशत) थे. कृपया तालिका-1 देखें.

पिछले सप्ताह के दौरान अंतिम संभोग करने वाले पुरुषों का अनुपात सिखों (35.9 प्रतिशत) में सबसे अधिक था, इसके बाद हिंदुओं के साथ-साथ जैन (31.7 प्रतिशत प्रत्येक), मुस्लिम (30.6 प्रतिशत), बौद्ध / नव-बौद्ध (26.2 प्रतिशत), और ईसाई (24.5 प्रतिशत) थे, यदि हम 'अन्य' पर विचार नहीं करते हैं.

पिछले चार हफ्तों के भीतर आखिरी बार संभोग करने वाले पुरुषों का अनुपात (पिछले 1 सप्ताह के भीतर यौन संबंध रखने वाले पुरुषों को छोड़कर) जैनियों (19.1 प्रतिशत) में सबसे अधिक था, इसके बाद सिख (17.6 प्रतिशत), ईसाई (16.1 प्रतिशत), हिंदू (15.7 प्रतिशत), बौद्ध/नव-बौद्ध (15.6 प्रतिशत), और मुसलमान (14.8 प्रतिशत) थे.

एक वर्ष के भीतर अंतिम बार संभोग करने वाले पुरुषों का अनुपात (पिछले 1 और 4 सप्ताह के भीतर यौन संबंध रखने वाले पुरुषों को छोड़कर) बौद्धों / नव-बौद्धों (16.5 प्रतिशत) में सबसे अधिक था, इसके बाद सिखों के साथ-साथ हिंदू (12.4 प्रतिशत प्रत्येक), ईसाई (10.6 प्रतिशत), मुस्लिम (10.3 प्रतिशत), और जैन (9.8 प्रतिशत) थे, यदि हम 'अन्य' की उपेक्षा करते हैं.

पिछले संभोग के बाद के दिनों का माध्यम (जिन लोगों ने कभी संभोग किया है) मुसलमानों (5.8 दिन) और बौद्धों/नव-बौद्धों (8.2 दिन) के मामले में भिन्न-भिन्न है. माध्यम एक क्रमबद्ध, आरोही या अवरोही, संख्याओं की सरणी में मध्य संख्या है, और इसे औसत से अधिक उस डेटा सेट का अधिक वर्णनात्मक माना जाता है.

एक से अधिक जीवन साथी और लिंग अनुपात की संभावना

क्या यह सच है कि अन्य धार्मिक समुदायों के पुरुषों की तुलना में मुस्लिम पुरुषों में बहुविवाह अधिक आम है? 'मुसलिम पूअरर, लैस ऐजुकेटिड दैन हिंदुज, बट देयर किड्स मोर लाइक्ली टू सर्वाइव’, नामक अपने लेख में भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त, डॉ एसवाई कुरैशी ने कहा है कि 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम लागू होने के बाद बहुविवाह की घटनाओं में समय के साथ कमी आई है (यानी, 1931 से 1960 तक) इस अधिनियम ने हिंदुओं, सिखों, बौद्धों और जैनियों के लिए बहुविवाह पर प्रतिबंध लगा दिया,

तालिका 2: भारत में बहुविवाह की घटनाएं

स्रोत: 'मुसलिम पूअरर, लैस ऐजुकेटिड दैन हिंदुज, बट देयर किड्स मोर लाइक्ली टू सर्वाइव’-एसवाई कुरैशी, दिप्रिंट.इन, 17 फरवरी, 2021, कृपया यहां क्लिक करें.

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हिंदुओं में बहुविवाह की घटनाएं 1931-40 के दौरान 6.79 प्रतिशत से गिरकर 1941-50 में 7.15 प्रतिशत हो गई थीं, और 1951-60 में और अधिक गिरकर 5.06 रह गई थीं. इसी तरह, मुसलमानों के बीच बहुविवाह की घटनाएं 1931-40 के दौरान 7.29 प्रतिशत से घट कर 1941-50 में 7.06 प्रतिशत हो गईं और 1951-60 में यह और अधिक घटकर 4.31 रह गईं. कृपया तालिका-2 देखें.

एसवाई कुरैशी के अनुसार, समाज कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी की गई भारत में महिलाओं की स्थिति पर समिति की रिपोर्ट (1974), भारत में बहुविवाह को देखने के लिए अंतिम आधिकारिक अध्ययन थी. 1974 में सरकार द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि बहुविवाह का आंकड़ा मुसलमानों में 5.7 प्रतिशत, हिंदुओं में 5.8 प्रतिशत, जैनियों में 6.72 प्रतिशत, बौद्धों में 9.7 प्रतिशत और आदिवासी समुदायों में 15.25 प्रतिशत था.

रोहन वेंकटरामकृष्णन ने अपने लेख 'मुस्लिम महिलाओं और भारत में बहुविवाह के बारे में आश्चर्यजनक तथ्य' (2014) में उल्लेख किया था कि एक बहुविवाहित हिंदू की 1.77 पत्नियां, एक बहुविवाहित मुस्लिम की 2.55, बहुविवाहित ईसाई की 2.35 और एक बहुविवाहित बौद्ध की 3.41 पत्नियां होने की संभावना थी. (2005-06 में किए गए एनएफएचएस-3 के अनुसार)

तालिका 3: प्रमुख राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में धर्म के अनुसार लिंग अनुपात - जनगणना 2011

स्रोत: भारत में महिलाएं और पुरुष 2020: भारत में लिंग संबंधी संकेतकों का एक संकलन, एनएसओ, एमओएसपीआई, कृपया यहां क्लिक करें.

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क्या यह संभव है कि देश में प्रत्येक मुस्लिम पुरुष की एक से अधिक पत्नियां हों? इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों में लिंगानुपात प्रति 1,000 पुरुषों पर कम से कम 2,000 महिलाओं का होना चाहिए. 2011 में, धार्मिक समूहों यानी हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन के लिए लिंग अनुपात क्रमशः 939, 951, 1,023, 903, 965 और 954 था. इसका मतलब यह है कि इतनी पर्याप्त महिलाएं नहीं हैं, जिससे एक पुरुष को एक से अधिक पत्नियों से विवाह करना संभव हो सके, भले ही वह मुस्लिम या हिंदू या किसी अन्य धर्म से हो. हमारे समाज में प्रचलित लिंग चयन, पुत्र वरीयता और लिंग भेदभाव ने लिंग अनुपात में यह असंतुलन पैदा कर दिया है.

 

References:

National Family Health Survey 2015-16, International Institute for Population Sciences (IIPS), please click here to access  

Women and Men in India 2020: A Compilation of Gender-related Indicators in India, National Statistical Office (NSO), Ministry of Statistics and Programme Implementation (MoSPI), please click here to access

Interview: SY Quraishi, author, The Population Myth: Islam, Family Planning and Politics in India -Sunetra Choudhury, Hindustan Times, 19 February, 2021, please click here to access

Muslims poorer, less educated than Hindus. But their kids more likely to survive till age 5 -SY Quraishi, ThePrint.in, 17 February, 2021, please click here to access  

Video: Busting population myths with Dr SY Quraishi | On The Record, Hindustan Times/ Trivedi Centre for Political Data, 9 February, 2021, please click here and here to access 

Long and deceitful history of the ‘love jihad’ bogey -Mohan Rao, The Indian Express, 1 December, 2020, please click here to access

Against My Will - Defying the practices that harm women and girls and undermine equality (released in June 2020), published by the United Nations Population Fund, please click here and here to access 

Muslim women and the surprising facts about polygamy in India -Rohan Venkataramakrishnan, Scroll.in, 8 July, 2014, please click here to access 

Scars of memory -Ziya Us Salam, Frontline.in, 21 July, 2017, please click here and here to access