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बात सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की!

क्या इस देश को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की जरूरत है? जिस मकसद को लेकर इन बैंकों का गठन किया गया था क्या वो पूरा कर पा रही हैं? क्या पब्लिक सेक्टर के बैंक निजी क्षेत्र के बैंकों के साथ कुशलतापूर्वक प्रतिस्पर्धा कर पा रही हैं? आज के न्यूज़ अलर्ट समाचार में इन्हीं प्रश्नों का उत्तर ढूंढने की कोशिश करेंगे–

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की कुशलता

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के एक रिसर्च विभाग की ओर से लिखे गये लेख के अनुसार, बाजार की असफलताओं के जवाब में सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों का गठन किया गया था. लेकिन अक्सर बैंकों से होने वाले ‘सामाजिक लाभ’ की तुलना में ‘सामाजिक लागत’ अधिक रही.

आपको बता दे कि पूंजीवादी अर्थतंत्र में दो धाराएं मुख्यत पायी जाती है. जिसमें एक धारा कहती है कि सरकार का बाजार में कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए. दूसरी धारा सरकार को समाज के कल्याण हेतु सीमित मात्रा में हस्तक्षेप करने को कहती है. 

जब पहली वाली धारा के तहत बाजार को स्वनियंत्रण पर छोड़ा तो समाज के वंचित तबकों तक लाभ नहीं पहुंच पा रहा था इसीलिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का गठन किया गया.

 

रिसर्च विभाग के सदस्यों ने 2010 से लेकर 2022 तक सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों पर एक अध्ययन किया. अध्ययन में पाया कि बैंकों की कुशलता हमेशा दबी ही रही क्योंकि बैंकों का ध्यान केवल मुनाफे में बढ़ोतरी पर ही रहा.
हालांकि, इन बैंकों को सामाजिक फायदे के नजरिए से प्रेरित वित्तीय समावेशन के दृष्टिकोण से देखें तो निजी बैंकों की तुलना में यह अधिक सफल हुई हैं, जोकि इनके गठन के पीछे मूल कारण भी था.

बार–बार यह आरोप लगाया जाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र की बैंक निजी बैंकों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे. लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों ने कम श्रम लागत लगाकर बेहतरीन परिणाम दिए हैं. ऐसे ही उपाय अन्य कमियों को दूर करने के लिए भी अपनाने पड़ेंगे.


वित्तीय समावेशन में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भूमिका–


ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाली अधिकतर कर्ज की मांग को पब्लिक सेक्टर की बैंक पूरा करती हैं. इसी का सबूत ग्रामीण क्षेत्र में निजी क्षेत्र वाले बैंकों की तुलना में पब्लिक सेक्टर के बैंकों के शाखाओं की संख्या अधिक है. ऐसा ही नजारा एटीएम मशीनो की संख्या के मामले में है.
जहां बैंक शाखाओं की पहुंच नहीं होती है वहां वित्तीय सेवाएं पहुंचाने के लिए बिजनेस प्रतिनिधि आउटलेट की स्थापना की जाती है. ग्रामीण क्षेत्र में सबसे ज्यादा आउटलेट पब्लिक सेक्टर की बैंकों द्वारा खोले गए हैं. इन आउटलेट्स ने वित्तीय समावेशन को और गहरा किया है.
वित्तीय समावेशन को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री जन धन योजना की शुरुआत की गई. जिसका मकसद था हर घर से बैंक में एक खाता खुले. जुलाई 2022 तक के आंकड़ों के अनुसार इस योजना से 45 करोड़ लाभार्थी जुड़े हैं इनमें से 78% लाभार्थियों के खाते पब्लिक सेक्टर की बैंकों से खुले हैं. (इनमें भी 60% खाते ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में स्थित बैंकों से खुलवाएं गए हैं, जहाँ वित्तीय समावेशन कम हुआ था).

इसी अध्ययन के अनुसार निजी बैंक,प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र के लिए निर्धारित कर्ज सीधे मार्ग से नहीं दे पायी. उसे कृत्रिम रूप (PSLCs) का सहारा लेना पड़ता है.

प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र- का तात्पर्य ऐसे क्षेत्रों से है जिन्हें भारत सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा देश की बुनियादी ज़रूरतों के विकास के लिये जरूरी माना जाता है. इसी कारण उन्हें अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक प्राथमिकता दी जाती है.


 सार्वजानिक क्षेत्र की बैंकों में जनता का विश्वास


जनता का विश्वास निजी क्षेत्र के बैंकों की तुलना में पब्लिक सेक्टर के बैंकों पर अधिक है. मजबूत सार्वजानिक क्षेत्र की बैंकों की मौजूदगी के कारण आर्थिक मंदी के दौर में भी जनता का विश्वास बैंकों पर बना रहता है. हालांकि, हाल की कुछ घटनाओं ने इस विश्वास को कम किया है.

पब्लिक सेक्टर की बैंकों का विस्तृत दायरा


यह बैंक केवल किसानों को कर्ज देने तक सीमित नहीं हैं. वाणिज्यिक उपयोग के लिए भी व्यापक ऋण दिया जाता है. भारतीय अर्थव्यवस्था जब मंदी के अंधेरे में जा रही थी तब इन्हीं पब्लिक सेक्टर की बैंकों ने कर्ज दिया था.
पब्लिक सेक्टर के बैंक वित्तीय क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के गठन के लिए भी कर्ज प्रदान करती हैं.
मौद्रिक नीति को धरातल पर पहुंचाने में सार्वजानिक क्षेत्र की बैंक बेहतरीन प्रदर्शन करती हैं.


मौद्रिक नीति मौद्रिक नीति अधिनियम में दिए गए लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये मौद्रिक साधनों (रेपो दर, रिवर्स रेपो दर तरलता समायोजन सुविधा इत्यादी )     का प्रयोग कर जिस नीति की घोषणा रिजर्व बैंक द्वारा की जाती है.


लेखकों का कहना है कि पिछले ईजिंग चक्र को देखें तो निजी बैंकों की तुलना में पब्लिक सेक्टर की बैंकों ने अधिक कर्ज प्रदान किया है.

अनुशंसाएं
सार्वजानिक क्षेत्र के बैंकों की खाताबही से बेड लोन की समस्या से निपटने के लिए राष्ट्रीय परिसंपत्ति
पुनर्निमाण कंपनी
का गठन किया गया था. बजाय सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों का निजीकरण किये कुछ ऐसे ही कदम और उठाये जाने चाहिए ताकि बैंक के सामाजिक उद्देश्य- वित्तीय समावेशन भी प्रभावित न हो.

ऐसे ऋण जो समय पर नहीं चुकाए गये हैं और भविष्य में भी उनके चुकाने की सम्भावना कम है, बेड ऋण कहलाते हैं. इन्हीं बेड ऋणों को अपने कब्जे में लेकर धन की वसूली करने के लिए गठित कंपनी को राष्ट्रीय परिसंपत्ति पुनर्निमाण कंपनी कहते हैं.


References

Privatisation of Public Sector Banks: An Alternate Perspective, in RBI Bulletin August 2022, Volume LXXVI, Number 8, please click here and here to access

RBI clarifies on recent bulletin article on privatisation of public sector banks, Livemint.com, 19 August, 2022, please click here to access

RBI Bulletin: A big bang approach to PSB privatisation may do more harm than good, Moneycontrol.com, 18 August, 2022, please click here to access

Image: Inclusive Media for Change/ Shambhu Ghatak