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आप्रवासियों और शरणार्थियों की संख्या को लेकर फैलाए गए भ्रमों और तथ्यहीन कुतर्कों को खारिज करते आंकड़ें

विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्रोतों के आंकड़ें आप्रवासियों और शरणार्थियों की संख्या को लेकर फैलाए गए भ्रमों और तथ्यहीन कुतर्कों को खारिज करते हैं.
 
अनेकों मीडिया रिपोर्टें यह खुलासा करती हैं कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRIC), जिसे देशभर में लागू किए जाने की उम्मीद है, के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में डिटेनशन सेंटर बनाए जा रहे हैं. हालांकि मीडिया के सामने सरकार एनआरसी और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के बीच किसी भी प्रकार के संबंध से इनकार कर रही है, लेकिन गृह मंत्रालय के राज्य मंत्री श्री हरिभाई परथीभाई चौधरी द्वारा सवाल नंबर 4380 (लोकसभा में 21 अप्रैल 2015 को दिया गया उत्तर) का उत्तर, सरकार की कथनी को खारिज करता है. अपने उत्तर में चौधरी ने स्पष्ट कर दिया था कि एनपीआर को पूरा किया जाएगा और इसे तार्किक दिशा दी जाएगी, जो कि एनआरसी को लागू करना है और एनपीआर के तहत हर सामान्य निवासी की नागरिकता को जांचने के बाद उन्हें राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी किए जाएंगे. मंत्री ने कहा कि एनपीआर प्रत्येक नागरिक की नागरिकता की स्थिति की पुष्टि करके एनआरसी लागू करने के लिए मुख्य डेटाबेस के रूप में काम करेगा. जनगणना अधिकारियों और पर्यवेक्षकों द्वारा एनपीआर 2020 के अपडेशन के लिए उपयोग किए जाने वाली निर्देश पुस्तिका को देखने के लिए कृपया यहां क्लिक करें.
 
यह कई (राजनीतिक नेताओं सहित) लोगों का मानना है कि पड़ोसी देशों (विशेष रूप से बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जहां इस्लाम आधिकारिक धर्म है) के अवैध आप्रवासी देश को बहुत नुकसान पहुंचा रहे हैं. “इंक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज” मीडिया ने संयुक्त राष्ट्र के नए अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी स्टॉक 2019 के डेटासेट से निकाले गए आंकड़ों का विश्लेषण किया है, जो पिछले तीन दशकों के दौरान भारत में आप्रवासियों की बढ़ती जनसंख्या के बारे में फैलाए गए मिथकों का पर्दाफाश करता है.
 
उदाहरण के लिए, बांग्लादेश के मामले को ही लें. तालिका -1 से पता चलता है कि देश में बांग्लादेश के प्रवासियों की संख्या पिछले कुछ वर्षों में लगातार गिरी है. भारत में बांग्लादेश के प्रवासियों की संख्या 1990 में 43.75 लाख, 1995 में 41.27 लाख, 2000 में 38.79 लाख, 2005 में 35.84 लाख, 2010 में 32.89 लाख, 2015 में 31.56 लाख और 2019 में 31.04 लाख थी.
 
तालिका 1: 1990 से 2019 तक भारत में बांग्लादेश, अफगानिस्तान, भूटान, चीन, नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान, म्यांमार और विश्व की दूसरी जगहों से आए प्रवासियों की कुल संख्या
  Table 1 Total stock of migrants from Bangladesh Afghanistan Bhutan Nepal China Sri Lanka Pakistan Myanmar and World in India at mid-year from 1990 to 2019
स्रोत: अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी स्टॉक 2019, संयुक्त राष्ट्र का डेटासेट. एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें.  
नोट: चीन के डेटा में हांगकांग SAR और मकाओ SAR शामिल नहीं हैं
तालिका -1 के आंकड़ों को स्पष्ट रूप से देखने के लिए कृपया यहां क्लिक करें.
कृपया तालिका का डेटा https://bit.ly/399OL0B से एक्सेस करें.
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इसके विपरीत, पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश में भारतीय प्रवासियों की संख्या तेजी से बढ़ी (तालिका -2 से देखिए) है. बांग्लादेश में भारत के प्रवासियों की संख्या वर्ष 1990 में 13,339, 1995 में 18,075, 2000 में 22,811, 2005 में 27,687, 2010 में 32,301, 2015 में 34,431 और 2019 में 34,884 थी. तालिका -2 के मुकाबले तालिका -1 की तुलना में, यह हो सकता है कि विभिन्न वर्षों के दौरान भारत में बांग्लादेशी प्रवासियों की संख्या बांग्लादेश में भारतीय प्रवासियों की संख्या से अधिक तेजी से बढ़ी हो.
 
अन्य पड़ोसी देशों की तुलना में, भारत में बांग्लादेश के प्रवासियों की संख्या विभिन्न वर्षों में सबसे अधिक रही है. कृपया तालिका -1 देखें.
 
तालिका 2: वर्ष 1990 से 2019 के मध्य तक बांग्लादेश, अफगानिस्तान, भूटान, नेपाल, चीन, श्रीलंका, पाकिस्तान, म्यांमार और विश्व की अन्य जगहों में भारत के प्रवासियों की संख्या.
  Table 2 Total stock of migrants from India in Bangladesh Afghanistan Bhutan Nepal China Sri Lanka Pakistan Myanmar and World at mid-year from 1990 to 2019

NA का अर्थ है 'डेटा प्रदान नहीं किया गया'
तालिका -2 के डेटा को स्पष्ट रूप से देखने के लिए कृपया यहां क्लिक करें
कृपया तालिका के डेटा को https://bit.ly/399OL0B से एक्सेस करें.
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तालिका -1 बताती है कि 1990 और 2019 के बीच भारत में पाकिस्तान के प्रवासियों की संख्या (19.21 लाख से 10.83 लाख) लगभग आधी हो गई है. पाकिस्तान में भारतीय प्रवासियों की संख्या 1990 और 2019 के बीच 28.18 लाख से घटकर 15.88 लाख हो गई है. टेबल -2 के मुकाबले तालिका -1 की तुलना करने पर, विभिन्न वर्षों के दौरान यह देखा जा सकता है कि पाकिस्तान में भारतीय प्रवासियों की संख्या हमारे देश के पाकिस्तानी प्रवासियों की संख्या से अधिक है. 
 
1990 से 2019 के बीच भारत में दुनिया के विभिन्न हिस्सों के प्रवासियों की संख्या 75.95 लाख से घटकर 51.55 लाख हो गई है. इसके विपरीत दुनिया के अन्य देशों में भारतीय प्रवासियों की संख्या 1990 और 2019 के बीच (66.23 लाख से 1.75 करोड़) दुगनी से अधिक हो गई है. जन्म स्थान के आधार पर, सभी अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों में से एक तिहाई प्रवासी सिर्फ दस देशों से हैं. संयुक्त राष्ट्र की एक समाचार रिपोर्ट यह बताती है कि इन दस देशों में भारत अपने 1.75 करोड़ प्रवासियों की वजह से नंबर एक पर है.
 
संयुक्त राष्ट्र का एक दस्तावेज, जो अंतर्राष्ट्रीय आप्रवासी स्टॉक 2019 के डेटासेट से जुड़ा है, यह स्पष्ट करता है कि देश या क्षेत्र द्वारा अंतर्राष्ट्रीय आप्रवासी संख्या का अनुमान लगाने के लिए उपयोग किए जाने वाले अधिकांश डेटा जनसंख्या सेंससों से प्राप्त किए गए थे. इसके अतिरिक्त, जनसंख्या रजिस्टर और राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधि सर्वेक्षणों ने अंतर्राष्ट्रीय प्रवासियों की संख्या और संरचना के बारे में जानकारी प्रदान की है. जन्म स्थान के डेटा की कमी वाले अधिकांश देशों में, जिन लोगों की नागरिकता और उनके देश के बारे में जानकारी उपलब्ध थी और अंतर्राष्ट्रीय प्रवासियों की पहचान के लिए आधार के रूप में उसे इस्तेमाल किया गया था,  उन मामलों में प्रभावी रूप से विदेशी नागरिकों को अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों के समान माना गया है.
 
संयुक्त राष्ट्र के ‘अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी स्टॉक 2019’ नामक दस्तावेज़ भी बताते हैं कि प्रवासी स्टॉक का आकलन करते समय विदेशी नागरिकों को अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों के समान समझा जाना त्रुटिपूर्ण है. जिन देशों में खून के रिश्तों के आधार पर नागरिकता प्रदान की जाती है, वहां प्रवास के दौरान पैदा होने वाले लोगों को भी अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों की संख्या में शामिल किया जा सकता है, भले ही वे विदेश में कभी नहीं रहे हों. इसके विपरीत, जब नागरिकता का उपयोग अंतर्राष्ट्रीय प्रवासियों को परिभाषित करने के मानदंड के रूप में किया जा रहा है तो विदेश में पैदा हुए व्यक्ति, जोकि अपने देश में आकर रहने लगे, उन्हें भी अंतरराष्ट्रीय प्रवासी स्टॉक से बाहर रखा गया है. 
 
संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेज़ यह चेताते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय प्रवासियों की पहचान के आधार के रूप में देश की नागरिकता के उपयोग से अंतर्राष्ट्रीय प्रवासियों की पीढ़ियों पर भी प्रभाव पड़ता है. जिन देशों में नागरिकता मुख्य रूप से जातीय-रिश्ते(खून के रिश्ते) के आधार पर दी जाती है, वहां अंतर्राष्ट्रीय प्रवासियों की कोख से पैदा होने वाले बच्चों को भी विदेशी नागरिक माना जाता है और जिसकी वजह से उन्हें अंतर्राष्ट्रीय प्रवासियों की गिनती में शामिल किया जाता है. इसके विपरीत, उन देशों में जहां नागरिकता जन्म (जूस सॉलि) के आधार पर प्रदान की जाती है, वहां अंतर्राष्ट्रीय प्रवासियों को पैदा होने वाले बच्चों को जन्म के समय नागरिकता दी जाती है और इस प्रकार वे अंतराष्ट्रीय प्रवासी स्टॉक से बाहर हो जाते हैं.
 
इस तरह की कमियों के बावजूद, अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी स्टॉक 2019 के लिए संयुक्त राष्ट्र डेटासेट में नागरिकता आधारित सूचनाओं का उपयोग किया गया था क्योंकि अगर ऐसा नहीं करते तो दुनिया के सभी देशों का लगभग 19 प्रतिशत के बराबर यानी 45 देशों के आंकड़ें जारी करने में अक्षम होते.
 
2011 की जनगणना के आंकड़े
 
21 अगस्त, 2019 को Newsclick.in में प्रकाशित एक समाचार रिपोर्ट के अनुसार, 2011 की जनगणना के दौरान भारत में 23 लाख व्यक्ति ऐसे थे, जिन्होंने अपना पिछला निवास स्थान बांग्लादेश बताया था, जबकि 2001 की जनगणना के दौरान, ऐसे लोगों की संख्या 31 लाख के करीब थी.
 
तालिका 3: जनगणना में प्रवासियों के अंतिम निवास स्थान और निवास की अवधि (2011) के अनुसार प्रवासियों का वर्गीकरण - 2011
Table 3 Migrants classified by country of last residence, sex and duration of residence in the place of enumeration in 2011
Source: Census 2011, please click here to access   
नोट: कृपया तालिका के डेटा को https://bit.ly/399OL0B से एक्सेस करें.
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तालिका -3 से पता चलता है कि बांग्लादेश (उनके आखिरी निवास) से 21,961 व्यक्तियों थे, जो एक साल से भी कम के लिए भारत में रहे थे (अर्थात वे 2010-2011 के दौरान देश में रहने आए थे). 2011 की जनगणना में पाया गया था कि बांग्लादेश से आए 62,403 लोग पिछले 1-4 वर्षों से भारत में रह रहे थे (अर्थात, वे भारत 2007-2010 के दौरान आए), जबकि 87,454 जने पिछले 5-9 साल (अर्थात वे 2002-2006 के दौरान बांग्लादेश से भारत आए) से भारत में रह रहे थे.
 
बांग्लादेश मूल के लगभग 2.7 लाख लोग (अर्थात जो लोग वहाँ पहले रहते थे), पिछले 10-19 वर्षों से भारत में रह रहे थे (अर्थात वे 1992-2001 के दौरान आए), जबकि बांग्लादेशी मूल के 17.61 लाख लोग 20 से ज्यादा वर्षों से भारत में रह रहे थे. (अर्थात वे 1991 से पहले भारत आए थे).
 
अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी
 
अन्य पड़ोसी देशों की तुलना में, चीन से शरणार्थियों की आबादी (तिब्बत) विभिन्न वर्षों में सबसे ज्यादा दर्ज की गई है. शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त (UNHCR) द्वारा दिए गए डेटा से यह संकेत मिलता है कि तिब्बतियों ने न कभी शरण की चाहत रखी और उनमें से न ही कोई वापस लौटे. तालिका -4 देखें.
 
तिब्बतियों के उल्ट, कई श्रीलंकाई शरणार्थी वापस लौट गए. उदाहरण के लिए, श्रीलंका से शरणार्थियों (शरणार्थी जैसी स्थितियों सहित) की संख्या 2015 में 64,208 थी. हालांकि उस वर्ष 849 श्रीलंकाई शरणार्थी वापस चले गए थे, तो 2015 के दौरान भारत में श्रीलंकाई शरणार्थियों की शुद्ध आबादी 63359 थी.
 
वर्ष 2018 में म्यांमार से, 18813 शरणार्थी (शरणार्थी जैसी स्थितियों सहित) थे, इसके अलावा वहाँ 2,064 शरण चाहने वाले थे. इसका मतलब है कि भारत में म्यांमार के शरणार्थियों की शुद्ध आबादी 2018 में 20,877 थी.
 
तालिका 4: शरण चाहने वालों / शरणार्थियों (शरणार्थी जैसी स्थितियों समेत) / बांग्लादेश, अफगानिस्तान, भूटान, नेपाल, चीन (तिब्बत), श्रीलंका, पाकिस्तान और म्यांमार के शरणार्थी जैसे राज्यविहीन लोगों की भारत में साल 1990 से 2018 तक कुल आबादी.
  Table 4
स्रोत: UNHCR: संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी, उपयोग करने के लिए यहां क्लिक करें; पीडीएफ संस्करण में डेटा का उपयोग लिए यहां क्लिक करें.
नोट: द हिंदू में दिनांक 18 दिसंबर, 2019 को विग्नेश राधाकृष्णन की रिपोर्ट के अनुसार चीन से आए शरणार्थी वास्तव में तिब्बति लोग थे. एक्सेस करने के लिए यहां क्लिक करें.
* शरणार्थी (रिफ्यूजी जैसी स्थितियों समेत)
**शरण चाहने वाले
*** 2018 डेटा में, 1 और 4 के बीच आंकड़ों की जगह तीन तारों (***) का इस्तेमाल किया गया है. ऐसा इसलिए किया गया है ताकि व्यक्तियों की गुमनामी की रक्षा के लिए आंकड़ें गोपनीय रखे जा सकें. इस तरह के आंकड़ों को कहीं भी जोड़ा नहीं गया है.
 **** वापस लौटे शरणार्थी
कृपया तालिका -4 के डेटा को देखने के लिए यहां क्लिक करें.

Https://bit.ly/399OL0B से टेबल-4 के डेटा का उपयोग करें.
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कृपया ध्यान दें कि नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 पर संयुक्त समिति ( जनवरी 2019 में लोकसभा में प्रस्तुत रिपोर्ट) ने प्रस्तावित संशोधन से लाभांवित होने वाले अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित लोग, जो धार्मिक उत्पीड़न के आधार पर शरणार्थी बने हैं, उनकी संख्या के बारे में पूछा था. इसके जवाब में, खुफिया ब्यूरो (आईबी) ने तब बताया था कि अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित 31,313 लोग हैं (हिंदू -25,447, सिख -5807, ईसाई -55 बौद्धों -2 और पारसी -2) जिन्हें धार्मिक उत्पीड़न के दावों के आधार पर लॉन्ग टर्म वीजा दिए गए थे और वे अब धार्मिक उत्पीड़न के अपने दावे के आधार पर भारतीय नागरिकता चाहते हैं. आईबी ने उन लोगों को तुरंत नागरिकता अधिनियम के प्रस्तावित संशोधन से लाभान्वित किए जाने की सिफारिश की थी.
 
यह उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेज़ जिसका शीर्षक था "अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी स्टॉक 2019 के अनुसार, जनसंख्या जनगणना में शरणार्थियों की कवरेज असमान है. जिन देशों में शरणार्थियों को शरणार्थी दर्जा दिया गया हो और एकीकृत करने के लिए अनुमति दी है, वे आम तौर पर किसी अन्य अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी के रूप में जनगणना में दर्ज किए जाते हैं. ऐसे मामलों में, अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी स्टॉक को अलग से शरणार्थियों की संख्या जोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि इन मामलों में शरणार्थियों को पहले से ही जनगणना के आंकड़ों में शामिल किया जाता है. हालांकि, कई देशों में, शरणार्थियों के घूमने-फिरने पर पांबदी होती है और उन्हें शिविरों या डिटेनशन सेंटरों में रखा जाता है. इन मामलों में, जनसंख्या जनगणना वाले शरणार्थियों को अनदेखा कर सकते हैं. इसके अलावा, जब शरणार्थी तेजी से आते जाते रहते हैं तो नए आए शरणार्थियों की आबादी जानने के लिए बार बार गणना कर पाना असामान्य है.
 
नतीजतन, संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि कई देशों की बड़ी शरणार्थी आबादी की संख्या जानने के लिए सांख्यिकी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की रिपोर्टें ही एकमात्र स्रोत बचती हैं, जो शरणार्थियों या शरणार्थियों जैसी स्थितियों में रह रहे लोगों की पहचान कर पाती हैं.
 
References

UN Dataset on International Migrant Stock 2019, By destination and origin, please click here to access  

UN Report on International Migrant Stock 2019, please click here to access 

The number of international migrants reaches 272 million, continuing an upward trend in all world regions, says UN, UN News, 17 September, 2019, please click here to access 

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Cabinet approves conduct of Census of India 2021 and updation of National Population Register, Press Information Bureau, 24 December, 2019, please click here to access  

Reply to Unstarred Question no. 1724 to be answered on 2nd July, 2019 in Lok Sabha, please click here to access     

Reply to Unstarred Question no. 539 to be answered on 25th June, 2019 in Lok Sabha, please click here to access

Reply to Unstarred Question no 4380 to be answered on 21st April, 2015 in Lok Sabha, please click here to access

Q & A on NRC (National Register of Citizens), Press Information Bureau blog, December 2019, please click here to access 

Report of the Joint Committee on the Citizenship (Amendment) Bill, 2016, presented to the Lok Sabha in January 2019, please click here to access 
 
Census 2011: Migrants classified by place (country) of last residence and duration of residence in place of enumeration, please click here to access  
 
Instruction Manual for Updation of NPR 2020 to be used by enumerators and supervisors, please click here to access  
 
Amit Shah says no NPR-NRC link, his Govt linked it 9 times in House -Deeptiman Tiwary, The Indian Express, 25 December, 2019, please click here to access

Since 2009, states asked by MHA to set up detention centres -Vijaita Singh, The Hindu, 23 December, 2019, please click here to access 

Minorities within majority face persecution in Indian subcontinent -Vignesh Radhakrishnan, The Hindu, 18 December, 2019, please click here to access 

35 detention centres ready for illegal immigrants, state tells Karnataka HC, The New Indian Express, 22 November, 2019, please click here to access 

Telling Numbers: International migrant count slopes downward in India, The Indian Express, 20 September, 2019, please click here to access 

India is the top source of immigrants across the globe, The Hindu, 19 September, 2019, please click here to access 

Indian diaspora, at 17.5 million, is the largest in the world, says UN study -Elizabeth Roche, Livemint, 19 September, 2019, please click here to access 

Census data contradicts bogey of Bangladeshi immigrants’ ‘flood’ -Subodh Varma, Newsclick.in, 21 August, 2019, please click here to access 

 
Image Courtesy: Inclusive Media for Change/ Himanshu Joshi