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आरटीआई की अर्जियों को खारिज करने में अव्वल हैं सरकारी बैंक- सीएचआरआई की रिपोर्ट

एक नई रिपोर्ट का आकलन है कि रिजर्व बैंक समेत सरकारी क्षेत्र के अन्य बैंकों में आरटीआई की अर्जियों को ज्यादा तादाद में खारिज किया जा रहा है और ये बैंक मांगी गई जानकारियों का जवाब देने में फिसड्डी साबित हो रहे हैं.

दिल्ली स्थित मानवाधिकार संस्था कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइटस् इनिशिएटिव(सीएचआरआई) के एक शोध-अध्ययन के मुताबिक साल 2016-17 में सरकारी क्षेत्र के 25 बैंकों को सूचना के अधिकार के तहत लगभग 73 हजार नई अर्जियां मिलीं जबकि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को लगभग 13000. सीधे भारत सरकार को रिपोर्ट करने वाले प्राधिकरणों को हासिल आरटीआई अर्जियों की संख्या का यह 9 फीसद है लेकिन खारिज की गई कुल अर्जियों में सरकारी बैकों की अर्जियों की तादाद 33 प्रतिशत है. दूसरे शब्दों में कहें तो भारत सरकार को रिपोर्ट करने वाली अन्य संस्थाओं की तुलना में सरकारी बैंकों में आरटीआई की अर्जी खारिज करने की दर ज्यादा है.

 

सीएचआरआई ने अपने आकलन में केंद्रीय सूचना आयोग की वार्षिक रिपोर्ट (2016-17) के आंकड़ों को आधार बनाया है. वार्षिक रिपोर्ट का प्रकाशन आयोग ने बीते मार्च(2018) महीने में किया है.

 

साल 2016-17 में आरटीआई की अर्जियां खारिज करने के एतबार से सबसे अव्वल स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद साबित हुआ. इस बैंक ने आरटीआई रिकार्ड 71 फीसद यानि हासिल हर 10 में से 7 अर्जियां खारिज कीं. आरटीआई की अर्जी खारिज करने के मामले में ओरियंटल बैंक ऑफ कामर्स दूसरे स्थान पर रहा. इस बैंक ने कुल 50 फीसद यानि आरटीआई की हर दूसरी अर्जी को खारिज किया.

 

सीएचआऱआई के विश्लेषण के मुताबिक कारपोरेशन बैंक में आरटीआई की 47.3 फीसद अर्जियां खारिज हुईं . देना बैंक और केनरा बैंक में खारिज अर्जियों की तादाद 40 प्रतिशत रही जबकि फर्जीवाड़े के मामले में हाल के दिनों में समाचार में रहे पंजाब नेशनल बैंक में साल 2016-17 में आरटीआई की 30 फीसद अर्जियां खारिज हुईं.

 

सीएचआरआई ने अपने आकलन में अर्जियों को खारिज करने का तरीके पर भी सवाल उठाये हैं. रिजर्ब बैंक सहित ज्यादातर सरकारी बैकों ने आरटीआई की अर्जियों को खारिज करने की वजह बताते हुए ‘अन्य' शब्द का प्रयोग किया है जबकि यह ‘अन्य' शब्द कहीं परिभाषित नहीं है. गौरतलब है कि आरटीआई की अर्जियों को खारिज करने के लिए सूचना अधिकार अधिनियम के सेक्शन 8, 9, 11, तथा 24 में व्यवस्था दी गई है.

 

रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी क्षेत्र के बैंकों ने कुल 6625 अर्जियों को अन्य की श्रेणी के अंतर्गत खारिज किया है जबकि 6616 अर्जियों को सूचना का अधिकार अधिनियम के सेक्शन 8(1)(j) के अंतर्गत निरस्त किया गया है. यह सेक्शन व्यक्तिगत सूचनाओं तथा निजता की हिफाजत से संबंधित है. आरबीआई ने साल 2016-17 में आधे से ज्यादा(57 फीसद) आरटीआई अर्जियों को अन्य की श्रेणी के अंतर्गत खारिज किया है.

 

ऐसा भी नहीं है कि सरकारी बैंकों पर आरटीआई के तहत आयी अर्जियों के निपटान का बोझ ज्यादा हो.सीएचआरआई के अध्ययन के तथ्य बताते हैं कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया(1.39), स्टेट बैंक ऑफ बिकानेर तथा पंजाब नेशनल(1.25) यानी केवल तीन बैंकों को साल 2016-17 में औसतन हर शाखा में एक से ज्यादा आरटीआई अर्जियां हासिल हुईं. अन्य सभी सरकारी बैंकों की शाखाओं को 2016-17 में औसतन 1 या उससे कम आरटीआई अर्जी निपटानी थी.

रिपोर्ट का यह तथ्य बैंकों को बढ़ते एनपीए के बोझ से उबारने के लिए सुझाये गये निजीकरण के समाधान के मद्देनजर अहम माना जा सकता है. हाल में कुछ अर्थशास्त्रियों ने पी जे नायक कमिटी की सिफारिशों का हवाला देते हुए सुझाव दिया है कि बढ़ते एनपीए के बोझ से बोझ से उबारने के लिए बैंकों का निजीकरण किया जाना चाहिए. पीजे नायक समिति ने अपनी सिफारिश में कहा था कि सूचना का अधिकार कानून बैंकों के कामकाज में बड़ी बाधा साबित हो रहा है. समिति ने ऐसा कहने के पीछे कोई प्रमाण नहीं दिए थे जबकि सीएचआरआई की रिपोर्ट के तथ्य पीजे नायक समिति के अवलोकन से एकदम अलग ही कहानी बयान करते हैं.

 

पोस्ट में इस्तेमाल की गई तस्वीर साभार प्रभात खबर