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Resource centre on India's rural distress
 
 

खनन की नैतिकता और भावी पीढ़ियों के लिए एक साझा कोष बनाने का सवाल

गोवा फाऊंडेशन और इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज के सहयोग से सीएसडीएस का पब्लिक्स एंड पॉलिसिज् प्रोग्राम खनन और जीविका से संबंधित एक विचार-विमर्श “ परमानेंट फंड मॉडेल फॉर ईथीकल माइनिंग: लैंड, लाइवलीहुड एंड इन्टरजेनरेशनल इक्विटी” शीर्षक से आयोजित कर रहा है। यह विचार-विमर्श भू-संपदा पर भावी पीढियों के हक के मसले के इर्द-गिर्द होगा। विचार-विमर्श की शुरुआत 18 फरवरी के दिन इंडिया इन्टरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में एक दिन के एक सम्मेलन के आयोजन के साथ हो चुकी है। इस विचार-विमर्श से जुड़ीं बातों को इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज की वेबसाइट पर समय-समय पर दिया जाएगा।  

यह विचार-विमर्श एक खास संकल्पना को स्वीकार करके हो रहा है। संकल्पना यह है कि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के समय उन पर भावी पीढ़ियों के अधिकार का भी ध्यान रखा जाना चाहिए, साथ ही चूंकि ज्यादातर प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं इसलिए उनके दोहन को न्यायसंगत बनाने के लिए एक स्थायी कोष का निर्माण किया जाना चाहिए।  यह मुद्दा खनन और भूमि-अधिग्रहण से संबंधित बहुत कानूनों से जुड़ा हुआ है और इसका सीधा संबंध आदिवासी तथा देश के गरीब इलाकों में रहने वाले अन्य समुदायों की जीविका से जुड़ा है।

इस पोस्ट के जिन पाठकों की रुचि भू-संपदा पर भावी पीढियों के अधिकार तथा स्थायी कोष के निर्माण की उपर्युक्त संकल्पना में हैं उनके लिए इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज की टोली एक कान्सेप्ट नोट तथा कुछ जरुरी लिंक इस आलेख के नीचे संकलित कर रही है। हम इस बात से आगाह हैं कि खनन का मसला लोकतांत्रिक शासन, टिकाऊ विकास, संघीय ढांचे, नागरिकता, नियमन तथा विधि के शासन जैसी अनेक बातों से जुड़ा है। खनन का आम आदमी के जीवन, जीविका, स्वास्थ्य तथा पर्यावरण पर गहरा असर है।

स्थायी कोष के निर्माण का विकल्प अपने आप में कोई समाधान नहीं है बल्कि इसके साथ एक व्यापक बहस जुड़ी हुई है कि आखिर हम किस तरह का विकास चाहते हैं। स्थायी कोष के निर्माण के विकल्प से कई गंभीर प्रश्न जुड़े हुए हैं जैसे क्या अर्थव्यवस्था पारिस्थिकी तंत्र का एक हिस्सा भर है या फिर पारिस्थिकी तंत्र ही अर्थव्यवस्था का एक अंग-मात्र है ? यह धरती हमें अपने पुरखों से विरासत में मिली है या फिर भावी पीढ़ियों ने यह धरती हमें उधार दी है ? क्या हम किसी वित्तीय कोष का निर्माण करके पारिस्थिकी के विध्वंस के अपने दोष से मुक्त हो सकते हैं ? किसी बैंकिंग-उपादान में निवेश या फिर मौजूदा पीढ़ी की जरुरतों को पूरा करने के मामले में हमें किस तरह का संतुलन अपनाना चाहिए ? क्या बाजार के उतार-चढ़ाव का शिकार होने वाला वित्त-कोष बनाना एक बेहतर विकल्प है या फिर पोषण, सेहत, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा तथ आधारभूत ढांचे के विस्तार में निवेश करना ?
 
अधिक जानकारी के लिए कृपया निम्नलिखित लिंक को चटकायें-
 

Supreme Court Judgement on Permanent Fund for Inter-generational Equity and sustainability of mining in Goa (Please click here to access)

Concept note on Permanent Fund Model for Ethical Mining (Please
click here to access)

Implementing Intergenerational Equity in Goa by Rahul Basu, Economic and Political Weekly, Vol xlIX, No. 51, 20 December, 2014 (Please
click  here to access)

Implementing Intergenerational Equity in Goa by Rahul Basu (Please
click here to access)

The Goenchi Mati Permanent Iron Ore Fund -Proposal submitted by the Goa Foundation to the Goa Government (Please
click here to access)

In a first, Supreme Court order on Goa mining aims to use natural wealth for public good -Mridula Chari, 23 April, 2014 (Please
click here to access)

 

How Norway grew a $600 billion sovereign fund from oil -Alex DeMarban, Alaska Despatch News, 5 November, 2011 (Please click here to access)