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तीस लाख मतदाता चाहें भी तो इस चुनाव में मतदान नहीं कर सकते- आखिर क्यों, पढ़िए इस एलर्ट में !

‘वोट इंडिया वोट' के नारे के साथ एक सरकारी वेबसाइट पर लिखा है- ‘ मतदान प्रक्रिया में भाग लें, मतदाता होने पर गर्व महसूस करें.' लेकिन क्या कभी आपने सोचा कि भारत की एक बड़ी कामगार आबादी चाहे तो भी वोट नहीं कर सकती ? ऐसे कामगारों में एक नाम आता है ईंट भट्ठे के मजदूरों का ! इस बार ईंट भट्ठे पर काम करने वाले तकरीबन 30 लाख मजदूर अपने मताधिकार के उपयोग नहीं कर पायेंगे.

 

ईंट भट्ठे के मजदूर अपने मताधिकार का प्रयोग क्यों नहीं कर पायेंगे इसकी वजह जानने से पहले आइए जरा गौर करें कि चुनावी गणित के हिसाब से 30 लाख मतदाताओं का मतलब क्या निकलता है ?

 

मतदाताओं की तादाद के लिहाज से देखें तो देश का सबसे बड़ा लोकसभा चुनाव क्षेत्र है तेलंगाना का मलकाजगिरी. यहां मतदाताओं की संख्या साढ़े उनतीस लाख (29,53,915) से ज्यादा है. सबसे छोटा लोकसभा चुनाव क्षेत्र है लक्षद्वीप- यहां मतदाताओं की संख्या तकरीबन 48 हजार (47,972) है. लिहाजा, 30 लाख मतदाताओं के वोट ना डाल पाने का एक मतलब हुआ देश के सबसे बड़े लोकसभा क्षेत्र के मतदाताओं का अपने मताधिकार का प्रयोग ना कर पाना. या फिर हम ऐसे भी कह सकते हैं कि लक्षद्वीप के आकार के तकरीबन साठ लोकसभाई क्षेत्र के मतदाताओं लोकतंत्र के महापर्व में अपने राजनीतिक भविष्य का फैसला कर पाने के अधिकार से वंचित रहेंगे.

 

सवाल उठता है, आखिर ऐसा क्यों होगा कि 30 लाख की तादाद में ईंट भट्ठा मजदूर चाहकर भी अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं कर पायेंगे. कारण बहुत सीधा सा है- ज्यादातर ईंट भट्ठा मजदूर आप्रवासी मजदूर होते हैं. वे एक राज्य से दूसरे राज्य या फिर अपने ही राज्य में एक जिले से दूसरे जिले में पलायन करके ईंटभट्ठे पर काम करने जाते हैं. सो, इस बार मतदान की तारीखों पर अपने निर्वाचन क्षेत्र में वोट डालने के लिए मौजूद नहीं होंगे.

 

ईंटो के उत्पादन के मामले में दुनिया में चीन के बाद दूसरे नंबर पर है. भारत में तकरीबन 1 लाख 40 हजार ईंट भट्ठे हैं और इनमें सालाना 24 से 26 अरब ईंटों का निर्माण होता है. अलग-अलग आकलनों में ईंट भट्ठों में काम करने वाले मजदूरों की तादाद 1 करोड़ से लेकर 2 करोड़ 30 लाख तक बतायी गई है. एक अध्ययन के मुताबिक इस कामगार तबके का कम से कम एक तिहाई हिस्सा आप्रवासी होने के कारण अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं कर पायेगा.

 

गौरतलब है कि ईंटभट्ठों पर कामकरने वाले ज्यादातर मजदूर समाज के वंचित तबके के होते हैं. आप्रवासी मजदूरों पर केंद्रित एक आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक ईंट भट्ठों में काम करने वाले 95 फीसद आप्रवासी मजदूर ग्रामीण इलाकों के हैं और इन मजदूरों में 48 प्रतिशत तादाद अनुसूचित जाति और 16 प्रतिशत तादाद अनुसूचित जनजाति के कामगारों की है. शेष 35 प्रतिशत कामगारों में लगभग 30 प्रतिशत ओबीसी तबके के हैं.

 

मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक ईंट-भट्ठा मजदूरों की ज्यादातर संख्या महाराष्ट्र, तटीय आंध्रप्रदेश, कर्नाटक के कुछ हिस्से, पश्चिम बंगाल, उत्तरी ओड़िशा, मध्यवर्ती गुजरात तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में केंद्रित है. मौसमी तौर पर पलायन कर ईंट भट्ठों में काम करने वाले ज्यादातर मजदूर छत्तीसगढ़ के विलासपुर क्षेत्र, उत्तरप्रदेश के अमेठी-रायबरेली क्षेत्र, गुजरात-ओड़िशा के कुछ जनजातीय इलाके तथा तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश के होते हैं. अध्ययन के मुताबिक ऐसे कामगारों में एक बड़ी तादाद पश्चिम बंगाल, झारखंड तथा बिहार से पलायन करने वाले मजदूरों की भी होती है.

 

भारत में ज्यादातर ईंट-भट्ठों पर काम साल के सात महीनों में होता है. मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक ईंट-भट्ठों पर काम जाड़े के शुरुआती माह में आरंभ होता है और मॉनसून के आनेतक चलता है. ज्यादातर कामगार ईंट-भट्ठों में काम के लिए जोड़ी(स्त्री और पुरुष) के रुप में पलायन करते हैं. भट्ठों पर काम स्त्री-पुरुष के हिसाब से बंटा होता है. महिलाएं ज्यादातर भट्ठों में ईंधन के रुप में इस्तेमाल होने वाले कोयले को तोड़ने और ढोने का काम करती हैं जबकि पुरुष ईंटों को खास क्रम से सजाने तथा भट्ठी को जलाने का काम करते हैं. ईंट की ढुलाई अथवा ईंट को तैयार करने का काम स्त्री और पुरुष कामगार दोनों ही करते हैं और इस काम में वे अपने बच्चों से भी सहयोग लेते हैं.

 

भारत में ईंट भट्ठों पर काम करने वाले कामगारों की स्थिति की तुलना करते हुए कुछ अध्ययनों में उसे आधुनिक गुलामी का नाम दिया गया है. एंटी-स्लेवरी इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन के कुछ मुख्य बिन्दु पाठकों की सुविधा के लिए निम्नवत हैं:

 

-- ईंट भट्ठों में काम करने वाले शत-प्रतिशत मजदूर समाज के वंचित तबके के होते हैं. एंटी स्लेवरी इंटरनेशनल के मौका-मुआयना आधारित शोध-अध्ययन के मुताबिक ईंट भट्ठों में काम करने वाले मजदूरों में 53 प्रतिशत अनुसूचित जाति के तथा 47 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग के थे. अनुसूचित जनजाति का कोई मजदूर इसलिए नहीं मिला क्योंकि मौका-मुआयना के लिए पंजाब और उत्तरप्रदेश के ईंट-भट्ठों को चुना गया था.

 

-- ईंट भट्ठों पर काम करने वाली महिला मजदूर को मजदूरी महीं मिलती. कामगारों को व्यक्ति रुप में नहीं रखा जाता बल्कि परिवार को एक इकाई मानकर काम पर रखा जाता है और मजदूरी विशेष रुप से परिवार के मुखिया(पुरुष) को दी जाती है. शोध-अध्ययन में सामने आया कि ईंट भट्ठे पर काम करने वाली किसी भी महिला कामगार का नाम मजदूरों वाली पंजी पर नहीं लिखा हुआ था.

 

-- ईंट भट्ठों पर अपने माता-पिता के साथ गये पांच से 14 साल के 65 से 80 प्रतिशत बच्चे वहां रहते हुए सात से नौ घंटे रोजाना ईंट-बनाई से संबंधित कोई ना कोई काम करते हैं. ईंट भट्ठे पर काम करने वाले कामगारों में एक तिहाई तादाद बच्चों की होती है. इस एक तिहाई अव्यस्क आबादी में 5 से 14 साल की उम्र के बच्चों की संख्या 65 से 80 प्रतिशत तक पायी गई.

 

-- ईंट भट्ठों पर काम करने वाले बच्चों में ज्यादातर स्कूल नहीं जाते. उन्हें बालपन की अवस्था में सरकार की तरफ से मुहैया करायी जाने वाली अन्य सुविधाओं(जैसे समेकित बाल विकास सेवा) से वंचित रहना पड़ता है. शोध-अध्ययन में शामिल 77 प्रतिशत कामगारों ने कहा कि उनके बच्चे प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं. कुल 73 प्रतिशत कामगारों का कहना था कि उनके बच्चों को आंगनबाड़ी से दी जा रही सुविधाएं हासिल नहीं होतीं.

 

-- ईंट भट्ठों पर काम करने वाले 14 से 18 साल तक की उम्र के शत-प्रतिशत बच्चे गर्मी के दिन में 12 घंटे काम करते हैं और जाड़े में 10 घंटे. इनमें 77 प्रतिशत बच्चे मुख्य कामगार के रुप में काम करते हैं जबकि 23 प्रतिशत बच्चे सहायक कामगार के रुप में.

 

--- शोध-अध्ययन में शामिल 96% प्रतिशत कामगारों ने कहा कि उन्होंने ईंट भट्ठों में काम करने के लिए शुरुआती तौर पर पेशगी(कर्ज) लिया था. ठेकेदार कामगारों को पेशगी देकर ईंट भट्ठों पर जाने के लिए राजी करते हैं. पेशगी की रकम के कारण ही ईंट भट्ठों पर मजदूरों का पारिश्रमिक रोककर रखा जाता है और उनपर नियंत्रण कायम करने का भी एक साधन साबित होता है. पेशगी लेने वाले पुरुष कामगार अपने परिवार के साथ पलायन करके ईंट भट्ठे पर काम करने के लिए जाने को मजबूर होते हैं. पेशगी एक कर्ज की तरह काम करती है, कामगार का पूरा परिवार इस कर्ज को उतारने के लिए ईंट भट्ठों पर काम करता है.

 

--- पलायन करके एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने वाले ईंट भट्ठा मजदूर अपने हालात से कहीं ज्यादा मजबूर होते हैं. ठेकेदार(बिचौलिया) उन्हें ईंट भट्ठों पर जाने के लिए मजबूर करता है और दूसरे राज्य में जाने पर ऐसे मजदूरों के लिए सहायता हासिल करने का कोई सामाजिक तंत्र नहीं रह जाता. पंजाब के ईंट भट्ठों में काम करने वाले 60 प्रतिशत कामगार दूसरे राज्य से पलायन करके आये हैं.

 

-- पंजाब में मजदूरों को 1000 ईंटों की बनाई को मानक मानकर मजदूरी दी जाती है. इसमें समय की सीमा नहीं है- 1000 ईंटों को बनाने में चाहे जितना समय लगे लेकिन मजदूरों के भुगतान में समय को इकाई नहीं माना जाता. पीसरेट पर भुगतान करने की प्रणाली आयद होने के कारण मजदूर न्यूनतम मजदूरी भी हासिल कर पाने से वंचित होते हैं. भुगतान प्रति परिवार प्रतिहजार ईंट के निर्माण के हिसाब से होता है.

 

-- ईंट भट्ठों पर काम कर रहे 33 प्रतिशत कामगारों ने शोध-अध्ययन के दौरान बताया कि उन्हें 1000 ईंटों के निर्माण के लिए निर्धारित भुगतान से कम मजदूरी हासिल होती है. शोध-अध्ययन में यह भी सामने आया कि ईंट भट्ठों पर काम करने वाले ज्यादातर मजदूरों को पीसरेट के हिसाब से दी जाने वाली न्यूनतम मजदूरी के बारे में जानकारी नहीं है.

इस कथा के विस्तार के लिए कृपया निम्नलिखित लिंक देखें:

 
 

Wage Labour Atlas of Brick Kiln Workers 

 

REPORT OF THE WORKING GROUP ON MIGRATION 

 

19 bonded labourers rescued from Rajasthan brick kiln 

 

(पोस्ट में इस्तेमाल की गई तस्वीर साभार प्रभासाक्षी