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नई रिपोर्ट का नया नुस्खा- ऐसे बढ़ेगी किसानों की आमदनी..

खेत को पट्टे पर देने के पुराने नियम-कानून बदलिए और देश के ज्यादातर किसान-परिवारों को आमदनी अठन्नी-खर्चा रुपया की हालत से उबारिए.

यह सुझाव दिया गया है कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की एक हालिया रिपोर्ट में.(देखें नीचे की लिंक)

 

देश की जीडीपी में कृषि के घटते योगदान और घाटे का सौदा मानकर खेती छोड़ते किसानों की समस्या के समाधान के लिए रिपोर्ट में एनडीए सरकार के मॉडल लैंड लीजिंग एक्ट-2016 के पक्ष में मजबूत तर्क दिए गए हैं.

 

बीते अप्रैल में महीने में सुर्खियों में आया मॉडल लैंड लीजिंग एक्ट में खेत को पट्टे पर देने के नये नियम सुझाये गये हैं ताकि भूमिहीन और सीमांत जोत के किसानों को खेती के लिए पट्टे पर ज्यादा जमीन हासिल हो.(एक्ट के लिए यहां क्लिक करें)

 

एक्ट में पट्टे पर खेत जोतने वाले किसानों को सांस्थानिक कर्ज मुहैया कराने का भी विधान किया गया है. फिलहाल बटाईदारी या पट्टे पर खेती करने वाले किसान खेती की ऐसी जमीन पर कृषि-ऋण हासिल नहीं कर सकते.

 

मॉडल एक्ट नीति आयोग द्वारा गठित विशेषज्ञों के एक समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया है. इस समिति का गठन बीते साल सितंबर महीने में कमीशन फॉर एग्रीकल्चरल कॉस्ट एंड प्राइसेस के पूर्व अध्यक्ष टी हक की अध्यक्षता में हुआ.

 

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की रिपोर्ट में चिन्ता के स्वर में कहा गया है कि देश में 1 हैक्टेयर या इससे कम आकार के जोत की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है जबकि आमदनी के लिए मुख्य रुप से खेती पर निर्भर ऐसे ही सीमांत आकार के जोत वाले किसान परिवारों की निवल आय सबसे कम है.(कुल स्रोतों से प्राप्त मासिक आमदनी में मासिक उपभोग खर्च को घटा देने के बाद बची रकम निवल आय कहलाती है)

 

रिपोर्ट के अनुसार खेत को पट्टे पर देने के प्रदेशों के पुराने नियम बदल दिए जायें तो सीमांत किसानों को ज्यादा आकार के जोत में खेती करने के अवसर उपलब्ध होंगे जिससे उनकी आमदनी बढ़ेगी.

 

खेती-किसानी की मौजूदा देश पर बहुमुखी सूचनाओं से भरी स्टेट ऑफ इंडियन एग्रीकल्चर(2015-16) नाम की इस रिपोर्ट के अनुसार देश में 1 हैक्टेयर या इससे कम आकार के जोतों की तादाद में एक दशक के भीतर 23 फीसद का इजाफा हुआ है. 2000-2001 में ऐसे जोतों की संख्या 75.41 मिलियन थी जो 2010-11 में बढ़कर 92.83 मिलियन हो गई.

 

रिपोर्ट में किसान-परिवारों की आमदनी और उपभोग पर केंद्रित नेशनल सैंपल सर्वे के तथ्यों के आधार पर कहा गया है कि सीमांत आकार के जोत किसान-परिवारों को पर्याप्त ऊपज और आमदनी नहीं दे पा रहे.

 

गौरतलब है कि नेशनल सैंपल सर्वे के 70 वें दौर की गणना पर आधारित रिपोर्ट ‘की इंडीकेटर्स ऑफ सिचुएशन एग्रीकल्चरल हाऊसहोल्डस् इन इंडिया' के मुताबिक देश के तकरीबन 9 करोड़ किसान परिवारों में तकरीबन सवा छह करोड़ किसान परिवारों के पास 1 हैक्टेयर या इससे कम जमीन है और इन परिवारों का कुल मासिक खर्च उनके मासिक उपभोग खर्च से ज्यादा है.(देखें नीचे दी गई लिंक)

 

मिसाल के लिए, नेशनल सैंपल सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 0.41 से 1 हैक्टेयर की जोत वाले किसान परिवारों की संख्या तकरीबन 3 करोड़ 15 लाख है.

 

खेती से ऐसे प्रत्येक परिवार की कुल मासिक आमदनी (जुलाई 2012 से जून 2013 के बीच) 2145 रुपये थी. खेतिहर मजदूरी(2011रुपये), पशुधन(629रुपये) तथा गैर खेतिहर कामों(462रुपये) से ऐसे प्रत्येक परिवार ने औसतन 3102 रुपये जुटाये.

 

सभी स्रोतों से हासिल कुल 5247 रुपये के बरक्स सीमांत कृषक-परिवारों का मासिक उपभोग खर्च 6020 रुपये है.

 

कृषि एवं कृषक कल्याण मंत्रालय की नई रिपोर्ट ऐसे किसान परिवारों की आमदनी बढ़ाने के लिए मॉडल लैंड लीजिंग एक्ट में सुझाये गये विधानों की पैरोकारी करती है.

 

मॉजल लैंड लीजिंग एक्ट की आलोचना में कहा गया है कि इसको लागू करने से लंबे संघर्ष के बाद हासिल रैयतों के अधिकारों को चोट पहुंचेगी और "छोटे तथा मंझोले किसानों को गंभीर परिणाम" भुगतने होंगे आलोचकों के मुताबिक नीति आयोग के विशेषज्ञ समिति के सुझाव विश्वसनीय नहीं है क्योंकि खेती योग्य कितनी जमीन बिना रोपे-बोये खाली पड़ी रहती है, इसका ठीक-ठीक आकलन ना तो एनएसएसओ के सिचुएशन असेसमेंट सर्वे से किया जा सकता है और ना ही उस एग्रीकल्चरल सेन्सस के आंकड़ों के आधार पर जो पट्टेदारी के बाध्यकारी कानूनों के कारण खाली पड़ी रहने वाली जमीन के आकार के बारे में बताता है.(देखें नीचे दी गई लिंक)

 

टी हक की अध्यक्षता में बनी समिति की मुख्य बातें---


--- दसवीं पंचवर्षीय योजना के मध्यावधि मूल्यांकन में कहा गया है कि पट्टेदारी सबंधी बाध्यात्मक कानूनों के कारण कृषिभूमि का अधिकतम उपयोग नहीं हो पा रहा तथा खेतिहर जमीन पर गरीब किसान परिवारों की पहुंच बाधित हो रही है.

 
---- केरल, जम्मू-कश्मीर तथा मणिपुर में कृषि की जमीन को पट्टे पर देना प्रतिबंधित है. 

 
------ बिहार, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, तेलंगाना तथा ओड़ीशा में कुल खास श्रेणी के भूस्वामी जैसे विधवा, अविवाहित, तलाकशुदा, सशस्त्र बल के सदस्य या शारीरिक-मानसिक दिव्यांगता वाले भूस्वामी ही जमीन पट्टे पर दे सकते हैं.

 
----- पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र और असम में खेती की जमीन पट्टे पर देने पर प्रतिबंध नहीं है लेकिन पट्टेदार को यहां पट्टेदारी की एक खास अवधि के बाद जमीन खरीद लेने का हक(हरियाणा को छोड़कर) हासिल है. मिसाल के लिए पंजाब में जमीन पट्टे पर देने पर प्रतिबंध नहीं है लेकिन वहां पट्टे पर जमीन हासिल करने वाला व्यक्ति लगातार छह साल की अवधि तक जमीन रखने के बाद जमीन की खरीद का अधिकारी करार दिया गया है. इसी तरह असम में लगातार तीन साल तक पट्टे पर जमीन रह जाये तो पट्टेदार इस जमीन के राजस्व का 50 गुना चुकाकर जमीन की मिल्कियत हासिल करने का अधिकारी है. 

 
--- आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु तथा पश्चिम बंगाल में खेती की जमीन पट्टे पर देने पर प्रतिबंध नहीं है लेकिन कुछ शर्तें आयद की गई हैं. जैसे पश्चिम बंगाल में भूस्वामी खेती की जमीन पट्टे पर नहीं दे सकते सिर्फ बटाईदारी पर दे सकते हैं. आंध्रप्रदेश में जमीन पट्टे पर दी जा सकती है लेकिन कम से कम छह साल की अवधि के लिए दी जानी चाहिए और किसी विशेष आधार पर अधिकृत न्यायिक अधिकारी ही पट्टेदारी से जमीन को मुक्त कर सकता है.

 
 
----- जमीन पट्टे पर देने से संबंधित विधानों के कठोर होने के कारण खेती की उत्पादकता प्रभावित होती है. एक तो छुपी हुई पट्टेदारी का चलन है, सबकुछ मौखिक रीति से होता है और पट्टेदार हासिल जमीन के उपयोग के मामले में खुद को असुरक्षित महसूस करने के कारण उसमें खास निवेश नहीं करता. दूसरे जमीन के पट्टेदार के हाथ में सदा के लिए चले जाने के भय में भूमालिक उसे थोड़े थोड़े दिनों पर अलग-अलग लोगों को पट्टेदारी पर देते हैं. ऐसे में जमीन की उत्पादकता को लेकर पट्टेदार कोई दिर्घावधि का निवेश नहीं करता.


 
----- देश भर में अनौपचारिक रुप से खेत पट्टे पर देने का चलन है लेकिन अनौपचारिक पट्टेदारी वाले खेतों पर किसान को सांस्थानिक कर्ज, बीमा या फिर ऐसी ही अन्य सामाजिक सहायता योजना नहीं मिल पाती. इससे कृषि की उत्पादकता प्रभावित होती है.


 
--- वैधानिक बाध्यताओं के कारण भूस्वामी इस भय से कि कहीं उनके हाथ से जमीन की मिल्कियत निकल ना जाय, जमीन को अपने पास ही रखते हैं और खेती की ऐसी जमीन का अधिकतम उपयोग नहीं हो पाता. जमीन को पट्टे पर देने संबंधी राज्यों में लगे प्रतिबंधात्मक कानून या बाध्यताओं को हटा लिया जाय तो उपलब्ध कृषिभूमि, कृषिगत श्रम तथा कृषि-उपज का बेहतर उपयोग हो सकेगा. 


 

--- दसवीं पंचवर्षीय योजना के मध्यावधि मूल्यांकन में ठीक कहा गया है कि पट्टेदारी सबंधी बाध्यात्मक कानूनों के कारण कृषिभूमि का अधिकतम उपयोग नहीं हो पा रहा तथा खेतिहर जमीन पर गरीब किसान परिवारों की पहुंच बाधित हो रही है. 
 
 
इस कथा के विस्तार के लिए देखें निम्नलिखित लिंक--
 

 

REPORT OF THE EXPERT COMMITTEE ON LAND LEASING

http://niti.gov.in/writereaddata/files/writereaddata/files
/document_publication/Final_Report_Expert_Group_on_Land_Le
asing.pdf

 

Key Indicators of Situation of Agricultural Households in India

http://mospi.nic.in/mospi_new/upload/KI_70_33_19dec14.pdf

 

Model Agricultural Land Leasing Act, 2016

http://www.prsindia.org/parliamenttrack/report-summaries/m
odel-agricultural-land-leasing-act-2016-4270/

 

Niti Aayog Panel Proposes Model Land Leasing Law

http://thewire.in/29657/niti-aayog-panel-proposes-model-la
nd-leasing-law/

 

Government rolls out a model act to legalize land leasing 

http://economictimes.indiatimes.com/articleshow/51808345.c
ms?utm_source=contentofinterest&utm_medium=text&utm_campai
gn=cppst

 

Model Land Leasing Act: Turning the Clock Backwards

http://peoplesdemocracy.in/2016/0501_pd/model-land-leasing
-act-turning-clock-backwards

 

Liberalisation of Land Leasing: What It Means for Odisha?