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नरेगा के बजट मे कटौती और आधार लिंकित भुगतान कामगारों के हक का उल्लंघन: नरेगा संघर्ष मोर्चा

नयी सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के लिए चालू वित्तवर्ष में मात्र 60,000 रुपये आबंटित किये हैं. यह रकम साल 2018-19 के संशोधित बजट अनुमान (नरेगा) की तुलना में 1,084 करोड़ रुपये कम है. पिछले साल जिस तादाद में रोजगार गारंटी योजना के तहत काम की मांग की गई, अगर सरकार उन्हें पूरा करती और मजदूरी का भुगतान श्रमिकों को समय पर होता तो नरेगा के मद में व्यय की रकम कहीं ज्यादा होती. इस साल के बजट में से 4,000 करोड़ रुपये बीते साल के बकाया रकम को चुकता करने में खर्च हुए हैं. सो, साल के बाकी बचे महीनों के लिए नरेगा के मद में मात्र 56,000 करोड़ रुपये की राशि ही शेष बची है.

 

आबंटित राशि की मात्रा कम होने के साथ ही साथ एक तथ्य यह भी है कि सरकार आबंटित रकम को नियमित अंतराल पर निर्गत नहीं करती. इससे मजदूरी का भुगतान विलंब से होता है. काम की अर्जी मिलने पर अगर काम निर्धारित अवधि में नहीं दिया जाय तो काम मांगने वाले को मुआवजा देने का प्रावधान है और काम ना होने की सूरत में बेरोजगारी भत्ता के रुप में भरपायी करने का नियम है. सरकार मुआवजा और क्षतिपूर्ति की यह रकम भी नरेगा के मजदूरों को अक्सर मुहैया नहीं कराती. सरकार चूंकि नरेगा के मद में पर्याप्त रकम का आबंटन नहीं करती सो नरेगा के अंतर्गत अधिसूचित मजदूरी दर राज्यों में घोषित न्यूनतम मजदूरी दर से कम है. इस कारण देश के ज्यादातर हिस्सों में नरेगा का काम मजदूरों के लिए आमदनी का लाभकर स्रोत नहीं रह गया.

नरेगा कार्यक्रम के क्रियान्वयन में अनुपयुक्त तकनीक के इस्तेमाल के कारण तथा समुचित मात्रा में फंड ना होने से नरेगा के कामगारों के कानूनी हक का उल्लंघन और ज्यादा बढ़ गया है. लेकिन नरेगा में हो रहे तकनीकी हस्तक्षेप के बारे में कोई ईमानदार मूल्यांकन कराने की जगह केंद्र सरकार तकनीकी हस्तक्षेप के फायदों के बारे में झूठे दावे कर रही है. ऐसे कई दावे, खासकर नरेगा को आधार से लिंक करने से हुए फायदों के बारे में जो दावा किया जा रहा है उसके बारे में इस साल के आर्थिक सर्वेक्षण के 10 वें अध्याय में चर्चा की गई है.

 

आर्थिक सर्वेक्षण का दसवां अध्याय बड़े हद तक एक शोध-अध्ययन पर आधारित है. इस शोध अध्ययन का शीर्षक है- ए फ्रेन्ड इनडीड: डज द यूज ऑफ डिजिटल आयडेन्टिटी मेक वेलफेयर प्रोग्राम ट्रूली काउन्टर-सायक्लिकल. इस शोध-अध्ययन के लेखक हैं सुमित अग्रवाल, श्रद्धे प्रसाद, निश्का शर्मा तथा प्रसन्ना एल तंत्री. जैसा कि सकीना धोराजीवाला, अनमोल सोमान्ची तथा राजेन्द्रन नारायण ने अपनी विवेचना में बताया है, उपर्युक्त शोध-अध्ययन का निष्कर्ष एक गलत मान्यता पर आधारित है और शोध-अध्ययन में नरेगा से जुड़ी जमीनी सच्चाइयों की अनदेखी की गई है.

 

शोध-अध्ययन का पहला भ्रामक दावा यह है कि नरेगा को साल 2015 में आधार से लिंकित करने के कारण मजदूरी के भुगतान में सुभीता हुआ है. यह दावा इस तथ्य की अनदेखी करता है कि साल 2008 से ही बैंक तथा डाकघरों के जरिये नरेगा की मजदूरी का भुगतान शुरु हो चुका था और ऐसा करने से मजदूरी के नकद भुगतान के वक्त रकम की जो हेराफेरी होती थी, उसमें बहुत कमी आयी थी. नरेगा को आधार से लिंकित करने में हड़बड़ी से काम लिया गया जिससे व्यापक स्तर पर व्यवधान पैदा हुए. कई मामलों में सामने आया कि नरेगा की मजदूरी का भुगतान नहीं हो पा रहा क्योंकि नरेगा मैनेजमेंट इन्फारमेशन सिस्टम में मजदूरों का आधार नंबर गलत दर्ज हुआ है या फिर मजदूर के आधार नंबर को किसी अन्य के बैंक खाते से जोड़ दिया गया है, साथ ही ‘इन्एक्टिव आधार' जैसे भी कई अबूझ मामले देखने को मिले हैं और आधार नंबर के इन्एक्टिव हो जाने के कारण सरकार भी नहीं बता पा रही है. बैंकों को खाता खुलवाने के बारे में टारगेट दिया गया है और इस टारगेट को पूरा करने के लिए मजदूरों से जबरिया एक से ज्यादा बैंकखाता खुलवा जा रहा है. आधार-लिंकित भुगतान में मजदूरी संबंधित मजदूर के इस खाते में जाती है जिसे सबसे आखिर में आधार-नंबर से जोड़ा गया है. लेकिन मजदूरों को अक्सर पता ही नहीं होता कि उनका कौन सा बैंक-खाता आखिरी दफे आधार-लिंकित हुआ है सो वे मजदूरी पाने के लिए भटकते रह जाते हैं.

उपर्युक्त शोध-अध्ययन और आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि आधार-लिंकित भुगतान के कारण मजदूरी के देर से भुगतान की घटनाओं में कमी आयी है. लेकिन इस दावे में ‘देरी' का अर्थ मात्र उस समयावधि से लिया गया है जो फंड ट्रांसफर आर्डर (एफटीओ) के जेनरेट होने तक लगती है. एफटीओ के जेनरेट होने के बाद केंद्र सरकार द्वारा उसे स्वीकृत होने, मजदूर के खाते में राशि को भेजने तथा बैंक से राशि की निकासी में भी कुछ समय लगता है लेकिन सरकार इस समयावधि को ‘देरी' के रुप में मानने के लिए तैयार नहीं है. सरकार के पास ऐसी देरी के लिए कोई आंकड़ा नहीं है और ठीक इसी कारण सरकार ऐसी देरी के लिए मजदूर को क्षतिपूर्ति देने को भी तैयार नहीं. दो साल पहले किये गये एक शोध-अध्ययन (इसमें नरेगा के अंतर्गत हुए नौ लाख भुगतान का आकलन किया गया है) के मुताबिक एफटीओ के जेनरेट होने के तकरीबन 50 दिन बाद मजदूरी की रकम नरेगा कामगार के खाते में जमा हो पाती है.

 

इस सिलसिले में विशेष जानकारी के लिए निम्नलिखित पते पर संपर्क किया जा सकता है:

Anindita (+91 9871832323) or Sakina (+91 9833419391) or email at nrega.sangharsh.morcha@gmail.com.

 

Abhay Kumar (9845371493), Anuradha Talwar (9433002064), Arundhati Dhuru (9919664444), Gangaram Paikra (9977462084), Kamayani Swami (9771950248), Mukesh Nirvasat (9468862200), Neeta Hardikar (9825412387), Nirmala Tammineni (9848930031) and Richa Singh (9452232663) on behalf of NREGA Sangharsh Morcha.