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पर्यावरण के सरोकारों पर एक किताब की गहरी नजर

अगर पर्यावरण के नुकसान को लेकर आपको चिंता होती है लेकिन साथ में आप इस मसले पर मौजूद अध्ययन सामग्री को बोझिल और नीरस जान पढ़ने से बचते हैं तो फिर आपके लिए एक अच्छी खबर है.

 

हाल ही में जीन कंपेन की तरफ से एक किताब कोपिंग विद् क्लाईमेट चेंज नाम से प्रकाशित हुई है और पर्यावरणविद्, नागरिक संगठन से जुड़े कार्यकर्ता, नौकरशाह तथा शोधकर्ताओं के बीच समान रुप से चर्चा का विषय बनी हुई है। किताब का संपादन किया है सुमन सहाय ने और यह किताब कॉफी बुक शैली में लिखी गई है ताकि पर्यावरणीय बदलाव तथा वैश्विक तापन जैसे जटिल और गंभीर विषयों पर समान्य पाठक भी अपनी समझ बना सके।

 

किताब में भूमिका के अतिरिक्त कुल साध अध्याय हैं। पहला अध्याय खेती-बाड़ी के क्षेत्र में पर्यावरणीय प्रभावों से निपटने के लिए अपनायी जाने वाली बातों की चर्चा पर केंद्रित हैं। दूसरा अध्याय वन और जैव विविधता पर पर्यावरणीय प्रभावों के आकलन से संबंधित है। तीसरे अध्याय में पर्यावरणीय परिवर्तनों को पानी के संदर्भ में समझने की कोशिश की गई है। पहाड़ों पर मौजूद पारिस्थितिकी को पर्यावरणीय परिवर्तन कित भांति अपनी चपेट में ले रहे हैं इसे आप चौथे अध्याय से गुजरकर समझ सकते हैं। पाँचवाँ अध्याय तटीय इलाकों के संदर्भ में पर्यावरणीय बदलावों का आकलन करता है. छठा अध्याय कृषि पर पड़ते पर्यावरणीय बदलावों के असर पर केंद्रित है जबकि सातवां अध्याय पर्यावरणीय बदलावों को लेकर होने वाली बातचीत और सरोकारों की सूचना देता है।

 

किताब के संपादकीय आलेख में जीन कंपने की संस्थापक डाक्टर सुमन सहाय ने दर्ज किया है कि पुस्तक लिखने का प्रमुख उद्देश्य लोगों को प्राकृतिक संसाधन, जैवविविधता, पारिस्थितिकी तंत्र, खेती-बाड़ी तथा खाद्य-उत्पादन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर पर्यावरणीय परिवर्तनों से पड़ने वाले दुष्प्रभाव के प्रति आगाह करना है. डाक्टर सहाय ने ध्यान दिलाया है कि खाद्य सुरक्षा और कुपोषण जैसे गंभीर मसले देश के सामने खड़े हैं तो भी सरकारी नीतियों का ध्यान कृषि से ज्यादा ऊर्जा के क्षेत्र पर है और 2008 में यूपीए सरकार द्वारा शुरु किए गए नेशनल एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज में खेती को वरीयता नहीं दी गई.

 

हालांकि पुस्तक को तैयार करने में काफी परिश्रम किया गया है और गंभीर विषय को बड़े सहज और सुलझे तरीके से प्रस्तुत करने की इसकी कोशिश अत्यंत प्रशंसनीय है तो भी पुस्तक में कुछ ऐसी कमियां रह गई हैं जिनसे बड़ी आसानी से बचा जा सकता था.

 

पुस्तक में जिन आंकड़ों को उद्ध़त किया गया है वे तनिक पुराने जान पड़ते हैं. हाल के सालों में कई नये आंकड़े आये हैं और इन आंकड़ों के सहारे पुस्तक में दर्ज आकलन को अद्यतन किया जा सकता था। मिसाल के लिए इम्पैक्ट ऑफ क्लाइमेट चेंज ऑन फारेस्ट एंड बायोडायवर्सिटी नामक अध्याय में एक सारणी दी गई है जो सकल घरेलू उत्पाद में वानिकी की हिस्सेदारी से संबंधित है(पृष्ठ संख्या-118). इस सारणी में सकल घरेलू उत्पाद में वानिकी के प्रतिशत योगदान के बारे में आंकड़े स्पष्ट रुप से नहीं दिए गए हैं। मात्र इतना भर दर्ज किया गया है कि इस क्षेत्र से 2007-08 तक कुल कितना सकल घरेलू उत्पाद हासिल हुआ और यह नहीं बताया गया है कि सारणी में दर्ज आकलन करोड़ रुपये में है कि लाख रुपये में.

 

किसी सुधी पाठक को यह बात भी तनिक खटक सकती है कि क्लाईमेट चेंज निगोशिएन्स नामक अध्याय अन्य अध्यायों की तुलना में बहुत ही छोटा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि पुस्तक के अगले संस्करण में यह कमियां सुधार ली जायेंगी।


नीचे पुस्तक में दिए गए कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को लिखा जा रहा है:

1 बीती एक सदी में राष्ट्रीय स्तर पर भूतल-वायु के तापमान में 0.4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि देखी गई है.

2. भारत सरकार का अनुमान है कि इस सदी के अंत तक भूतल के तापमान में 3-6 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी हो जायेगी.

3. भारत में समुद्री सतह के सालाना 1.06-1.75 एमएम बढ़ने का अनुमान है. अगर समुद्र का जलस्तर 45 सेंटीमीटर बढ़ जाये तो सुंदरबन का 75 प्रतिशत हिस्सा डूब जायेगा. समुद्र के जलस्तर में एक मीटर की बढ़ोत्तरी होती है तो 70 लाख लोग भारत में विस्थापित होंगे.

4. साल 2050 तक भारत में एक अरब लोगों को पानी का अभाव महसूस होगा. पानी में सबसे ज्यादा कमी शहरवासियों के लिए होगी.

5. साल 2007 से भारत सालाना 1.7 अरब टन ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन कर रहा. इसमें सर्वाधिक उत्सर्जन कार्बन डायआक्साईड का है जो कि बिजली उत्पादन के लिए जलाये जाने वाले कोयले की निष्पत्ति है.

6. संयुक्त राज्य अमेरिका की आबादी विश्व की आबादी का 4 प्रतिशत है लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका का वैश्विक उत्सर्जन में 25 प्रतिशत का योगदान है. भारत में विश्व की आबादी का 17 प्रतिशत हिस्सा रहता है जबकि भारत का ग्रीन हाऊस गैसों के वैश्विक उत्सर्जन में 4.1% का योगदान है.

7. भारत अपनी अर्थव्यवस्था और आबादी के आकार के कारण विश्व के दस सबसे बड़े ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जक देशों में शुमार है. बहरहाल भारत का प्रति व्यक्ति CO2 उत्सर्जन केवल 1.7 टन है जबकि वैश्विक औसत 4.9 टन का है.

8. विश्वबैंक ने अपने आकलन में पर्यावरणीय बदलावों के कारण आनेवाले बाढ़, और सूखे के सर्वाधिक आशंका-प्रवण 12 देशों में एक माना है.

9. अनुमान है कि 2050 तक भारत के ज्यादातर फॉरेस्ट बायोम पर्यावरणीय बदलावों की चपेट में आ जायेंगे और भारत की 70 फीसद जैविकी अपने को पर्यावरणीय बदलावों के बीच अनुकूलित नहीं कर पायेगी.

10. भारत की तकरीबन 70 करोड़ आबादी जीवन और जीविका के लिहाज से पर्यावरण संवेदी क्षेत्रों पर निर्भर हैं. पर्यावरणीय परिवर्तन से उनकी जीविका की स्थितियों पर दुष्प्रभाव पड़ेगा.

11. अनुमान है कि 2020 तक पर्यावरणीय बदलावों के कारण भारत में दूध के उत्पादन में 1.6 मिलियन टन की कमी होगी और 2050 तक दूध के उत्पादन में15 मिलियन टन कमी होने के अनुमान हैं.

 

इस विषय पर विशेष जानकारी के लिए देखें नीचे दी गई लिंक--

Coping with Climate Change (2014), edited by Suman Sahai, Heinrich Böll Stiftung (please click here to access)

National Action Plan on Climate Change (NAPCC) (please click here to access)

India's National Action Plan on Climate Change -Harshal T Pandve, Indian Journal of Occupational & Environmental Medicine, April, 2009, 13(1): 17–19 (please click here to access)