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वैश्विक शांति सूचकांक में भारत का दर्जा पहले से बेहतर लेकिन अंदरुनी संघर्ष के मोर्चे पर हालात चिन्ताजनक

नये वैश्विक शांति सूचकांक रिपोर्ट में भारत की स्थिति पिछले साल के मुकाबले बेहतर हुई है लेकिन समाजी अमन और सियासी स्थिरता के एतबार से रिपोर्ट से निकलते संकेत भारत के लिए चिन्ताजनक हैं.

 

रिपोर्ट के मुताबिक सत्ता के शिखर पर ताकत के सिमटते जाने के कारण भारत का अंकमान सियासी अतिवाद तथा अंदरुनी संघर्ष के पैमाने पर चिन्ताजनक ऊंचाई पर है. रिपोर्ट में भारत को 163 देशों की सूची में इस साल 136 वां स्थान हासिल हुआ है जबकि 2016 में 141वां तथा 2015 में 143 वां स्थान हासिल हुआ था.

 

सूचकांक में पिछले सालों के मुकाबले भारत की स्थिति बेहतर होने का कारण बताते हुए कहा गया है कि हिंसक अपराधों को रोकने के सरकारी प्रयास कामयाब हुए हैं और हथियारों के आयात में कमी होने के कारण सैन्यीकरण पहले की तुलना में घटा है. गौरतलब है कि वैश्विक शांति सूचकांक में किसी देश का दर्जा तय करने के लिए उसके सामाजिक सुरक्षा-संरक्षा के स्तर, घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय मोर्चे पर जारी संघर्ष के विस्तार तथा सैन्यीकरण पर हुए खर्च का आकलन किया जाता है.



बीते आठ सालों से इंस्टीट्यूट फॉर इकॉनॉमिक्स एंड पीस की ओर से प्रकाशित वैश्विक शांति सूचकांक में अपना दर्जा लगातार सुधारने के बावजूद भारत अब भी सियासी-समाजी शांति के लिहाज से तेज गति से आर्थिक वृद्धि करते ब्रिक्स के देशों चीन, ब्राजील तथा दक्षिण अफ्रीका से पीछे हैं (देखें इस एलर्ट का आखिर का हिस्सा).

 

दक्षिण एशिया के देशों नेपाल, भूटान, बांग्लादेश तथा श्रीलंका की तुलना में भारत में मौजूद हालात को कम शांतिपूर्ण मानते हुए ध्यान दिलाया गया है कि हिंसा की स्थितियों के कारण भारत को पिछले साल(2017) 80 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है जो देश की जीडीपी का(क्रयशक्ति के तुलनात्मक आकलन के आधार पर) 9 फीसद है. प्रति व्यक्ति के हिसाब से यह आंकड़ा लगभग 40 हजार रुपये का है.

 

वैश्विक शांति सूचकांक रिपोर्ट के आकलन की पुष्टि आर्म्ड कंफ्लिक्ट लोकेशन एंड इवेन्ट डेटा प्रोजेक्ट(एसीएलईडी) तथा इंडियास्पेन्ड के दो हालिया विश्लेषणों से भी होती है. एसीएलईडी के विश्लेषण के मुताबिक पूरे दक्षिण तथा दक्षिणपूर्वी एशिया में भारत में राजनीतिक हिंसा की दर सबसे ज्यादा है. दक्षिण एशिया तथा दक्षिण पूर्वी एशिया में साल 2016 से अबतक हुई राजनीतिक हिंसा की कुल घटनाओं में 50 फीसद सिर्फ भारत में हुई हैं और इनमें से 90 प्रतिशत घटनाएं दंगे तथा विरोध-प्रदर्शन से संबंधित हैं.

 

इंडियास्पेन्ड के विश्लेषण के मुताबिक बीते आठ सालों(2010 से 2017) में गोरक्षा के नाम पर हुई हिंसा की कुल घटनाओं में 52 प्रतिशत वाकये धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों पर हमले से जुड़े हैं. हमले की 97 फीसद घटनाएं साल 2014 में एनडीए सरकार के बनने के बाद पेश आयी हैं और हमले की ऐसी ज्यादातर(50 प्रतिशत से अधिक) घटनाएं उन्हीं राज्यों में हुई हैं जहां केंद्र में सत्ताधारी दल का शासन है.

 

इंस्टीट्यूट फॉर इकॉनॉमिक्स एंड पीस वैश्विक शांति सूचकांक(ग्लोबल पीस इंडेक्स) रिपोर्ट(2018) के प्रमुख तथ्य:

 

---रिपोर्ट में भारत को साल 2017 की घटनाओं के आकलन के आधार पर 163 देशों की सूची में 136वां स्थान हासिल हुआ है. भारत को 2016 में 141वां तथा 2015 में 143 वां स्थान हासिल हुआ था.

 

--- ग्लोबल पीस इंडेक्स में दुनिया की कुल 99.7 फीसद आबादी के बीच मौजूद शांति की दशाओं का आकलन किया जाता है. सूचकांक में देशों का दर्जा तय करने के लिए 23 गुणात्मक और परिमाणात्मक संकेतकों का इस्तेमाल होता है और मुख्य रुप से यह देखा जाता है कि किसी देश में सामाजिक सुरक्षा-संरक्षा की स्थिति कैसी है, वहां सैन्यीकरण का विस्तार कितना है, घरेलू मोर्चे पर संघर्ष किस हद तक कम या ज्यादा हैं तथा अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं पर किस स्तर तक संघर्ष जारी है.

 

---जीपीआई इंडेक्स में भारत (अंकमान 2.504) का दर्जा अफगानिस्तान (अंकमान 3.585) तथा पाकिस्तान (अंकमान 3.079) की तुलना में बेहतर है लेकिन ब्रिक्स में शामिल देशों ब्राजील (अंकमान 2.16), चीन (अंकमान 2.243) तथा दक्षिण अफ्रीका (अंकमान 2.328) से भारत पीछे है. पाकिस्तान को सूचकांक में 163 देशों की सूची में 151वां स्थान हासिल हुआ है जबकि अफगानिस्तान को 162वां. रुस(अंकमान 3.6) को सूची में 154वां स्थान हासिल हुआ है.

 

---सूची में चीन 112 वें स्थान पर है, दक्षिण अफ्रीका 125वें स्थान पर जबकि ब्राजील 106 वें स्थान पर.

 

--- युद्धजर्जर सीरिया 3.6 अंकों के साथ सूची में सबसे निचले स्थान पर है जबकि आइसलैंड ( अंकमान 1.096) सबसे ऊपरले स्थान पर.न्यूजीलैंड,आस्ट्रिया,पुर्तगाल और डेनमार्क सूची में शीर्ष के पांच देशों में शामिल हैं.

 

---पिछले साल के मुकाबले दुनिया के 85 मुल्कों में अशांति के स्वर तेज हुए हैं जबकि 75 मुल्कों में अशांति की दशा में सुधार दर्ज किया गया है और भारत पिछले साल के मुकाबले शांति की दशा में सुधार लाने वाले ऐसे ही देशों में एक है.

 

---हिंसा की स्थितियों के कारण विश्व की अर्थव्यवस्था को जितना नुकसान हुआ उसकी तुलना में भारत में हुआ आर्थिक नुकसान कम है.



---पिछले साल वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिंसा के कारण लगभग 996 लाख करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा जो वैश्विक जीडीपी का 12.4 फीसद है. इसकी तुलना में भारत को हिंसा की स्थितियों के कारण 80 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है जो देश की जीडीपी का(क्रयशक्ति के तुलनात्मक आकलन के आधार पर) 9 फीसद है.

 

इस कथा के विस्तार के लिए कृपया निम्नलिखित लिंक देखें--

 

Shillong to Thoothukudi, what data says about increasing protests in India यहां क्लिक करें

 

25 Cases Of Cow-Related Violence In 7 Months Of 2017, Surpassing 2016 As Worst Year यहां क्लिक करें 

 

84% Dead In Cow-Related Violence Since 2010 Are Muslim; 97% Attacks After 2014 यहां क्लिक करें 

 

Global Peace Index 2018 - measuring peace in a complex world यहां क्लिक करें 

 

झारखंड और महाराष्ट्र में चार लोगों की पीट-पीटकर हत्या.  यहां क्लिक करें 

 

असम में पीट-पीटकर हत्या: 23 लोग गिरफ्तार, लोगों का गुस्सा जारी यहां क्लिक करें

 

 

 (पोस्ट में इस्तेमाल की गई तस्वीर साभार पंजाब केसरी से)