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भारत में जेंडर गैप- अभी मीलों आगे जाना है..

वैश्विक लैंगिक असमानता को अगर एक पैमाने पर बैठाकर देखें तो उसमें भारत की कहानी कुछ मामलों में चमकदार मगर ज्यादातर मामलों में बदरंग नजर आएगी। पहले चमकदार पहलू को लें। साल १९९३ में संविधान का ७३ वां(पंचायत) संशोधन पारित हुआ और इस संविधान संशोधन से तृणमूल स्तर की दस लाख महिलाएं आनन फानन में राजनीतित मशीनरी का हिस्सा बन गईं। कहानी का एक चमकदार पहलू जुड़ता है नेतृत्व के शीर्ष पदों पर बैठी महिलाओं के रुप में। आजादी के बाद के कुल पचास वर्षों में १६ साल देश के राजनीतिक शीर्ष पर एक महिला विद्यमान रही और राजनीतिक नेतृत्व के इस संदर्भ में भारत का स्थान विश्व में ४ है ( ध्यान रहे यहां हम कुछेक कद्दावर महिला नेतृवर्ग मसलन सोनिया गांधी, मायावती और जयललिता की गणना नहीं कर रहे)।

महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण के पैमाने पर भारत की वैश्विक स्थिति (२४ वां स्थान) दुनिया के दूसरों देशों की अपेक्षा तनिक मजबूत है और इस मामले में जेंडर गैप की स्थिति २७ फीसद है। भारत में महिलायें संसद की कुल ११ और मंत्रीस्तरीय के कुल १० फीसदी पदों पर काबिज हैं और इस मामले में ग्लोबल जेंडर गैप के लिहाज से भारत का स्थान क्रमश १००वां और ९३ वां है।

और अब जरा वैश्विक जेंडर गैप के पैमाने पर भारत की कहानी के कुछेक बदरंग पहलुओं पर भी नजर डाल लें। स्वास्थ्य और उत्तरजीविता(सरवाइवल) के मानकों के लिहाज से भारत का स्थान सबसे आखिर(१३४ वां) में है। भारत में महिलाएं(५४साल) पुरुषों (५३ साल) से मात्र एक साल ज्यादा जीवित रहती हैं।जरा इसकी तुलना यूएन द्वारा अमल में लाये जा रहे जेंडर संबंधी वैकासिक सूचकांक से करें जो स्त्री और पुरुष के बीच आयुसंभाविता के बीच पांच साल का अंतर मानता है। यूएन के पैमाने पर भारत का स्थान  कुल १३४ देशों के बीच (स्त्री और पुरुष के आयु में अंतर के मामले में) ११९ वां है।
 द इंडिया जेंडर गैप रिव्यू २००९ के विशेष संस्करण में भारत को कुल १३४ देशों के बीच ११४ वां स्थान दिया गया है जबकि स्वास्थ्य के पैमाने पर जेंडर गैप के मानकों के लिहाज से भारत में स्त्री पुरुष के बीच अंतर ९३ फीसदी का, शिक्षा के मामले में ८४ फीसदी का, आर्थिक प्रतिभागिता के मामले में ४१ फीसदी का और राजनीतिक सशक्तीकरण के मामले में २७ फीसदी का है।

भारत में मात्र ४२ फीसद प्रसव स्वास्थ्य कर्मियों की देखरेख में होते हैं। भारत में तकरीबन ३०० महिलायें प्रतिदिन प्रसव के दौरान या गर्भावस्था की अन्य जटिलताओं के कारण काल कवलित होती हैं। जन्मकालिक लिंग-अनुपात के लिहाज से भी भारत का स्थान दुनिया में बहुत नीचे (१३१ वां) है। जन्मकालिक  सामान्य लिंग अनुपात प्रति मादा शिशु १-०६ नर शिशु का माना जाता है लेकिन भारत में यह १.१२ लड़कों का है।

भारत में प्रति हजार जावित शिशुओं प्रसव पर ५६ नर शिशुओं की मृत्यु होती है तो ६१ मादा शिशुओं की।

बालिका शिक्षा के मामले में भी भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। शैक्षिक परिलब्धि (ग्लोबल जेंडर गैप रिव्यूज में) के पैमाने पर भारत का स्थान १२१ वां है। भारत में स्त्री  (५३ फीसदी) पुरुषों(७६ फीसदी) के बीच  साक्षरता दर में लगभग एक तिहाई का अन्तर है। तकरीबन २४ करोड़ ५० लाख महिलाएं पढ़ने-लिखने की बुनियादी क्षमता से भी समपन्न नहीं हैं। प्राथमिक माध्यमिक और तृतीयक स्तर की शिक्षा में भारत का जेंडर गैप के मामले में स्थान  क्रमश ११३ वां, १२३ वां और १०३ वां है। भारत में अगर दो लड़के स्कूल जाती हैं तो एक लड़की स्कूल स्कूल जा पाती है। ठीक यही स्थिति स्कूली पढ़ाई छुटने के मामले में भी है।
 
जेंडर गैप के पैमाने पर आर्थिक प्रतिभागिता के लिहाज से भारत का स्थान १२७ वां है और इन्तर तकरीबन ४१ फीसद का है। महिला कार्यशक्ति की प्रतिभागिता(३६ फीसदी) पुरुष कार्यशक्ति की प्रतिभागिता(८५ फीसदी) से लगभग आधा है। यही स्थिति आमदनी के मामले में भी है। भारत में महिला की औसत सालाना आमदनी(११८५ अमेरिकी डॉलर) पुरुष की आमदनी ( ३६९८ अमेरिकी डॉलर) की तुलना में दो तिहाई कम है।

इस विषय पर विस्तार से जानकारी के लिए निम्नलिखित लिंक चटकायें-
 
http://www.weforum.org/en/media/Latest%20Press%20Releases/PR_IES09_IGGR09

http://www.weforum.org/en/Communities/Women%20
Leaders%20and%20Gender%20Parity/GenderGapNetwork/TheIndiaGenderGapReview/index.htm

Gender gap: India ranks a poor 114th!, 9 November, 2009, http://business.rediff.com/slide-show
/2009/nov/09/slide-show-1-gender-gap-india-ranks-a-poor-114th.htm

Global Gender Gap Report 2009, http://www.youtube.com/watch?v=du62A89hgsU

India at bottom in man-woman equality index, 10 November 2009,
http://southasia.oneworld.net/todaysheadlines/india-at-bottom-in-man-woman-equality-index