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सूचना की महामारी, फैक्‍ट-चेक का हैंडवॉश और सत्‍य का लॉकडाउन

-न्यूजलॉन्ड्री,

कुछ दिन पहले एक पत्रकार साथी का फोन आया था. वे दिल्‍ली के एक ऐसे शख्‍स की खोज खबर लेने को उत्‍सुक थे जिसे ज्‍यादातर अखबारों और टीवी चैनलों ने 9 अप्रैल, 2020 को मृत घोषित कर दिया था. मरे हुए आदमी को खोजना फिर भी आसान होता है, लेकिन ये काम थोड़ा टेढ़ा था. मित्र के मुताबिक व‍ह व्‍यक्ति जिंदा था. कुछ अखबारों और चैनलों के मुताबिक वह मर चुका था. कुछ और संस्‍थान अपनी खबरों में उसे कोरोनामुक्‍त व स्थिर हालत में बता चुके थे. ज़ाहिर है, यह खोज आसान नहीं थी. हुआ भी यही.

वायरल दिलशाद उर्फ महबूब उर्फ शमशाद

दिल्‍ली में बवाना के हरेवाली गांव का रहने वाला महबूब 6 अप्रैल, 2020 को एक वीडियो में वायरल हुआ था. कुछ लोग वीडियो में उसे मार-धमका रहे थे क्‍योंकि उन्‍हें शक था कि वो ‘थूक को इंजेक्‍शन से फलों में भरकर कोरोना फैलाने की तैयारी में था.’ तीन दिन बाद प्रेस ट्रस्‍ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) से खबर जारी हुई कि महबूब की मौत हो गयी. खबर पीटीआई की होने के नाते तकरीबन हर जगह छपी. ज्‍यादातर जगहों पर उसका नाम महबूब उर्फ दिलशाद लिखा था, केवल दि हिंदू ने उसे शमशाद लिखा. सारे मीडिया में बवाना का दिलशाद उर्फ महबूब ‘कोरोना फैलाने की साजिश’ के चलते मारा गया, लेकिन दि हिंदू के मुताबिक बिलकुल इसी वजह से इसी जगह का शमशाद नामक आदमी मारा गया था.

दो दिन के भीतर ही खबर को फैक्‍ट चेक करने वालों ने नीर क्षीर कर दिया. जिन्‍होंने दिलशाद उर्फ महबूब को मृत बताया था वे तो गलत साबित हुए ही, दि हिंदू की तो पहचान ही गलत निकल गयी. शमशाद नाम का शख्‍स तो कहीं था ही नहीं. आल्‍ट न्‍यूज़ के मुताबिक बवाना के एसीपी का कहना था कि इंजेक्‍शन वाली बात गलत थी. दिल्‍ली पुलिस के एडिशनल पीआरओ अनिल मित्‍तल ने पूरी कहानी बतायी. पीटा गया शख्‍स 22 साल का महबूब उर्फ दिलशाद ही था, जिसे बाद में लोकनायक जयप्रकाश अस्‍पताल में भर्ती कराया गया था. उसके हमलावरों को पकड़ लिया गया.

अमर उजाला ने 10 अप्रैल को खबर छापी कि दिलशाद उर्फ महबूब की हालत स्थिर है. एनडीटीवी ने 6 अप्रैल को ही भर्ती दिलशाद की हालत स्थिर होने की खबर छाप दी थी. कुछ और जगहों पर 7 अप्रैल को सही ख़बर आयी, जैसे न्‍यूज़क्लिक, नवभारत टाइम्‍स. आठ महीने बीत जाने के बाद इस खबर को गलत रिपोर्ट करने वाले मीडिया संस्‍थानों के लिंक्‍स आज दोबारा देखने पर पता चलता है कि ज्‍यादातर ने उसे दुरुस्‍त करने की परवाह नहीं की. मसलन, इंडिया टीवी, बिजनेस स्‍टैंडर्ड, दि हिंदू पर दिलशाद अब भी मरा हुआ है. वाम छात्र संगठन की एक नेत्री की ट्विटर टाइमलाइन पर भी महबूब उर्फ दिलशाद मर चुका है. भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आज़ाद ने तो तभी उसे श्रद्धांजलि दे दी थी.

एक बार मरने की खबर फैल जाए तो मनुष्‍य का जीना थोड़ा आसान हो जाता है. हो सकता है दिलशाद के साथ भी यही हुआ हो, लेकिन सभी उसकी तरह किस्‍मत वाले नहीं होते कि बच जाएं. महामारी के बारे में गलत सूचनाओं ने दुनिया भर में लोगों की जान ली है. दि अमेरिकन जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड हाईजिन के 7 अक्‍टूबर के अंक में एक अध्‍ययन छपा है. यह दुनिया भर के सोशल मीडिया से हुए दुष्‍प्रचार के कारण मरने और बीमार होने वालों की संख्‍या बताता है- 800 से ज्‍यादा लोग गलत सूचनाओं के चलते खेत रहे और 5800 लोग अस्‍पताल में भर्ती हुए.

सूचनाओं की ‘मियांमारी’

इस परिघटना के लिए जर्नल ने एक शब्‍द का प्रयोग किया है ‘’इन्‍फोडेमिक’’. इसका हिंदी में चलता अनुवाद हो सकता है ‘सूचनामारी’ यानी सूचना की महामारी. इस शब्‍द का पहला इस्‍तेमाल सार्स के दौरान 2003 में हुआ था. सूचनामारी मार्च 2020 में जब कोविड महामारी के दौरान भारत में पनपी, तो सबसे पहले इसने जो शक्‍ल अख्तियार की, उसके लिए पूर्वांचल के इलाके में बहुत पहले से चला आ रहा एक हल्का लेकिन प्रासंगिक शब्‍द उपयुक्‍त हो सकता है- मियांमारी. हमारे यहां महामारी ने सूचनामारी को जन्‍म दिया और सूचनामारी ने मियांमारी की सामाजिक परिघटना को हवा दे दी. जो समाज बहुत पहले से धार्मिक विभाजन की आग में जल रहा हो, जिस राष्‍ट्र की नींव ही धार्मिक विभाजन की मिट्टी से बनी हो, क्‍या वहां के सूचना प्रदाताओं को इस बात का इल्‍म नहीं था कि उनकी छोटी सी लापरवाही सामाजिक संतुलन को बिगाड़ देगी और लोगों की जान ले लेगी? धार्मिक समूहों द्वारा कोरोना के नाम पर फैलायी गयी झूठी सूचनाओं के प्रति उन्‍हें समाज को जहां सचेत करना था कि आग लगने वाली है, वहां उन्‍होंने खुद आग लगाने का काम क्‍यों किया?

ध्‍यान दें, कि तबलीगी जमात के नाम पर फैलाया गया झूठ तो लॉकडाउन के शुरुआती चरण का ही मामला है. अभी तो पूरा मैदान खुला पड़ा था और समय ही समय था सूचनामारी के फैलने के लिए. उसके बाद जो कुछ हुआ, उसे महज एक तस्‍वीर को देखकर समझा जा सकता है. ऐसा क्‍यों हुआ, कैसे हुआ, सचेतन हुआ या बेहोशी में हुआ, ये सब बाद की बातें हैं. फिलहाल, बीबीसी द्वारा पांच भारतीय वेबसाइटों पर किए गए 1,447 फैक्‍ट चेक के ये नतीजे देखें, जो बताते हैं कि फेक न्‍यूज़ की सूची में कोरोना अव्‍वल रहा है. उसके बाद सीएए, मुस्लिम-विरोधी सूचनाओं और दिल्‍ली दंगों से जुड़ी सूचनाओं की बारी आती है. चूंकि सीएए और दिल्‍ली दंगों का सीधा लेना-देना मुसलमानों से रहा है, लिहाजा हम आसान नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि 2020 में फेक न्‍यूज़ यानी फर्जी खबरों की जो सूचनामारी हमारे यहां हुई है, वास्‍तव में वह मियांमारी के अलावा और कुछ नहीं है.

बीबीसी का यह अध्‍ययन चूंकि जून तक ही है, तो 2020 के उत्‍तरार्द्ध का क्‍या किया जाय? इसका जवाब भी बहुत मुश्किल नहीं है. जून में राष्‍ट्रपति द्वारा हस्‍ताक्षरित तीन कृषि अध्‍यादेशों से लेकर मौजूदा किसान आंदोलन के बीच यदि हम राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सुर्खियों में रहे घटनाक्रम को देखें, तो मोटे तौर पर तीन-चार मुद्दे हाथ लगते हैं जहां गलत सूचनाएं उगलने वाली तोपों को संगठित रूप से मोड़ दिया गया. चीन के साथ रिश्‍ते, हाथरस गैंगरेप, महीने भर से चल रहा किसान आंदोलन, ‘लव जिहाद’ पर कानून, अर्णब गोस्‍वामी और कोविड-19 की वैक्‍सीन का वादा. अब इन मुद्दों में जून से पहले वाली ‘मियांमारी’ की अलग-अलग छवियां देखिए, तो सूचनाओं के लोकतंत्र को समझने में थोड़ा आसानी होगी.

चीन तो दूसरा देश है ही, उसके बारे में चाहे जितनी अफवाह फैलाओ किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा. उलटा राष्‍ट्रवाद ही मजबूत होगा. मीडिया ने यही किया. चीन पर वह साल भर सरकार का प्रवक्‍ता बना रहा. हाथरस गैंगरेप में मृत पीड़िता दलित थी और अपराधी उच्‍च जाति के थे. बाइनरी बनाने की जरूरत नहीं थी, पहले से मौजूद थी. केवल पाला चुनना था. मीडिया ने अपराधियों का पाला पकड़ा. लड़की के भाई को गुनाहगार बताया गया, भाभी को फर्जी, ऑनर किलिंग की थ्योरी गढ़ दी गयी. फिर लगे हाथ एक मुसलमान पत्रकार को पकड़ कर उसके हवाले से पॉपुलर फ्रंट को घसीटा गया, विदेशी फंडिंग की बात की गयी. सीबीआई ने कुछ दिन पहले ही चार्जशीट दाखिल की है और उच्‍च जाति के लड़कों को ही दोषी ठहराया है. पूरा मीडिया अपनी गढ़ी थ्योरी पर अब चुप है.

दैनिक जागरण में कठुआ और हाथरस केस की खबर
बिलकुल यही काम किसान आंदोलन में पहले दिन से किया गया. सड़क पर ठंड में रात काटते किसानों के लिए जिहादी, खालिस्‍तानी, आतंकवादी आदि तमगे गढ़े गये. उन्‍हें भी मुसलमानों और दलितों की तरह ‘अन्‍य’ स्‍थापित करने की कोशिश की गयी. अब भी यह कोशिश जारी है. इस बीच उत्‍तर प्रदेश सरकार ने विवाह के नाम पर धर्मांतरण को रोकने के लिए कानून ला दिया. पीछे-पीछे मध्‍य प्रदेश और हरियाणा भी हो लिए. इस कानून का निशाना कौन है? बताने की ज़रूरत नहीं. मीडिया की ओर से एक सवाल भी इस कानून पर नहीं उठा. उलटे मीडिया संस्‍थानों में सर्वश्रेष्‍ठ मुख्‍यमंत्री का सर्वे होता रहा.

मीडिया ने कभी नहीं पूछा कि 21 दिनों के महाभारत की तर्ज पर किया गया 21 दिनों का लॉकडाउन क्‍यों फेल हो गया. न ही किसी ने ये पूछा कि 15 अगस्‍त को वैक्‍सीन लाने और वायरस को भगाने के लिए दीया जलाने या थाली बजाने का वादा क्‍यों खोखला साबित हुआ. हां, कुछ जगहों से उन लोगों को मारने-पीटने की खबरें ज़रूर आयीं जिन्‍होंने न दीया जलाया था, न थाली बजायी थी. वे सभी सूचना की इस मियांमारी में ‘अन्‍य’ थे.

पूछा जा सकता है कि ऊपर गिनाया गया ये सिलसिला क्‍या तथ्‍यात्‍मक गलती यानी फैक्‍चुअल एरर की श्रेणी में आना चाहिए? क्‍या इस परिदृश्‍य का इलाज फैक्‍ट चेक है? अगर फैक्‍ट रख देने से झूठ दुरुस्‍त हो जाता, तो कम से कम इतना तो होता कि पुराने झूठ के इंटरनेट पर मौजूद लिंक ठीक हो ही जाने चाहिए थे? एक महामारी ने आखिर एक राष्‍ट्र-राज्‍य के अंगों के साथ ये कैसा रिश्‍ता कायम किया कि वह हर झूठ की अडिग आड़ बनती गयी? कहीं हम इस बीत रहे साल का निदान तो गलत नहीं कर रहे? ये महामारी किस चीज की थी आखिर? वायरस की? झूठी खबरों की? नफ़रतों की? बेइमानियों की? या फिर हमेशा के लिए राज्‍य के साथ उसके नागरिकों का रिश्‍ता बदलने वाली कोई अदृश्‍य बीमारी, जहां राज्‍य और नागरिकों के बीच में संवाद की जमीन ही नहीं बचती? (जैसा कि अपने-अपने पक्षों को लेकर अड़े हुए किसानों और केंद्र सरकार के बीच वार्ता के खोखलेपन में आजकल हम देख पा रहे हैं.)

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