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40 धड़कनें थम गई पर नहीं धड़की मिल

भागलपुर [आशीष]। साल-दर-साल भूख और बदहाली का दंश झेल रहे बिहार स्पन सिल्क मिल के कर्मचारियों के मुरझाए चेहरों पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मिल को दोबारा खोलने की घोषणा भी मुस्कान नहीं लौटा सकी। सपनों को पल-पल टूटते हुए देखने वाले ये मिल कर्मचारी अब भगवान से मौत की मुराद मांग रहे हैं।

मौत के लिए मनुहार करने वाले कर्मचारियों का तर्क है कि रोज-रोज मरने से अच्छा है कि एक दिन में ही जिंदगी को खत्म कर दें। इससे बड़ी त्रासदी और क्या होगी कि जो हाथ कल तक मशीन पर कलाकारी दिखाते थे, वे आज रिक्शा या पत्थर तोड़ने को मजबूर हैं। कुछ तो चौक-चौराहों पर चाय बना अपनी जीविका चला रहे हैं।

बदहाली के दौर से गुजर रहे कर्मचारियों से जब 'जागरण' ने संपर्क साधा तो उनका दुख एक बार फिर छलक पड़ा। मिल में मशीन मैंन का कार्य करने वाले गुलेस यादव के सपने मानों मिल बंद होते ही टूट गए। रिक्शा या मजदूरी करने वाले गुलेस बताते हैं कि मिल के बंद होने से वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा भी नहीं दिला सके।

स्थिति यह है कि पेट पालने के लिए बच्चों को भी काम करना पड़ रहा है। कुछ ऐसा ही हाल जितेंद्र रजक और भागवत झा का भी है। मेहनत-मजदूरी करने वाले ये दोनों शख्स बताते हैं कि वे लोग तंगी के कारण अपनी बेटियों की शादी नहीं करा सके। मिल में पैकिंग का काम करने वाली श्यामा देवी को बीमार पति के बेहतर उपचार के लिए इधर-उधर से कर्ज लेना पड़ रहा है। वह बताती हैं कि पिछले कई वर्षो से मिल का चक्कर लगाकर थक चुकी हूं।

रामविलास यादव बताते हैं कि मिल के दोबारा शुरू होने की आस में माया देवी, शांति देवी, लीला देवी, दिनेश पांडे, सुरेश मंडल समेत करीब 40 कर्मचारियों की मौत हो चुकी है। वर्ष 1972 में कांग्रेस के कार्यकाल में करीब 15 एकड़ के परिसर में शुरू होने वाली इस मिल का तैयार सिल्क सूबे ही नहीं बल्कि पूरे देश में भेजा जाता था। कर्मचारियों के शोर-शराबे से गूंजने वाली इस मिल को लालू सरकार ने '94' में पूंजी का अभाव बताकर बंद कर दिया था। मिल का संचालन बिहार राज्य औद्योगिक विकास निगम के जिम्मे था।