Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 73
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 74
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Warning (512): Unable to emit headers. Headers sent in file=/home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php line=853 [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 48]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 148]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 181]
Notice (8): Undefined variable: urlPrefix [APP/Template/Layout/printlayout.ctp, line 8]news-clippings/74-years-of-movement-and-farmers-movement-showing-new-hope-and-new-path.html"/> न्यूज क्लिपिंग्स् | आज़ादी@75: आंदोलन के 74 बरस और नई उम्मीद और नया रास्ता दिखाता किसान आंदोलन | Im4change.org
Resource centre on India's rural distress
 
 

आज़ादी@75: आंदोलन के 74 बरस और नई उम्मीद और नया रास्ता दिखाता किसान आंदोलन

-न्यूजक्लिक, 

आज जब हम अपनी आजादी की 74वीं वर्षगांठ और 75वां दिवस मना रहे हैं, संविधान सभा के अंतिम भाषण में डॉ. आंबेडकर द्वारा दी गयी चेतावनी बेहद प्रासंगिक है जिसमें उन्होंने  कहा था कि देश एक अन्तरविरोधों भरे दौर में प्रवेश कर रहा है, हम एक राजनीतिक लोकतंत्र तो बन गए लेकिन सामाजिक लोकतंत्र कायम न हुआ तो यह राजनीतिक लोकतंत्र भी खतरे में पड़ जायेगा।

इन 74 वर्षों में देश को सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र बनाने की जद्दोजहद लगातार जारी है।

महिला आंदोलन

लैंगिक असमानता और उत्पीड़न के खिलाफ बराबरी और सम्मान के लिए महिला आंदोलन हमारे समाज की एक विकासमान विशेषता है। वैसे तो यह सतत जारी प्रक्रिया है, पर निर्भया बलात्कार कांड पर देश की राजधानी दिल्ली में हुआ ऐतिहासिक प्रतिरोध महिला आंदोलन के इतिहास में मील का पत्थर है, जब प्रदर्शनकारी छात्र-छात्राएं-महिलाएं, वामपंथी संगठनों व नागरिक समाज के कार्यकर्ता भारी दमन की परवाह न करते हुए राष्ट्रपति भवन के द्वार तक पहुंच गए थे। अंततः सरकार को यौन हिंसा पर नया कानून बनाना पड़ा था। उस आंदोलन ने महिलाओं की जबरदस्त दावेदारी का ऐसा उद्घोष किया, जिसकी उपेक्षा करना अब किसी के लिए सम्भव नहीं है। आज देश मे चल रहे ऐतिहासिक किसान आंदोलन में भी वे अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। महिला किसान की एक नई सामाजिक श्रेणी से देश परिचित हुआ है, पिछले दिनों जब किसानों ने जन्तर मंतर पर किसान-संसद लगाई, तो दो दिन महिला किसान-संसद आयोजित हुई।

पितृसत्ता की ताकतें उनकी राजनीतिक दावेदारी से कितनी भयभीत हैं इसका ही प्रमाण है कि विधायिकाओं में 33% महिला आरक्षण का प्रस्ताव 25 वर्ष बाद भी आज तक कानून का रूप नहीं ले सका है। आज तो पितृसत्ता की पोषक सबसे प्रतिक्रियावादी ताकतें सत्ता में हैं, स्वाभाविक रूप से महिला विरोधी हिंसा, कानूनों और पूर्वाग्रहों की बाढ़ आ गयी है। इसके खिलाफ जमीनी स्तर पर तो महिलाएं लड़ ही रही हैं, मोदी राज का महिला-विरोधी तांडव जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देश निर्भया आंदोलन पार्ट 2 का साक्षी बनेगा।

कम्युनिस्ट आंदोलन

वर्ग-विषमता के विनाश के लिए, उत्पादन के साधनों पर काबिज प्रभुत्वशाली वर्गों के खिलाफ मेहनतकश वर्गों का राज बनाने की लड़ाइयां कम्युनिस्ट ताकतों के नेतृत्व में तेलंगाना से नक्सलबाड़ी होते हुए अनेक उतार चढ़ावों के साथ लगातार जारी हैं। ग्रामीण इलाकों में सामन्ती जुल्म की रीढ़ तोड़ने, उत्पीड़ित तबकों के मान और उनकी महिलाओं की मर्यादा की रक्षा, वंचित तबकों के पक्ष में जमीनी संघर्षों तथा राजनीतिक- संसदीय  दबाव के बल पर  अनेक प्रगतिशील कानून बनवाने और एक हद तक उन्हें लागू करवाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही हैं, मसलन जमींदारी उन्मूलन, सीलिंग कानून, बंगाल में बटाईदारी कानून ( ऑपरेशन बर्गा ) खाद्य सुरक्षा कानून, मनरेगा...। वे ग्रामीण गरीबों, आदिवासियों के हित में लड़ने वाली सबसे दृढ़प्रतिज्ञ शक्ति हैं। आज फासीवाद की हर अभिव्यक्ति के खिलाफ  कैम्पस से लेकर किसान-आंदोलन मेहनतकश-बुद्धिजीवी-नागरिक समाज तक लोकतंत्र के लिए लड़ने वाली सबसे सुसंगत आवाज हैं वे। यद्यपि, अपनी कतिपय गम्भीर सैद्धांतिक-राजनीतिक कमजोरियों तथा सांगठनिक बिखराव के कारण देश की राजनीति में वे एक बड़ी राजनैतिक ताकत नहीं बन पा रहे हैं और गहरे संकट का सामना कर रहे हैं।

नक्सलवादी धारा

कम्युनिस्टों द्वारा खड़े किए गए संघर्षों में नक्सलवादी धारा का विशिष्ट स्थान है, जिसने किसानों के सशस्त्र संघर्ष को केंद्र कर राजसत्ता दखल का लक्ष्य रखा था और संसदीय संघर्षों का पूरी तरह परित्याग कर दिया। इस आंदोलन की क्रांतिकारी भावना, आदिवासियों, दलितों, उत्पीड़ितों के साथ लड़ते हुए इसके नेताओं-कार्यकर्ताओं के अकूत बलिदान ने 60-70-80 के दशक में समाज में जबरदस्त आलोड़न पैदा किया, तमाम रैडिकल तत्व, छात्र-युवा, बुद्धिजीवी इसकी ओर आकर्षित हुए, साहित्य-संस्कृति पर भी इसका जबरदस्त इम्पैक्ट पड़ा। स्वाभाविक रूप से सत्ता के चरम दमन का इसे शिकार होना पड़ा। भारतीय राजसत्ता व समाज की inadequate समझ पर आधारित रणनीति के एकांगीपन, जनांदोलनों व संसदीय संघर्षों के बहिष्कार जैसे कदमों से इसे मरणांतक धक्का लगा। बाद में भाकपा माले लिबरेशन धारा ने इसे ट्रैक पर लाने की कोशिश की और बिहार में एक राजनीतिक ताकत बन कर उभरी। इसके कुछ अन्य धड़े आज भी पुरानी लाइन पर टिके हुए हैं, राजसत्ता का बर्बर दमन झेलते वे भारी धक्के का सामना कर रहे हैं।

सामाजिक न्याय का आंदोलन

जाति उत्पीड़न और गैरबराबरी के खिलाफ सामाजिक न्याय के लिए आंदोलन की धारावाहिकता आज़ादी के पूर्व से आज तक अनवरत जारी है, अम्बेडकरवादी और समाजवादी आंदोलन ने इन्हें प्रमुख प्रश्न बनाया, यद्यपि कम्युनिस्ट आंदोलन में भी यह उनके वर्ग-संघर्ष के अभिन्न पहलू के बतौर मौजूद रहा।

डॉ. आंबेडकर की चिंता के केंद्र में हिन्दू समाज के आखिरी पायदान पर खड़े, सामाजिक रूप से बहिष्कृत ( untouchable ) दलित समुदाय की सम्पूर्ण मुक्ति का स्वप्न था। इसके लिए वे जाति का विनाश ( annihilation of caste ) चाहते थे, उन्होंने हिन्दू धर्म का परित्याग कर बौद्ध धर्म स्वीकार किया,  उनको शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण दिलाने के लिए संघर्ष किये, उन्हें जमीन दिलाने के लिए भूमि के राष्ट्रीयकरण की State and Minorities में वकालत की, उनके द्वारा बनाये दल RPI ने दलितों को भूमि पर कब्ज़ा दिलाने के लिए अभियान चलाया और आंदोलन किया। अम्बेडकर पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद दोनों को निशाने पर रखते थे। वे सामाजिक और आर्थिक दोनों लोकतंत्र की बात करते थे।

एक दौर में अम्बेडकरवाद और नक्सलवाद से प्रभावित दलित पैंथर आंदोलन ने बम्बई और महाराष्ट्र में अपने जुझारू तेवर से जबरदस्त हलचल पैदा की और तमाम रैडिकल ताकतों को आकर्षित किया।

गंभीर संकट में दलित आंदोलन और राजनीति

बाद के दौर में पूरा फ़ोकस दलितों से शिफ्ट होता गया। कांशीराम ने बहुजन की बात की और बाद में वह सर्वजन तक पहुंच गई। पूरा जोर सरकार बनाने पर हो गया, यहां तक कि उसके लिए धुर-पुरातनपंथी,  भाजपा तक से हाथ मिलाने से परहेज नहीं किया गया। बसपा गम्भीर वैचारिक-राजनैतिक विचलन का शिकार हो गयी है और अब तो बात ब्राह्मण सम्मेलन  और मंदिर बनाने के वायदे तक पहुंच गयी है। सच्चाई यह है कि दलित आंदोलन और राजनीति आज गहरे संकट में है । दलित नेतृत्व का एक हिस्सा सीधे संघ-भाजपा की गोद मे चला गया है । यह अनायास नहीं है कि मोदी-योगी के राज में  दलित उत्पीड़न की घटनाओं की बाढ़ आ गयी है। दलित युवा लड़ाकू नेतृत्व की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

2018 में SC-ST ( Prevention of Atrocities ) Act के dilution को लेकर दलितों का एक जुझारू राष्ट्रव्यापी आंदोलन हुआ था, 2 अप्रैल को ऐतिहासिक बंद हुआ था, जिसमें एक दर्जन के आसपास दलित नौजवान शहीद हुए थे और सैकड़ों जेल में डाले गए थे। लेकिन मोदी सरकार को अंततः इसके आगे झुकना पड़ा था।

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.