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भारी बारिश बन रही है किसानों के लिए नुकसान का सबब

-डाउन टू अर्थ,

बारिश न हो तो किसान को नुकसान होता है और बारिश बहुत ज्यादा हो तो किसान को नुकसान होता है। कुछ ऐसा 2019 में हुआ। 2019 में मॉनसून के बाद अच्छी बारिश हुई थी, इसलिए किसान उम्मीद कर रहे थे कि बंपर पैदावार होगी। लेकिन मार्च से अप्रैल के बीच देशभर में 354 भारी बारिश की घटनाएं हो गईं। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार, यह बारिश 64.5 मिलीमीटर (एमएम) से अधिक हुई। डाउन टू अर्थ और कोलंबो स्थित रिसर्च संस्थान इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट (आईडब्ल्यूएमआई) के विश्लेषण के अनुसार, भारी बारिश की 224 घटनाएं अप्रैल और 130 घटनाएं मार्च में हुईं। 

जम्मू कश्मीर और लद्दाख भारी बारिश (52 घटनाएं) से सर्वाधिक प्रभावित हुए। इसके बाद पश्चिम बंगाल (41 घटनाएं), ओडिशा (40 घटनाएं) और मेघालय (29 घटनाएं) दो महीने में सर्वाधिक प्रभावित होने वाले राज्य थे। 11 राज्यों के किसानों ने भारी बारिश से फसलों को नुकसान की शिकायत की। यह उस समय हो रहा है जब किसानों की आमदनी में लगातार गिरावट हो रही है। किसान एक हेक्टेयर में गेहूं की फसल में 32,644 रुपए की लागत के बदले मात्र 7,639 रुपए कमाता है। यानी उसे 25,005 रुपए का भारी नुकसान होता है। धान में यह नुकसान 36,410, मक्का में 33,688 और अरहर में 26,480 रुपए का होता है। सरकार इस नुकसान से भली-भांति परिचित है। एक आरटीआई आवेदन के जवाब में हरियाणा के कृषि विभाग ने बताया कि 2018-19 के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) उत्पादन लागत 2,074 रुपए के मुकाबले 1,840 रुपए प्रति क्विंटल है। इससे साफ है कि किसान को 234 रुपए प्रति क्विंटल का नुकसान हो रहा है।

कपास में यह नुकसान 830 रुपए प्रति क्विंटल है। लॉकडाउन ने किसानों के जख्मों पर और नमक छिड़क दिया। 12 राज्यों के 200 जिलों में 1,500 किसानों पर किए गए सर्वेक्षण से पता चला है कि आधे से ज्यादा किसानों को लॉकडाउन के दौरान पिछले साल के मुकाबले कम उपज हासिल हुई है। लॉकडाउन के कारण 55 प्रतिशत किसान अपनी फसल नहीं बेच पाए और उन्हें फसल का भंडारण करना पड़ा।

3 से 15 मई के बीच यह सर्वेक्षण हार्वर्ड टीएच थेन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया और सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर की ओर से यह पता लगाने के लिए किया गया था कि लॉकडाउन से कृषि उत्पादन और जीवनयापन पर क्या असर पड़ा। अंत: हम कह सकते हैं कि स्वास्थ्य आपातकाल ने किसानों की आर्थिक स्थिति को और गंभीर बना दिया है। 

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