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दुनिया भर में एक नए रोग ने बढ़ाई मुसीबत, भारत नया शिकार

-डाउन टू अर्थ,

“माथे पर गोली मारो।” मिजोरम के सूअर पालक पिछले कुछ महीनों से इस आदेश से काफी डरे हुए हैं। हालांकि थानलियाना और उसके तीन बेटों के पास भी कोई विकल्प नहीं था। अप्रैल के बाद से अपने 500 में से 308 सूअरों को “बुखार” में खो देने के बाद उन्होंने आखिरकार थक-हारकर राज्य के पशुपालन और पशु चिकित्सा विभाग को सूचित किया।

इसके बाद 18 जून को राजधानी आईजोल के सतीक गांव में उनके सूअर पालन केंद्र पर कुछ अधिकारी पहुंचे। अधिकारी व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) पहने दो सशस्त्र पुलिसकर्मियों के साथ थे। पशु चिकित्सा अधिकारी एस्तेर लालजोलियानी ने पहले ही सूअरों के लक्षणों को अफ्रीकी स्वाइन फीवर (एएसएफ) के रूप में पहचाना था।

यह एक वायरल रक्तस्रावी बीमारी है जो सूअरों और जंगली सूअर को संक्रमित करती है और इस संक्रमण की मृत्यु दर लगभग 100 प्रतिशत है। लक्षणों के रूप में संक्रमित जानवरों को बुखार हो जाता है और उनकी त्वचा बैंगनी हो जाती है, आंखों से पानी निकलता है और मृत्यु से पहले गंभीर, खूनी दस्त होता है।

बिना किसी इलाज या टीके के अभाव में मारना (कलिंग) ही इस अत्यधिक संक्रामक बीमारी के प्रसार को रोकने का एकमात्र तरीका है। यह बीमारी जानवरों के सीधे संपर्क के माध्यम से पानी, मिट्टी, चारा, जूते, वाहन और कृषि उपकरण जैसी वस्तुएं, जीवित या मृत सूअर या सूअर के मांस से फैलती है।

उस दिन थानलियाना के सूअर पालन केंद्र में पुलिस ने 42 सूअरों को मार डाला। उन्होंने छोटे जानवरों के लिए पिस्तौल और बड़े जानवरों के लिए राइफल का इस्तेमाल किया। थानलियाना कहते हैं, “मृतकों में से एक तिहाई प्रजनन स्टॉक का हिस्सा थे और मारे गए लॉट का आधा हिस्सा बूचड़खाने को बेचने के लिए तैयार था।”

थानलियाना के सबसे बड़े बेटे पीसी रामचुलोवा कहते हैं, “पिछले दो महीनों से हर हफ्ते हम खेत के आसपास दर्जनों सूअरों को दफना रहे हैं।” मैंने बाकी स्टॉक को बचाने के लिए अधिकारियों को बुलाया। उस दिन भी परिवार ने टीम को जानवरों को दफनाने में मदद करने के लिए गड्ढा खोदा लेकिन इस काम के लिए एक अर्थ-मूवर को किराए पर लेना पड़ा क्योंकि मारे गए जानवरों की संख्या काफी अधिक थी।

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