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देश में पोषण के हालात बदतर फिर भी पोषण से जुड़ी अहम कमेटियों ने नहीं की मीटिंग!

-न्यूजक्लिक,

पोषण से जुड़ी भारत सरकार की तीन महत्वपूर्ण राष्ट्रीय स्तर की कमेटियां हैं। इन तीनों कमेटियों की जिम्मेदारी इतनी बड़ी है कि अगर यह काम न करें तो इसका मतलब है कि देशभर में पोषण की देखभाल करने वाला कोई माई बाप नहीं है। यह कमेटियां देशभर में पोषण से जुड़ी नीतियां बनाती हैं। इन नीतियों को लागू करने का काम करती हैं। राज्य से लेकर केंद्र शासित प्रदेश में पोषण से जुड़ी सरकार की योजनाओं की निगरानी और नियंत्रण की जिम्मेदारी भी इनकी ही है।

यह सब होने के बावजूद अगर यह कमेटी कोरोना महामारी के दौरान एक बार भी मीटिंग के लिए ना बैठी हों तो यह कितनी बड़ी काम चोरी है! अंग्रेजी के द हिंदू अखबार के मुताबिक पिछले साल भर से कोरोना महामारी के पैर पसारने के दौरान इन कमेटियों ने एक भी मीटिंग नहीं की है। अभी तक के 10 महीने में इतनी महत्वपूर्ण कमेटियों की जीरो मीटिंग। जबकि नियम के तहत इन कमेटियों को हर तीन महीने में एक बार मिलना होता है।

यह सब तब हो रहा है जब पूरी दुनिया में इस समय भूख और कुपोषण का स्तर बढ़ रहा है। बाल मृत्यु दर में इजाफा हो रहा है। पूरी दुनिया की पोषण से जुड़ी संस्थाएं पूरी दुनिया को पोषण से जुड़े मुद्दे पर आगाह कर रही है।

पिछले साल जुलाई महीने में यूनिसेफ ने पूरी दुनिया को आगाह किया था महामारी के दौरान कुपोषण का स्तर बढ़ेगा। इसकी वजह से मौजूदा स्तर से तकरीबन 67 लाख अधिक 5 साल से कम उम्र के बच्चे प्रभावित होने वाले हैं। पूरी दुनिया में हर महीने होने वाली 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मौतों में भी तकरीबन 10 हजार अधिक बच्चों की मौतों का इजाफा होने वाला है

अगर 5 साल से कम उम्र के बच्चे का वजन उसकी ऊंचाई के मुताबिक नहीं होता है और उसकी ऊंचाई उसके वजन के मुताबिक नहीं होती है तो इसका मतलब है कि वह अल्प पोषण का शिकार है। कुपोषण का शिकार है। अपनी जिंदगी में उसके शरीर का विकास और मानसिक विकास पर इसका बहुत बड़ा असर पड़ता है। बिल्कुल ऐसा ही असर एनीमिया की शिकार महिलाओं से पैदा होने वाले बच्चों पर पड़ता है।

इन्हीं सब पोषण के मानकों का स्तर पर रखने के लिए कोरोना से पहले की दशाओं पर नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे से जुड़ी पांचवी रिपोर्ट आई है। 22 राज्यों में हुए इस सर्वे में बताया गया है कि तकरीबन 16 राज्यों में 5 साल से कम उम्र के बच्चों में अल्प पोषण का स्तर खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। असंतुलित भोजन की वजह से तकरीबन 15 साल से लेकर 49 साल के बीच की तकरीबन एक तिहाई औरतें खून में कमी यानी एनीमिया जैसे रोग का शिकार हैं। जिसका सीधा असर उनसे जन्म लेने वाले बच्चों पर पड़ता है। बच्चों से जुड़े संकेतक के अध्ययन से यह पता चला है कि साल 2015 से लेकर 2020 तक के बीच में इनमें कोई कमी नहीं आई है।

साल 2015-16 में निकली नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की चौथी रिपोर्ट के मुताबिक 5 साल से कम उम्र के बच्चों में बौनेपन की दर 36 फीसदी थी। साल 2019-20 की रिपोर्ट में भी बौने पन की यह स्थिति है। इसका मतलब है कि बच्चों में कुपोषण बहुत लंबे समय से चलता रहा है। बौने पन से जुड़े कारकों को ठीक होने में बहुत लंबा वक्त लगता है।

ध्यान देने वाली बात है कि यह सभी आंकड़े कोरोना से पहले के हैं। कोरोना के दौरान सब कुछ ठप हो चुका था। सरकार से मिलने वाले मिड डे मील योजना बंद हो गई थी। टीकाकरण से जुड़े प्रोग्राम बंद पड़े थे। आम लोगों की जीविका से जुड़े सारे माध्यम उनके जीवन से कट गए थे। यानी पोषण से जुड़े संकेतको में कोरोना के बाद और अधिक बढ़ोतरी हुई होगी। पोषण की वजह से लोगों पर पड़ने वाले असर में और अधिक इजाफा हुआ होगा। स्थिति बद से बदतर हुई होगी।

साल 2019-20 के बजट में सरकार के जरिये मिड डे मील और इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट से जुड़ी योजना में कुल 11000 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान है। जो कि साल 2014-15 के कुल ₹13000 करोड़ खर्च करने के प्रावधान से कम है। वास्तविकता में यानी पिछले पांच साल की महंगाई और दूसरे तरह के कारकों को जोड़कर देखा जाए तो मौजूदा समय में इन योजनाओं पर खर्च होने वाली राशि और अधिक कम आएगी। सरकार की फ्लैगशिप योजना पोषण अभियान का बजट तो केवल 37 सौ करोड़ रुपये का है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा नीति 2013 के तहत गर्भवती औरत को मातृत्व लाभ योजना के तहत हर एक बच्चे पर ₹6000 देने का प्रावधान था। भाजपा सरकार ने इसमें घपले बाजी कर दी। साल 2017 में प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना आई। इस योजना के तहत गर्भवती महिला से जुड़े केवल एक बच्चे को ₹5000 सरकारी मदद देने का प्रावधान बना। भाजपा की कुछ राज्यों से जुड़ी सरकारें तो मिड डे मील योजना से अंडा हटाने पर जोर देती आई हैं। जबकि यह कमजोर वर्ग से आने वाले बच्चों में पोषण का एक जरूरी जरिया है।

भोजन के अधिकार से जुड़े कैंपेन ने 11 राज्यों के तकरीबन 4000 लोगों से बातचीत की। इन 4000 लोगों में से तकरीबन 60% लोगों ने कहा की वह खुद भी एक समय भूखे पेट सोते हैं। उन्होंने दाल और सब्जियां खानी कम कर दी है।

विश्व भूख सूचकांक में भारत 107 देशों के बीच 94 पायदान पर है। यह है भारत में भूख और पोषण से जुड़ा हुआ हाल। जिन्हें आप आंकड़ों के जरिए समझ सकते हैं। लेकिन केवल आंकड़े भी पूरी तस्वीर नहीं खींचते। पूरी तस्वीर के लिए अपने मन में जमी हुई संवेदना और करुणा को आंख में उतार कर अपने आसपास के लोगों को बड़े ध्यान से देखना होता है। अगर आप किसी गांव या झुग्गी में रहते हो तो अपने आसपास के लोगों की लगातार 10 दिन की खाने की प्लेट पर ध्यान दीजिए। आप बहुत कुछ पाएंगे। आप देख पाएंगे कि दो जून की रोटी के लिए उन्हें कितनी लड़ाई लड़नी पड़ रही है। कितने बार मन मार कर सब्जी खरीदने से खुद को दूर रखना पड़ रहा है। कितने बार दाल नहीं बन रही है क्योंकि घर का हिसाब किताब बिगड़ जाएगा। कितनी बार घर की औरतें रोटी चटनी से ही अपना पेट भर ले रही हैं। उनको आदत लग गई है घर चलाने के नाम पर रुखा सूखा कुछ भी खा लेने की। देखिए तो पोषण का भयावह हाल दिखेगा। संतुलित आहार के नाम पर संतुलित भोजन मिलने से अभी भी बहुत लोग महरूम हैं।

देश की 86 फ़ीसदी जनता महीने में ₹10 हजार रुपये से कम की आमदनी में जीती हैं। इनके यहां पांच लोगों का परिवार चलाने के लिए नमक तेल चीनी आटा चावल दाल सब्जी का जुगाड़ करने में कितनी जद्दोजहद करनी पड़ती है। इसका अंदाजा लगा लेंगे तो किसी गरीब की मेहनत पर कब्जा जमाने से पहले आपका जमीर आपसे सवाल पूछेगा।

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