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भाषाओं का सिमटता संसार, हर साढ़े तीन माह में मर रही है एक भाषा

-डाउन टू अर्थ,

पिछले साल अप्रैल में जब सारा देश लॉकडाउन की जद में था, तभी एक भाषा की गुमनाम मौत हो गई। “सारे” नामक इस भाषा को बोलने वाली आखिरी महिला लीचो 4 अप्रैल 2020 को इस दुनिया से विदा हो गई। वह करीब 50 वर्ष की थी। लीचो अंडमान के दक्षिणी द्वीप में रहने वाली महान (ग्रेट) अंडमानी जनजाति समूह से ताल्लुक रखती थी। लंबे समय तक टीबी और हृदय की बीमारियों से पीड़ित लीचो ने पोर्ट ब्लेयर के शादीपुर में स्थित अपने घर में अंतिम सांस ली। अपने अंतिम दिनों में लीचो बीमारियों की असहनीय पीड़ा के साथ अपनी भाषा के मरने की पीड़ा से भी गुजर रही थी।

उनके समुदाय के लोग अपनी मातृभाषा से दूसरी भाषाओं में स्थानांतरित हो रहे थे और अपनी जड़ों से कटते जा रहे थे। लीचो यह सब देखकर दुखी थीं। अंतिम समय तक वह अपने समुदाय के लोगों को मातृभाषा का महत्व समझाती रहीं, लेकिन समुदाय के लोगों ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। लीचो की मृत्यु की साथ ही उनकी मातृभाषा का गौरव और उसमें संरक्षित पारंपरिक ज्ञान भी दफ्न हो गया। ग्रेट अंडमानी हमारे पुरखों यानी आदि मानव के अवशेष माने जाते हैं। भारत में उनका पहला ठिकाना अंडमान ही था और लीचो उन्हीं की उत्तराधिकारी थी।

ग्रेट अंडमानी भाषाओं पर लगभग दो दशक तक शोध कार्य कर चुकीं और इन भाषाओं का शब्दकोश तैयार करने वाली भाषाविज्ञानी अन्विता अब्बी के लीचो से जैसे पारिवारिक संबंध हो गए थे। ग्रेट अंडमानी भाषा का शब्दकोश तैयार करने में लीचो ने उनकी बड़ी मदद की थी। लीचो की मृत्यु के बाद उनकी याद में सरवाइवल इंटरनेशनल में लिखे संस्करण में अब्बी लिखती हैं, “लीचो बहुत दिलेर महिला थी।

वह आदिवासियों के हक के लिए किसी से भी भिड़ जाती थी। उन्होंने अंडमान ट्रंक रोड बनाने का विरोध किया था और चेताया था कि यह रोड हमारी तरह जारवा भाषा बोलने वालों को भी समाप्त कर देगा।” उल्लेखनीय है कि अंडमान की जारवा भाषा बोलने वाले भी महज 266 लोग ही बचे हैं और उनकी भाषा पर भी विलुप्ति का खतरा है। अब्बी आगे लिखती हैं, “लीचो की मौत से साथ ही एक अद्भुत भाषा (सारे) का ज्ञान भी खत्म हो गया। उनकी मृत्यु से केवल उनके परिवार को ही क्षति नहीं पहुंची है, बल्कि पूरी संपर्ण मानवता को भी नुकसान पहुंचा है।” सारे भाषा की मृत्यु के साथ पर्यावरण और जैव विविधता से जुड़ाव भी काफी हद तक खत्म हो गया।

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