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वक्त के साथ बदल गई हमारी नींद की आदत

नींद हम सबके लिए जरूरी है। आमतौर पर माना जाता है कि सात से आठ घंटे की एकमुश्त नींद स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। लेकिन क्या एकमुश्त नींद हमेशा से हमारी दिनचर्या का हिस्सा रही है? और क्या आठ घंटे की लगातार नींद प्राकृतिक है? अगर हम अतीत में झांकें तो पाएंगे कि हमारी नींद की प्रकृति काफी हद तक बदल चुकी है। करीब 200 साल पहले तक हम एकमुश्त नींद नहीं लेते थे। इतिहासकार ए रोजर एर्किच ने मार्च 2016 में स्लीप जर्नल में लिखा है कि औद्योगिक काल से पूर्व पूरे यूरोप में सालभर लोग रात में दो टुकड़ों में सोते थे। इतिहासकार नींद की इस प्रवृति को प्राकृतिक मानते हैं।

नींद की यह प्रवृति केवल पश्चिमी देशों तक ही सीमित नहीं थी बल्कि उत्तरी अमेरिका, मध्य पूर्व, अफ्रीका, दक्षिण एशिया, दक्षिणपूर्व एशिया, ऑस्ट्रेलिया और लैटिन अमेरिका में भी इसी प्रकार सोने का चलन था। एर्किच लिखते हैं, “फ्रांस के पादरी आंद्रे थेवेट ने साल 1555 में ब्राजील के रियो डी जनेरियो की यात्रा के दौरान पाया था कि वहां के लोग पहली नींद के बाद रात को खाने के लिए उठ जाते थे, फिर दोबारा सो जाते थे।”

पहली नींद के बाद उठकर बहुत से लोग प्रार्थनाएं करते थे, पड़ोसियों से बात करते थे, किताबें पढ़ते हैं और प्रेम संबंध बनाते थे। उस समय चिकित्सक बच्चों की चाहत वाले दंपतियों को पहली नींद के बाद शारीरिक संबंध बनाने की सलाह देते थे क्योंकि पहली नींद के बाद गर्भ ठहरने की ज्यादा संभावनाएं थीं। एर्किच को कोर्ट के दस्तावेजों, चिकित्सा की किताबों, साहित्य आदि में रात में दो नींद के ढेरों उल्लेख मिले। आमतौर पर पहली नींद दो घंटों की होती थी और लोग आधी रात से पहले जाग जाते थे। फिर एक या दो घंटे के अंतराल के बाद लोग दूसरी नींद की आगोश में चले जाते थे।

नींद की इस प्रकृति में बदलाव की शुरुआत 16वीं शताब्दी में तब हुई जब सामाजिक सुधारों के मद्देनजर विभिन्न सामाजिक समूहों द्वारा रात को बैठकें होने लगीं। हालांकि इनमें वही लोग शामिल हो सकते थे जो मोमबत्ती की रोशनी का खर्चा उठाने में सक्षम थे। इसके बाद गलियों और घर में कृत्रिम रोशनी की व्यवस्था और कॉफी हाउस के चलन के साथ रात में गतिविधियां बढ़ गईं और धीरे-धीरे दो नींद की प्रवृति जाती रही। 1667 में पेरिस दुनिया का पहला शहर बना जहां कांच के लैंप में मोमबत्ती जलाकर स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था की गई। बाद में कई शहरों में ऐसी व्यवस्था हुई और तेल से जलने वाले लैंप विकसित हो गए। 17वीं शताब्दी के अंत तक यूरोप के 50 शहरों की गलियां रोशनी से जगमगाने लगीं।

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