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पेटा विवाद निराधार : भारत में दूध उत्पादन और पशु कल्याण हैं एक दूसरे के पर्याय

-रूरल वॉइस,

पीपुल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) ने सुझाव दिया है कि गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ) यानी अमूल को प्लांट बेस्ड डेयरी (पौधों से तैयार होने वाला दूध) डेयरी चलानी चाहिए । पेटा के इस सुझाव के बाद पेटा और अमूल के बीच एक विवाद छिड़ गया। जाहिर सी बात है पेटा का जो सुझाव है उसका भारतीय संदर्भ में कोई अर्थ नहीं है और यह बेतुका है।  प्रश्न उठता है कि पेटा ने प्लांट बेस्ड 'डेयरी' चालू करने के  लिए आखिर कहा क्यों ? प्लांट बेस्ड प्रोडक्ट क्यों नहीं ? जाहिर है कि डेयरी शब्द उत्पाद की तुलना में अधिक प्रभावी है।

स्विच ओवर की अवधारणा

इस पूरे मसले की तह में जाने के लिए हमें 'स्विच ओवर' अवधारणा की उत्पत्ति को समझने की जरूरत हैं । साल 2017 में स्वीडन की एक ओट मिल्क कम्पनी ओटली ने एक डेयरी किसान को प्लांट बेस्ड डेयरी शुरू करने मे उसकी सहायता की । किसान ने प्लांट आधारित डेयरी शुरू की और उसने देखा कि उसका मुनाफा काफी बढ़ गया । यह जानकर उसे काफी आश्चर्य हुआ ।  धीरे –धीरे अन्य डेयरी किसानों भी प्लांट आधारित की ओर बढने लगे। इसके बाद प्लांट बेस्ड डेयरी को बढ़ावा देने के लिए  अमेरिका  के लॉग, काशी और मियोको की क्रीमरी द्वारा भी कुछ  इसी तरह की पहल की गई थी। यहां गौर करने वाली बात यह है कि उन्होंने डेयरी उत्पादों की प्रतिस्पर्धा में अपने गैर डेयरी उत्पाद को लांच किया । लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि  प्लांट आधारित डेयरी की शुरूआत किसानों और कम्पनियों ने शाकाहार (वेगन) के प्रति लगाव के लिए नहीं बल्कि मुनाफा कमाने के लिए की । वहीं कई डेयरी कंपनियों ने गैर डेयरी  उत्पाद पर दूध शब्द का उपयोग कर उपभोक्ताओं को कथित रूप से भ्रमित करने के लिए ऐसे ब्रांडों के खिलाफ मुकदमा दायर किया ।

इस प्रकरण से दो मुद्दे उभर कर सामने आते हैं । पहला यह कि जिस किसान का ऊपर उल्लेख किया गया है, वह बड़े जोत वाला किसान था और उसने बड़ी संख्या में गाय पाल रखी थी । जाहिर है कि कंपनियां ऐसे ही किसानों का समर्थन करके अपने उत्पाद लांच कर सकती हैं। हो सकता है कि किसान ने अपनी गायों की स्लाटरिंग के बाद हासिल पूंजी का उपयोग कर प्लांट बेस्ड डेयरी और उसके लिए जरूरी खेती शुरू कर की।

भारतीय डेयरी क्षेत्र

भारत में स्थिति बहुत अलग है भारत में दूध उत्पादन अभी भी घरेलू गतिविधि है। अगर आंकड़ों की बात करें तो  जहां तक मेरी जानकारी है उसके मुताबिक भारत में  ऐसे  7.5 करोड़ डेयरी किसान हैं। उनके पास 10 या उससे भी कम मवेशी है और परिवार के लोग ही इस काम को खुद करते हैं। अमेरिका, यूरोप, इज़राइल, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे देशों के डेयरी फार्म की तुलना में यह किसान बहुत छोटे हैं। देश के इन किसानों के पास कुल  19.29 करोड़ पशु हैं। जिसमें 10.98 करोड़ भैंस हैं। देश का दूध उत्पादन वित्त वर्ष 2020 में 19.88 करोड़ टन रहा जो 2019 के 18.77 करोड़न टन की तुलना में 5.91 फीसदी अधिक था। भारत में उत्पादित दूध की वैल्यू करीब नौ लाख करोड़ रुपये सालाना है जो देश के सकल घरेलू उत्पाद की 4.2 फीसदी है। यह आंकड़े इस बात को स्पष्ट करते हैं कि भारत में दूध उत्पादन उन छोटे दूध उत्पादकों के लिए कितनी महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि है जो वित्तीय सुरक्षा प्राप्त करना चाहते हैं । इसमें कोई दो राय नही है कि केवल फसल उत्पादन पर पूरी तरह से निर्भर रहना वित्तीय तौर से एक अच्छा विकल्प नहीं है। मौसम की बेरुखी जैसी गंभीर समस्याओं ने कुछ किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया। इसलिए कुछ गायों या भैंसों को लेकर मिश्रित खेती करने वाले किसान सुरक्षित रहे हैं क्योंकि दूध से उन्हें दैनिक आय मिलती है।

तो इन हालात में कोई यह कैसे उम्मीद कर सकता है कि इतनी बड़ी संख्या में छोटे किसान प्लांट बेस्ड पदार्थों की ओर रुख करेंगे? इसके अलावा, दुनिया के कई देशों में मवेशियों को मांस के लिए मार दिया जाता है। ऐसी जगहों पर किसानों द्वारा पशुओं की स्लॉरिंग कर उससे हासिल पूंजी के जरिेये स्विच करना संभव बना सकता  है । लेकिन भारत में यह सोचना भी असंभव है कि इतनी बड़ी संख्या में मवेशियों को मारा जा सकता है। क्या पेटा को यह पसंद होगा !

दूसरा मुद्दा यह है कि पौधे आधारित उत्पादों को दूध क्यों कहा जाता था ? आखिर दूध के अलावा कोई और नाम या ब्रांड क्यों नहीं खोज पाए और क्यों दूध और दूध उत्पादों के साथ ही प्रतिस्पर्धा की ? ऐसा इसलिए है क्योंकि उन सभी कंपनियों को यह अच्छे से पता है कि दूध अकेले ही सभी पोषक तत्वों का स्रोत है और पूरी दुनिया में इसका उपभोग किया जाता है। इसको सभी उपभोक्ताओं द्वारा अपनाया भी गया है। इसलिए उन्होंने पाया कि प्लांट बेस्ड उत्पादों को दूध का नाम देकर न सिर्फ ग्राहक को भ्रमित किया जा सकता है साथ ही दूध और दूध उत्पादों द्वारा प्राप्त ब्रांड लोकप्रियता का लाभ भी उठाया जा सकता है। इसका नजीजा यह भी हुआ कि प्लांड बेस्ड डेयरी उत्पादकों और प्रसंस्करण कंपनियों के खिलाफ गैर डेयरी उत्पादों पर दूध का टैग लगातार बेचने पर उपभोक्ताओं को भ्रमित करने के आरोप के तहत मुकदमें भी दर्ज किये गये।

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