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लॉकडाउन से उपजे पेट के संकट ने महामारी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया

-न्यूजक्लिक, 

‘मोर बस्ती कोरोना से ज्यादा खतरनाक है। वहां बहुत कचड़ा और गंध है, आप बस्ती जाएंगे तो आपको भी कोरोना हो जाएगा।’ ये कहना है नंदू का। नंदू जिसने शहर इलाहाबाद में यमुना नदी के तट पर अपने जिंदगी की पहली सांस ली थी। वह आज भी यमुना नदी के किनारे बसे कीडगंज इलाके की एक बस्ती में रहता है, नंदू की उम्र कुल जमा आठ साल है लेकिन नंदू शहर भर की ख़ाक छानने का अनुभव रखता है।

रोज सुबह बड़ी सी झाल लिए नंदू बिना मास्क, दस्ताने और चप्पल के शहर की ओर निकल पड़ता है। आठ साल की उम्र में उसके कदम कभी स्कूल में नहीं पड़े, लेकिन उसने शहर के कई स्कूलों के सामने से कूड़ा उठाया है। नंदू के परिवार में कुल आठ सदस्य हैं। घर में चार सूअर है, लेकिन उससे कोई आर्थिक लाभ नहीं है। परिवार में सभी कबाड़ बीनने का काम करते हैं। नंदू बताता है कि पहले सब मिलकर ठीक-ठाक पैसा कमा लेते थे, लेकिन अब बहुत कम पैसा मिलता है।

कोरोना वायरस का संक्रमण जब पूरी दुनिया में फैल चुका है उसी समय समाज के कुछ हिस्से ऐसे हैं जो अभी भी कोरोना वायरस और उसके संक्रमण से अनभिज्ञ हैं। कोरोना वायरस के संबंध में हुए शोध से यह पता चलता है कि यह एक संक्रामक बीमारी है। इस वायरस का संक्रमण संक्रमित व्यक्तियों या उनके द्वारा प्रयोग की गई वस्तुओं के सम्पर्क में आने से अन्य इंसानों में फैलता है। इसके बावजूद कबाड़ या कचड़ा उठाने के काम में लगे बच्चे और कर्मचारी बिना किसी सावधानी और सुरक्षा के इस काम में लगे हैं।

गौरतलब है कि देश में एक बड़ी आबादी कबाड़ उठाने के काम से जुड़ी है जिसमें 5 से 18 साल के बच्चों की संख्या अधिक मानी जाती है। कोरोना माहामारी में भी बड़ी संख्या में लोग शहर की गलियों, मोहल्लों, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों से प्लास्टिक और कांच की बोतलें इकट्ठा कर रहे हैं। इलाहाबाद शहर में कुछ हिस्से ऐसे हैं जहां वर्षों से पड़ोसी जिलों और अन्य राज्यों से आकर धरकार समुदाय झुग्गी-झोपड़ियों की सघन बस्तियों में बसा है।

इन बस्तियों में बिजली, पानी और शौचालय की व्यवस्था न के बराबर है। मुसहर समुदाय भी बांस का सामान बनाने, सुअर पालने और कबाड़ बीनने के काम से जुड़ा है। हमने कोरोना के इस संकटकाल में कबाड़ उठाने वाले लोगों के सम्मुख आने वाली समस्याओं और चुनौतियों को जानने की कोशिश की।

बिना मास्क और दस्ताने के योद्धा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाउन के दौरान सुरक्षा बल, डॉक्टर और सफाई कर्मचारियों को कोरोना योद्धा की उपाधि दी। लेकिन देश भर में अचानक हुए लॉकडाउन से हैंड टू माउथ जैसे रोजगार से जुड़े लोगों का जन-जीवन बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। कबाड़ उठाने वाले लोगों के समक्ष पेट का संकट साफ तौर से देखा जा सकता है। कबाड़ बीनने वाले परिवारों में बचत जैसा कुछ नहीं होता। स्थाई तौर पर निवासी न होने के कारण सरकारी सुविधाओं का लाभ इन परिवारों को नहीं मिल पाता है। इन परिवारों के भरण पोषण का एक मात्र जरिया कबाड़ होता है। इन्हीं में से एक हैं सुनीता। सुनीता सुबह-सुबह बच्चों के साथ अपनी बस्ती से कबाड़ बीनने शहर की ओर निकल पड़ती हैं। लॉकडाउन में कबाड़ बीनने वालों को पुलिस शहर में आने से रोकती थी। लॉकडाउन खुलते ही कबाड़ उठाने का काम दुबारा शुरू हो चुका है। सुनीता बताती हैं "घर में पति बीमार हैं। दवा के पैसे नहीं हैं। सोडा खा लेते हैं तो पेट का दर्द खत्म हो जाता है"।

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