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होलिका दहन की रात अपने गन्ने की फ़सल क्यों जलाना चाहते हैं रीगा के किसान?

-न्यूजक्लिक,

बिहार के सीतामढ़ी जिले के रीगा निवासी किसान रामश्रेष्ठ सिंह कुशवाहा इस रविवार को एक बैठक में अपनी आपबीती सुनाते हुए कह रहे थे कि “मैंने एक बीघा जमीन पर इस बार गन्ने की खेती की है। गन्ना तो बिका नहीं। पांच कट्ठे जमीन पर लगी गन्ने की फसल को मैंने जला दिया है, बाकी बचे 15 कट्ठे जमीन में लगे गन्ने को मैं होलिका दहन की रात जला दूंगा। गन्ना बिकने का कोई इंतजाम नहीं है, तो इसे रखकर क्या फायदा?”

यह कहते वक्त उस सीमांत किसान रामश्रेष्ठ सिंह की आंखों में गहरी नाराजगी थी। उनकी बातों में जो आक्रोश था, उससे रीगा में आयोजित उस बैठक में मौजूद सभी किसान सहमत थे। क्योंकि उस इलाके के कमोबेश 25 हजार किसानों की स्थिति ऐसी ही है। जिस रीगा चीनी मिल के भरोसे उन्होंने गन्ने की खेती की थी, वह अचानक ईख पेराई के वक्त बंद हो गयी। रीगा शुगर मिल बंद होने के बारे में

न्यूज़क्लिक ने 18 जनवरी को विस्तार से एक ख़बर प्रकाशित की थी। इस ख़बर को आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं-

बिहार में एक और चीनी म
ल की बंदी और हज़ारों क
सानों की तबाही

सरकार ने पास-पड़ोस के चीनी मिलों को इस इलाके में लगी 12 लाख क्विंटल गन्ने की फसल खरीदने का जिम्मा देकर पल्ला झाड़ लिया। पड़ोस के चीनी मिल वालों ने भी किसानों की मजबूरी का लाभ उठाकर उनसे औने-पौने दर पर बिचौलिये के जरिये गन्ना खरीद लिया। फिर भी तकरीबन 5 लाख क्विंटल गन्ने की फसल अभी खेतों में खड़ी है।

इस पांच लाख क्विंटल गन्ने की फसल को खरीदने वाला कोई नहीं है, सभी चीनी मिलों का पेराई सत्र खत्म हो चुका है। ऐसे में रीगा के 25 हजार किसानों के सामने खेतों में खड़ी अपने गन्ने की फसल को जला देने के सिवा कोई विकल्प नहीं है।

उसी बैठक में शामिल बड़े जोतदार किसान गुणानंद चौधरी कहते हैं कि जिस गन्ने की फसल को वे हर साल 300 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बेचते थे, उसे इस दफा 100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बेचना पड़ा। मजबूर होकर बिचौलिये के हाथ। रीगा चीनी मिल अगले साल खुल जायेगी ऐसी उम्मीद लगती नहीं है। इसलिए उन्होंने अगले साल अपने खेतों में आम और लीची के पौधे लगाने का फैसला कर लिया है। अब वे गन्ने की खेती नहीं करेंगे।

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