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महिला किसान दिवस: खेत से लेकर सड़क तक आवाज़ बुलंद करती महिलाएं

-न्यूजक्लिक,

यूं तो महिला किसान दिवस की अपनी एक अलग अहमियत है लेकिन आज हज़ारों महिला किसान, जो देश की राजधानी की सीमाओं पर डटी हुई हैं उन्होंने इसकी अलग ही परिभाषा गढ़ दी है। वो ‘दिल्ली चलो’ आंदोलन की महज़ समर्थक ही नहीं बल्कि उसमें बराबर की भागीदार भी हैं। वो पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपने हक़ की लिए लड़ाई लड़ रही हैं, नारे लगा रही हैं और सत्ता की आंखों में आंखें डाल उनकी नींद उड़ा रही हैं।

किसान आंदोलन में शामिल दिल्ली के सिंघु, टिकरी और गाज़ीपुर बॉर्डर पर बैठी औरतें सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस शरद अरविंद बोबडे को भी जवाब दे रही हैं, जिन्होंने इस आंदोलन में महिलाओं की भूमिका को लेकर कई टिप्पणियां कीं। इन टिप्पणियों को महिला किसान रूढ़िवादी और समाज की पितृसत्तामक सोच की नुमाइश के तौर पर देख रही हैं।

आपको बता दें कि 11 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में चीफ़ जस्टिस बोबडे ने सवाल किया था कि 'इस विरोध प्रदर्शन में महिलाओं और बुज़ुर्गों को क्यों शामिल किया गया है?' जस्टिस बोबडे ने वरिष्ठ वकील एच एस फुल्का से कहा कि 'वो आंदोलन में शामिल महिलाओं और बुज़ुर्गों को प्रदर्शन स्थल से घर वापस जाने के लिए राज़ी करें।'

महिलावादी संगठनों का महिला किसान मार्च

महिला किसान दिवस के अवसर पर अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संगठन समेत कई महिलावादी कार्यकर्ताओं ने एकजुट होकर सोमवार, 18 जनवरी को प्रदर्शनकारी महिलाओं के समर्थन और केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ़ प्रदर्शन के अलग-अलग जगहों से एक मार्च निकाला। इस मार्च का नाम ‘हर महिला का हाथ, महिला किसानों के साथ’ दिया गया। इस दौरान सभी ने एक सुर में सरकार से नए कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग की।

सिंघु बार्डर के मंच से महिला किसानों को संबोधित करते हुए ऐपवा की राष्ट्रीय सचिव कविता कृष्णनन ने कहा, “आपके संघर्ष ने दिल्ली की सर्दी में गरमाहट ला दी है, मोदी सरकार के दंभ को भीतर से हिला दिया है और देश के लोकतंत्र को मज़बूत कर दिया है।”

चीफ़ जस्टिस बोबडे की टिप्पणी का जवाब देते हुए कविता ने कहा, “महिलाओं की जगह चारदिवारी में बंद नहीं है, हम पिंजरें में बंद नहीं रहेंगे। हम सड़कों पर आएंगे, संघर्षों में आएंगे, जुलूसों में आएंगे सभी युद्धों में आएंगे। सारी महिलाओँ की जगह सड़क पर है, संघर्ष में है।”

कविता ने कहा कि जब-जब देश का लोकतंत्र खतरे में पड़ता है और लोग सोच में पड़ जाते हैं कि अब क्या होगा, तब-तब गरीब वर्ग और महिलाएँ ऐसी लड़ाई खड़ी कर देते हैं, जिससे देश के संविधान में नई जान आ जाती हैँ। ये लड़ाई खेती बचाने की है क्योंकि खेती बचेगी तभी राशन बचेगा और तभी देश का लोकतंत्र बचेगा।

कृषि क्षेत्र में महिलाओँ की भूमिका

भारत में कृषि क्षेत्र में आधी आबादी का अहम योगदान है। इन्हें ग्रामीण अर्थव्यवस्था का रीढ़ भी कहा जाता है। जनगणना 2011 के सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में छह करोड़ से ज़्यादा महिलाएं खेती के व्यवसाय से जुड़ी हैं।

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