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अडानी समूह के गोदाम में गेहूं न रखने से हुए नुकसान की कैग रिपोर्ट हटाने को प्रयासरत मोदी सरकार

-द वायर,

केंद्र की मोदी सरकार नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की उस रिपोर्ट में संशोधन कराने की कोशिश कर रही है, जिसमें कैग ने भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को फटकार लगाते हुए कहा था कि हरियाणा के कैथल स्थित अडानी साइलो में स्वीकृत मात्रा में अनाज न रखने के चलते करदाताओं का 6.49 करोड़ रुपये का बेजा खर्च हुआ है.

उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय, जिसके अधीन एफसीआई आता है, ने कैग को पत्र लिखकर मांग की है कि इस पैराग्राफ को रिपोर्ट से हटाया जाना चाहिए.

मंत्रालय ने दावा किया है कि जिस आधार पर इस अतिरिक्त खर्च का आकलन किया गया है, वो सही नहीं है. हालांकि कैग ने इन दलीलों को खारिज करते हुए ऐसा करने से इनकार कर दिया है.

द वायर  द्वारा सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत प्राप्त किए गए 88 पेज के आंतरिक दस्तावेजों से ये जानकारी सामने आई हैं.

इन फाइलों में शामिल कैग की ड्राफ्ट रिपोर्ट से ये भी पता चलता है कि 2013-14 से 2015-16 के बीच उस स्टोरेज क्षमता के लिए भी अडानी कंपनी को 24.28 करोड़ का भुगतान किया गया, जिसका एफसीआई ने कभी इस्तेमाल ही नहीं किया था.

इस दौरान 11 महीनों में अडानी साइलो में कुल 5.18 लाख टन जगह खाली पड़ी रही, लेकिन एफसीआई ने इसमें गेहूं नहीं रखा और वे खाली जगह का किराया भरते रहे थे.

क्या है मामला
भारतीय खाद्य निगम हर साल अपनी एवं राज्य सरकार तथा इसकी एजेंसियों द्वारा गेहूं की खरीद करता है. राज्य की एजेंसियां खरीद सीजन बीतने के बाद सारा स्टॉक एफसीआई को हैंडओवर कर देती हैं.

यदि अनाज रखने के लिए एफसीआई के पास जगह नहीं बचती है तो राज्य सरकार और इसकी एजेंसियां अपने साइलो या गोदाम में गेहूं रखती हैं, जिसके बदले में एफसीआई भारत सरकार द्वारा तय की गई राशि का भुगतान करता है.

इसी सिलसिले में साल 2007 में एफसीआई ने हरियाणा के कैथल में अडानी एग्रो लॉजिस्टिक लिमिटेड के साइलो में दो लाख टन गेहूं के भंडारण के लिए कॉन्ट्रैक्ट किया.

इसके लिए फरवरी 2013 में एक समझौता हुआ, जिसमें ये तय किया गया कि गेहूं रखने के लिए एफसीआई हर साल प्रति टन 1,842 रुपये की दर से कंपनी को भुगतान करेगा. बाद में सितंबर 2014 में इसे बढ़ाकर 2,033.40 रुपये प्रति टन प्रति वर्ष कर दिया गया.

खास बात ये है कि ये समझौता गारंटीड टनेज (Guaranteed Tonnage) के आधार पर हुआ था. इसका मतलब ये है कि यदि दो लाख टन गेहूं रखने के लिए के लिए कॉन्ट्रैक्ट हुआ है, तो हर साल पूरे दो लाख टन का भुगतान करना होगा, चाहे इससे जितना भी कम गेहूं रखा जाए.

इसे लेकर कैग ने साल 2018 की रिपोर्ट नंबर-4 में बताया था कि एफसीआई ने राज्य सरकार एवं इसकी एजेंसियों के गोदामों या साइलो में ही गेहूं रहने दिया और इसे अडानी साइलो में शिफ्ट नहीं किया गया, जिसके कारण एक तरफ अडानी साइलो में खाली जगह का भी भुगतान करना पड़ा और राज्य के गोदामों में गेहूं रखने से करदाताओं के 6.49 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च हुए, जिसे बचाया जा सकता था.

राष्ट्रीय ऑडिटर ने कहा कि 2013-14 से 2015-16 के बीच कैथल साइलो कई बार खाली पड़ा रहा, 14 अप्रैल 2014 को यह 1.33 लाख टन (कॉन्ट्रैक्ट की तुलना में 67 फीसदी) खाली पड़ा रहा. जबकि पेहोवा, पुंडरी और पाई में राज्य के गोदामों में गेहूं पड़ा हुआ था.

साल 2013-14 के दौरान आठ महीने और साल 2014-15 के दौरान तीन महीने साइलो में क्षमता के मुकाबले गेहूं का स्टॉक कम था.

कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि राज्य सरकार एवं इसकी एजेंसियों के गोदामों की तुलना में साइलो में गेहूं रखना सस्ता होता है. इसलिए करदाताओं के पैसे बचाने के लिए ये करना जरूरी था.

हालांकि मोदी सरकार का मानना है कि कैग का ये आकलन सही नहीं है और इसे वापस लिया जाना चाहिए.

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