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क्या भारत में गैर सरकारी संगठनों के लिए अब कोई जगह नहीं बची है?

-सत्याग्रह,

हाल ही भारत में गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) से जुड़ी दो खबरों ने दुनिया भर में सुर्खियां बटोरीं. पहली खबर मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल से जुड़ी है. भारत सरकार ने एमनेस्टी के बैंक खाते फ्रीज कर दिए जिसके बाद संस्था ने भारत में अपना काम बंद करने की घोषणा कर दी. दूसरी खबर विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम (एफसीआरए) में किया गया बदलाव है. इन दो घटनाओं को लेकर दुनिया भर में भारत सरकार की काफी आलोचना हो रही है. कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार जान-बूझकर गैर सरकारी संगठनों को निशाना बना रही है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि उसे उसके कामकाज की वजह से निशाना बनाया जा रहा है. मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली इस संस्था ने बीते अगस्त में दिल्ली के दंगों पर एक रिपोर्ट जारी की थी. इसमें दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए गये थे. रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस पर दंगे ना रोकने, उनमें शामिल होने, फ़ोन पर मदद मांगने पर मना करने, पीड़ित लोगों को अस्पताल तक पहुंचने में बाधा खड़ी रोकने और ख़ास तौर पर मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव करने जैसे संगीन आरोप लगाए गए थे. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस रिपोर्ट के लिए दंगाग्रस्त इलाकों की पड़ताल और करीब 50 लोगों से बात की थी. इनमें दंगों में किसी तरह बच गए लोग, चश्मदीद गवाह, वकील, डॉक्टर, मानवाधिकार कार्यकर्ता और सेवानिवृत्त पुलिस अफसर शामिल थे. इसके अलावा संस्था ने दंगों से जुड़े कई वीडियो को भी अपनी रिपोर्ट का आधार बनाया था.

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में पुलिस द्वारा वकीलों और पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार और उन पर हमले के बारे में भी विस्तार से बताया गया है. इसके अलावा रिपोर्ट में यह दावा भी किया गया है कि दंगों में बच गए लोगों में से कइयों को पुलिस ने डराया, उन्हें गैर-कानूनी हिरासत में रखा और कोरे कागजों पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया. मानवाधिकार संस्था ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ तौर पर कहा कि दिल्ली पुलिस के जवान हिंसा में सक्रिय रूप से भागीदार थे, लेकिन इसके बावजूद इस मामले में छह महीनों में एक भी जांच नहीं बैठाई गई.

एमनेस्टी इंटरनेशनल बीते कई सालों से लगातार जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर भी केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करता आ रहा है. वह बार-बार यह कहते हुए सरकार की आलोचना करता रहा है कि जम्मू-कश्मीर सहित भारत के कई हिस्सों में असंतोष का दमन किया जा रहा है. बीते साल संस्था ने अमेरिका में विदेश मामलों की एक समिति के सामने दक्षिण एशिया में मानवाधिकारों की स्थिति पर अपनी एक रिपोर्ट पेश की थी. इसमें उसने विशेष तौर पर कश्मीर घाटी में की गयी अपनी जांच के बारे में विस्तार से लिखा था. संगठन, जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को ख़त्म किए जाने के बाद से हिरासत में रखे गए सभी नेताओं, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को रिहा किए जाने और वहां सामान्य इंटरनेट सेवा को बहाल करने की मांग को भी दुनिया के कई मंचों पर उठाता रहा है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इन कामों की वजह से ही मोदी सरकार उसके खिलाफ बदले की भावना से काम कर रही है और उसकी वित्तीय परिसंपत्तियों को निशाना बना रही है. एमनेस्टी के एक वरिष्ठ अधिकारी रजत खोसला कहते हैं, ‘बीते कुछ सालों से हमें (भारत) सरकार की ओर से आधिकारिक तौर लगातार धमकाया जा रहा था और हमारा उत्पीड़न किया जा रहा था. अब हमें बिना आधिकारिक सूचना दिए हमारे बैंक अकाउंट फ्रीज कर दिए गए....एमनेस्टी ने जिन स्रोतों से पैसा लिया वे पूरी तरह वैध हैं, फंड लेने के लिए कोई कानून भी नहीं तोडा गया है, हमें (भारत में) मानवाधिकारों के लिए खड़े होने की सजा दी गयी है.’ रजत खोसला के मुताबिक ‘एमनेस्टी की मानवाधिकार संबंधी दो प्रमुख रिपोर्टों के कारण उसके बैंक खातों को फ्रिज किया गया है. इनमें से एक रिपोर्ट इस साल हुए दिल्ली दंगों पर थी, जिसमें एमनेस्टी इंडिया ने मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा में पुलिस की मिलीभगत को उजागर किया था. दूसरी रिपोर्ट जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा हटाए जाने के बाद वहां लगाए गए मनमाने प्रतिबंधों पर थी.’

कुछ जानकार कहते हैं कि एमनेस्टी इंटरनेशनल के साथ जो हो रहा है, वह नया नहीं है. इस संस्था का मिजाज़ हमारी ज्यादातर सरकारों को कभी पसंद नहीं आया है क्योंकि वह हमेशा मानवाधिकारों के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करती रही है. यह संगठन भारत में 1984 में हुए दंगों, जम्मू-कश्मीर में होने वाली ज्यादतियों, सशस्त्र बल (विशेष शक्ति) अधिनियम (अफ्स्पा) के दुरुपयोग और अल्पसंख्यकों एवं आदिवासियों से जुड़े मुद्दों को लगातार दुनिया के सामने उठाता रहा है और इसीलिए भारत की तमाम सरकारें इसे दबाने की कोशिश करती रही हैं.

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