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आतंकरोधी कानून/राज्य दर्पण/डरो, डरो, जल्दी डरो

-आउटलुक,

पता नहीं, बुजुर्ग आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी की मौत ने झकझोरा या नहीं, लेकिन अरसे बाद सुप्रीम कोर्ट में राजद्रोह की प्रासंगिकता पर सवाल उठा और कई हाइकोर्टों से यूएपीए, एनएसए जैसे कानूनों के दुरुपयोग पर तीखे फैसले आए तो सुलगते सवाल ज्वाला की तरह फूट पड़े। बेशक, हाल के कुछ वर्षों में असहमति और असंतोष को दबाने की खातिर इन कानूनों के दुरुपयोग के मामले बेहिसाब बढ़े हैं, लेकिन क्या यह किसी खास पार्टी की समस्या है? अलग-अलग राज्यों की पड़ताल में तो कोई साधु नहीं दिखता। इसकी नजीर देखिए:

उत्तर प्रदेश

हाल के वर्षों में बढ़े मामले

सिद्दीक कप्पन 

उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) ने इसी महीने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर दो सदस्यों की समिति बनाई गई है, जो यूएपीए और एनएसए के तहत दर्ज सभी मामलों की समीक्षा करेगी। दरअसल, इसमें घोषणा करने वाली कोई बात नहीं क्योंकि समिति बनाने की बात तो कानून में ही है। बल्कि सवाल तो यह होना चाहिए कि अभी तक सरकार ने समिति क्यों नहीं बनाई। योगी आदित्यनाथ के 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद यूएपीए के तहत दर्ज मामले लगातार बढ़े हैं (देखें बॉक्स)। समिति गठित करने की घोषणा के चंद रोज बाद ही मथुरा के कोर्ट ने पत्रकार सिद्दीक कप्पन और तीन अन्य को जमानत देने से मना कर दिया। उत्तर प्रदेश पुलिस ने पिछले साल अक्टूबर में इन्हें गिरफ्तार किया था।

कप्पन को तब गिरफ्तार किया गया जब वे 19 साल की दलित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार की विस्तृत रिपोर्ट के लिए हाथरस जा रहे थे। इस ‘अपराध’ के लिए कप्पन के खिलाफ आइपीसी की विभिन्न धाराओं के अलावा यूएपीए की धारा 124ए (राजद्रोह) के तहत मामला दर्ज कर लिया गया। वे 7 अक्टूबर से जेल में हैं। बीच में सुप्रीम कोर्ट ने 90 साल की बीमार मां को देखने के लिए उन्हें पांच दिन की अंतरिम जमानत दी थी। कप्पन की मां का 18 जून को केरल के मलप्पुरम में देहांत हो गया और वे अंतिम संस्कार के लिए भी न जा सके।

यूएपीए के आंकड़े उत्तर प्रदेश में

प्रदेश में 2019 में 498 लोगों को यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया। इससे पहले समाजवादी पार्टी की सरकार के आखिरी दो वर्षों में सिर्फ 38 लोग यूएपीए के तहत गिरफ्तार किए गए थे। प्रदेश में राजद्रोह, एनएसए, आपराधिक नियम संशोधन कानून 1932 और सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने से रोकने वाले 1984 के कानून (पीडीपीपीए) का भी धड़ल्ले से इस्तेमाल हुआ है। प्रदेश के एक पूर्व पुलिस महानिदेशक ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया, “सरकार के खिलाफ बोलने वालों पर यूएपीए जैसे कानून के तहत कार्रवाई करना दुर्भाग्य से सामान्य बात हो गई है। समीक्षा समिति अगर वास्तविक साक्ष्यों की जांच करने के बजाय सरकार के रवैये का ही बचाव करेगी तो ऐसी समिति बनाने का भी कोई मतलब नहीं रह जाएगा। यूएपीए के ज्यादातर मामलों में साक्ष्य बेहद कमजोर होते हैं, इसलिए बहुत कम मामलों में सजा हो पाती है।”

पुनीत निकोलस यादव

 

बिहार-झारखंड

भूमि अधिग्रहण का विरोध करने वाले निशाने पर

अरविंद अविनाश

रांची के मानवाधिकार कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी की न्यायिक हिरासत में मौत ने झारखंड में विरोध प्रदर्शन तेज कर दिया है। कई स्वयंसेवी संगठन और राजनीतिक दल यूएपीए के खिलाफ बड़ा आंदोलन शुरू करने के लिए कमर कस रहे हैं। 23 जुलाई को चंद्रशेखर आजाद की जयंती पर पीयूसीएल ने स्टैंड विद स्टेन, फ्रेंड्स एंड फैमिली ऑफ भीमा कोरेगांव, एनएपीएम, पीपुल्स वॉच, सीजेपीसी और झारखंड जनाधिकार सभा जैसे संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया। पीयूसीएल के राज्य सचिव अरविंद अविनाश ने बताया कि 15 से 28 अगस्त तक सोशल मीडिया कैंपेन भी चलाया जाएगा। ये संगठन स्टेन स्वामी की मृत्यु के मुद्दे पर एकजुटता दिखाने के लिए दस राजनीतिक दलों के साथ एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन के लिए एक साझा रणनीति पर भी चर्चा करेंगे।

मानवाधिकार मामलों के विशेषज्ञ अधिवक्ता शैलेश पोद्दार का कहना है कि सरकार के विरोध को अक्सर राजद्रोह बात दिया जाता है। वे कहते हैं, “आप किसी एक शासन को दोष नहीं दे सकते। इसलिए ऐसे मामलों में दोष सिद्ध होने की दर मुश्किल से दो से तीन प्रतिशत है।” एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के अनुसार, दोष सिद्ध करने की दर कम होने के प्रमुख कारण, कानून को लागू करने में ढिलाई, प्रशिक्षित अधिकारियों की कमी, काम की अधिकता और संसाधनों की कमी है।

2016 में स्टेन स्वामी की तैयार एक रिपोर्ट के अनुसार, यूएपीए के 97 फीसदी मामलों में आरोपियों के माओवादी संबंध के आरोप साबित नहीं हो सके। इनमें बड़ी संख्या में आदिवासी थे। रिपोर्ट में इस बात का विवरण दिया गया था कि कैसे पुलिस ने नक्सली होने के आरोप में निर्दोष ग्रामीणों को जेल में डाल दिया। हालांकि वे केवल भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे या कुछ जमीनी स्तर के राजनीतिक कार्यकर्ता थे जो लोगों को भाजपा के खिलाफ वोट करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे।

उदाहरण के लिए, गिरिडीह के 34 साल के सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता जीतन मरांडी को 'कट्टर नक्सल' बताकर जेल भेज दिया गया था। बाद में उनकी पत्नी को भी हटिया स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया। वे हैदराबाद में मानवाधिकार सम्मेलन में भाग लेने जा रही थीं। इसी तरह, पश्चिमी सिंहभूम के दो कृषि श्रमिकों लखन और महादेव को भी इस कानून के तहत जेल में डाल दिया गया। राज्य में ऐसे अनेक उदाहरण हैं।

झारखंड में अब भी बड़ी संख्या में ऐसे मामले ट्रायल की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं। पिछली रघुवर दास सरकार ने खूंटी में 150 से अधिक लोगों के खिलाफ ट्रायल की अनुमति दी थी। हेमंत सोरेन सरकार ने मंजूरी वापस लेने का वादा किया था लेकिन ज्यादातर मामलों में कानूनी प्रक्रिया अभी जारी है। इस साल जून में गिरिडीह के डिप्टी कमिश्नर ने सरकार को अनिल और अजय महतो सहित 11 नक्सलियों के खिलाफ यूएपीए लगाने का प्रस्ताव भेजा था, जिन पर क्रमशः एक करोड़ और 25 लाख रुपये का इनाम था।

बाहुबली विधायक अनंत सिंह 

झारखंड की तरह बिहार में भी यूएपीए के अधिकांश मामले संदिग्ध नक्सलियों के खिलाफ दर्ज किए गए हैं। लेकिन कुछ उल्लेखनीय अपवाद भी हैं। 2019 में बाहुबली विधायक अनंत सिंह के घर से एके-47 और अन्य हथियार जब्त करने के बाद बिहार पुलिस ने उन पर यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया था। उस वक्त वे जदयू के विधायक थे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ मतभेद के चलते अब वे राजद के साथ हैं।

नवीन कुमार मिश्र

 

छत्तीसगढ़

आदिवासियों पर निशाना

पिछले पांच वर्षों में छत्तीसगढ़ पुलिस ने यूएपीए के तहत 21 मामले दर्ज किए

राज्य में सैकड़ों आदिवासियों पर यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई आदिवासी तो कानून से भी अनजान हैं। पिछले पांच वर्षों में छत्तीसगढ़ पुलिस ने यूएपीए के तहत 21 मामले दर्ज किए, जिनमें अधिकांश 2018 में दर्ज किए गए। बुरकापाल में हुए सबसे बड़े माओवादी हमले के बाद यूएपीए के तहत 120 आदिवासियों पर मामला दर्ज किया गया। अप्रैल 2017 के माओवादी हमले के कुछ दिनों बाद 120 आदिवासियों को हिरासत में लिया गया और जेल भेज दिया गया, जहां सुकमा के बुरकापाल में सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन के 25 जवानों पर घात लगाकर हमला किया गया था। हमले के बाद सुकमा से जिन 37 आदिवासियों को हिरासत में लिया गया, उसमें बुरकापाल गांव के सरपंच मुचाकी हांडा का भाई भी शामिल है।

हांडी कहते हैं कि गांव में रहने वाले हर पुरुष को माओवादी के रूप में आरोपी बनाया गया था। हममें से जो लोग शहरों में थे, वे किस्मत वाले थे। मेरे गांव से 37 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिसमें 7 किशोर उम्र के हैं। किशोरों को 18 महीने की जेल के बाद रिहा कर दिया गया जबकि बाकी की किस्मत लटकी हुई है क्योंकि आज तक मुकदमा शुरू नहीं हुआ है। मई 2017 में यूएपीए और अन्य आइपीसी धाराओं के तहत हिरासत में लिए गए 120 आदिवासियों में से 18-25 साल के 50 आदिवासी हैं। इनके परिवारों के लिए यूएपीए का कोई विशेष अर्थ नहीं है। उन्हें बस इतना पता है कि उनके परिजन माओवादियों के नाम पर जेल में हैं।

आंकड़ों में छत्तीसगढ़

राज्य पुलिस के रिकॉर्ड के अनुसार पिछले 6 वर्षों में सबसे अधिक यूएपीए के मामले 2018 में दर्ज किए गए थे।  उस वक्त राज्य में यूएपीए के 10 मामले दर्ज किए गए थे। 2015 से मई 2021 तक राज्य पुलिस ने यूएपीए के कुल 21 मामले दर्ज किए गए हैं। एक्टीविस्ट का दावा है कि छत्तीसगढ़ में सैकड़ों आदिवासियों पर यूएपीए अधिनियम के तहत दर्ज मामाला विवादित है।

बुरकापाल मामले में 60 से ज्यादा आरोपियों की पैरवी कर रहे वकील संजय जायसवाल ने कहा, ‘‘सिर्फ बुरकापाल का ही मामला नहीं है, बस्तर इलाके में ही यूएपीए के तहत 2000 से ज्यादा लोगों के खिलाफ मामला दर्ज है। पुलिस अदालत में आरोप तय नहीं कर पाई है इसलिए मुकदमा लंबित है। इस अधिनियम के तहत हिरासत में लिए गए लोगों के पास वास्तव में कोई विकल्प नहीं है, कोई जमानत नहीं है और सजा की दर बहुत कम है।’’ इसके तहत 2 प्रतिशत से कम लोगों को सजा मिल पाती है।

विष्णुकांत तिवारी

 

पश्चिम बंगाल

तृणमूल भी कम दोषी नहीं

गौर चक्रवर्ती

आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी की न्यायिक हिरासत में हुई मौत के बाद राष्ट्रपति को 10 विपक्षी नेताओं द्वारा लिखे गए पत्र में यूएपीए को 'दमनकारी' कानून बताया गया है। लेकिन गौर चक्रवर्ती, मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब के बाद भारत में दूसरे व्यक्ति हैं, जिन पर यूपीए-1 सरकार ने 2008 में संशोधित यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया था। उनका मानना है कि हस्ताक्षर करने वालों में से तीन नेता, कांग्रेस की सोनिया गांधी, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी और माकपा के सीताराम येचुरी को यह कहने का हक नहीं है क्योंकि उनकी सरकारों ने भी लोगों की आजादियां छीनी हैं।

उनका कहना है कि अगर यह कानून दमनकारी है तो उनकी सरकारों के हाथ क्यों रंगे हैं? यह कानून तो कांग्रेस ने ही बनाया और माकपा ने पहली बार पश्चिम बंगाल में इसका इस्तेमाल किया और टीएमसी ने माकपा के कारनामों को जारी रखा। माकपा और टीएमसी के तहत पुलिस ने 2009 से पश्चिम बंगाल में इस के तहत 100 से अधिक लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है।

चक्रवर्ती की गिरफ्तारी ऐसे समय में हुई थी जब माओवादियों ने दक्षिण बंगाल में पश्चिम मिदनापुर, झाडग़्राम और पुरुलिया जिलों के बड़े क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया था। उस वक्त उन्होंने पुलिस के अत्याचारों के खिलाफ एक जन आंदोलन का नेतृत्व किया था। देबनाथ को भांगर पॉवर ग्रिड प्रोजेक्ट के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से किए जा रहे प्रदर्शन में भाग लेने के लिए गिरफ्तार किया गया था। उन्हें जमानत मिलने से पहले पांच महीने जेल में बिताने पड़े। अभी तक भांगर आंदोलन से जुड़े आठ लोगों के खिलाफ यूएपीए के मामले दर्ज हैं और वे सभी जमानत पर हैं।

ममता बनर्जी सरकार ने वाम मोर्चा सरकार के तरीकों को जारी रखा। 2012 में सरकार ने कोलकाता में झुग्गी-झोपडिय़ों को बेदखल करने के खिलाफ आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाली एक कार्यकर्ता देबलीना चक्रवर्ती के खिलाफ यूएपीए लगा दिया था। अभिषेक मुखर्जी एक अन्य व्यक्ति हैं जिन्हें ममता बनर्जी सरकार ने माओवादी नेता होने का आरोप लगाते हुए यूएपीए की धाराओं के साथ जेल में डाल दिया था। उन्होंने कहा कि बनर्जी और येचुरी उक्त पत्र में "मगरमच्छ के आंसू बहा रहे हैं"। सितंबर 2012 में गिरफ्तार होने के बाद उन्होंने डेढ़ साल जेल में बिताया।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, 2014 और 2017 के बीच पश्चिम बंगाल में यूएपीए के तहत 36 मामले दर्ज किए गए जिनमें 102 गिरफ्तारियां हुईं। हालांकि, इनमें कुछ मामले एनआइए ने भी दर्ज किए थे।

राज्य में 2009-11 के दौरान यूएपीए के तहत बहुत अधिक मामले दर्ज किए गए। तब राज्य में माओवादी आंदोलन चरम पर था। बंगाल के सबसे बड़े मानवाधिकार समूह, एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (एपीडीआर) के उपाध्यक्ष रंजीत सूर के अनुसार, बंगाल की जेलों में अब भी 72 राजनीतिक कैदी हैं, जिन पर भाकपा (माओवादी) से जुड़े होने का आरोप है। उनमें से ज्यादातर पर यूएपीए के तहत धाराएं लगाई गई हैं।

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