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वाराणसी में कोरोना मौतों को लेकर राज्य सरकार और नगर निगम के आंकड़ों में अंतर

-द वायर,

कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के बीच उत्तर प्रदेश प्रशासन पर आरोप लगे हैं कि वे कोरोना वायरस महामारी से होने वाली मौतों का सही आंकड़ा नहीं बता रहे हैं.

शवदाह गृहों, श्मशान घाटों, कब्रिस्तानों पर अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार के लिए लगीं लंबी लाइनें दर्शाती हैं कि सरकारी दावों की तुलना में समस्या और भयावह है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बाद अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी के शवदाह गृहों के आंकड़े इस चिंताजनक स्थिति की तस्दीक करते हैं.

द वायर  ने हरिश्चंद्र घाट, मणिकर्णिका घाट और कब्रिस्तानों के संभावित आंकड़ों के आधार पर एक आकलन किया है, जो ये दर्शाता है कि एक अप्रैल से 15 अप्रैल के बीच हुईं कुल कोरोना मौतों में से करीब 50 फीसदी मौतों को उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने आधिकारिक आंकड़ों में छिपा लिया है.

दूसरे शब्दों में कहे तो जितनी मौतें हो रही हैं, उसमें से राज्य प्रशासन करीब 50 फीसदी मौतों की ही जानकारी दे रहा है.

बीते 13 अप्रैल को प्रशासन ने अपने कोरोना बुलेटिन में बताया कि वाराणसी में तीन मौतें हुई हैं, लेकिन वाराणसी नगर निगम द्वारा तैयार किए गए आंकड़े दर्शाते हैं कि हरिश्चंद्र घाट के विद्युत शवदाह गृह में नौ कोरोना शवों को जलाया गया था.

इसी तरह 12 अप्रैल को प्रशासन ने बताया कि वाराणसी में सिर्फ एक मौत हुई है, जबकि निगम के आंकड़ें दिखाते हैं कि यहां 10 कोरोना शवों को जलाया गया था. सरकार ने कहा था कि 11 अप्रैल को एक मौत हुई, लेकिन आधिकारिक रिकॉर्ड दर्शाते हैं कि इस दिन सात कोरोना संक्रमित शवों को जलाया गया था.

राज्य सरकार ने बीते 10 अप्रैल को शहर में दो मौतें होने का दावा किया, लेकिन शवदाह गृह में सात कोरोना शवों को जलाने का रिकॉर्ड दर्ज है.

खास बात ये है कि ये आंकड़ें सिर्फ विद्युत शवदाह गृह के हैं. यदि शहर के दोनों बड़े घाटों- हरिश्चंद्र और मणिकर्णिका- पर लकड़ी की चिता पर किए जाने वाले अंतिम संस्कार के आंकड़ों को जोड़ा जाता है, तो जाहिर है इसकी संख्या में काफी इजाफा होगा.

नगर निगम के कार्यकारी अधिकारी अजय कुमार राम ने बताया कि उनके कार्यालय में दर्ज रिकॉर्ड दोनों घाटों (मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र) में केवल विद्युत शवदाह से संबंधित हैं. घाट पर जलाऊ लकड़ी और चिता का उपयोग कर जलाए जाने वाले शवों का विवरण इसमें शामिल नहीं है.

कुल मिलाकर देखें तो पिछले एक हफ्ते में वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट पर जितने कोरोना शवों को जलाया गया है, उसमें से 50 फीसदी से भी कम मौतों को आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज किया गया है.

स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, पिछले 30 दिनों में सबसे ज्यादा मामले देश के 46 जिलों से आए हैं. इसमें से वाराणसी एक है.

वाराणसी नगर निगम के कर्मचारी कोरोना संक्रमण से मरने वालों का अंतिम संस्कार हरिश्चंद्र घाट पर इलेक्ट्रिक माध्यम से कर रहे हैं. प्रतीक्षा सूची बहुत लंबी है.

शहर के मणिकर्णिका घाट पर डोम समुदाय के सदस्य पिछले सप्ताह से तकरीबन 150 लोगों के शव का रोजाना अंतिम संस्कार कर रहे हैं. इनमें से सभी की मौत कोविड-19 से होने की बात नहीं कही जा सकती, लेकिन संख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि स्थानीय लोगों को संदेह है कि इनमें से अधिकांश कोविड-19 का शिकार हुए हैं.

घाट के पास रहने वाले पुजारी यशराज द्विवेदी ने कहा, ‘शवों के अंतिम संस्कार के लिए इंतजार कर रहे सैकड़ों लोगों कितने असहाय हैं, इसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता.’

उन्होंने कहा, ‘मणिकर्णिका घाट का हमेशा से विशेष महत्व रहा है, इसलिए यहां अंतिम संस्कार के लिए इंतजार की लाइन रहती थी, लेकिन इस समय अनगिनत लोग अपनों के अंतिम संस्कार के लिए आठ से नौ घंटे तक इंतजार कर रहे हैं.’

वाराणसी के नगर आयुक्त गौरांग राठी ने कहा कि दूसरी लहर के चलते शहर में कोरोना मामलों में करीब तीन गुना की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन अस्पताल में बेड और अंतिम संस्कार की व्यवस्था पर्याप्त है.

उन्होंने द वायर को बताया, ‘कोविड-19 से मरने वालों की बढ़ती संख्या के कारण हरिश्चंद्र घाट की क्षमता चार गुना बढ़ा दी गई है.’

श्मशान स्थल पर पीड़ित परिवारों द्वारा 4-5 घंटे इंतजार करने के संबंध में पूछे जाने पर राठी कहा, ‘हां, लोगों को थोड़ा बहुत लाइन लगाना पड़ रहा है. लोग शव लेकर आते हैं और उनका अंतिम संस्कार हमारे लोग (नगर निगम कर्मचारी) सावधानी बरतते हुए करते हैं. इसका खर्चा भी काफी है, जो कि सामान्य रूप से किए जाने वाले अंतिम संस्कार का 10 फीसदी, करीब 500 रुपये, ही है.’

नगर आयुक्त ने कहा कि श्मशान स्थल के बाहर इसलिए भी भीड़ लगी रहती है क्योंकि यहां पर आस-पास के जिलों जौनपुर, भदोही, चंदौली और बिहार के भी लोग आते हैं.

इसके अलावा यदि कब्रिस्तानों को देखें तो वाराणसी में दो बड़े कब्रगाह- अल्ताफ शाह और भोले शाह बाबा- हैं और इसके साथ ही 100 अन्य छोटे कब्रिस्तान भी हैं.

यहां से जुड़े एक सामाजिक कार्यकर्ता जलालुद्दीन अंसारी ने द वायर  को बताया कि पिछले कुछ दिनों में शवों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है. उन्होंने कहा कि कोविड-19 की दूसरी लहर के बाद से कम से कम 10 अतिरिक्त शव आते हैं.

चूंकि ये कब्रिस्तान नगर निगम के दायरे में नहीं आते हैं, इसलिए मौतों का स्पष्ट आंकड़ा बताना मुश्किल है.

उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष जफर फारूकी ने कहा कि मौतों का आंकड़ा बताने का कोई केंद्रीयकृत सिस्टम नहीं है, लेकिन मोटे तौर पर ये कहा जा सकता है प्रतिदिन 5-6 कोरोना शवों को दफनाया जाता है.

उन्होंने कहा, ‘पहले मार्च में प्रतिदिन 1-2 ऐसे शवों को दफनाया जाता था, जो कि अब बढ़कर 5-6 हो गए हैं.’

मालूम हो कि उत्तर प्रदेश में कोरोना की स्थिति हाथ से निकलती हुई दिखाई दे रही है. यहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और कई वरिष्ठ अधिकारी कोरोना पॉजिटिव आए हैं. अप्रैल महीने के पहले 14 दिनों में कोरोना मामले सात गुना की रफ्तार से बढ़े हैं, वहीं 13 से 14 अप्रैल के बीच ये 31 फीसदी की तेजी से बढ़े हैं.

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