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चीन के सम्पूर्ण बहिष्कार का नारा देने वाले चीन न बन पाने के दुःख से क्यों भरे हुए हैं?

-सत्यहिंदी,

आज जो चीन के सम्पूर्ण बहिष्कार का नारा दे रहे हैं, वे कल तक अफ़सोस कर रहे थे कि चीन ने विकास की जो ऊँचाइयाँ हासिल कर ली हैं, हम उनके क़रीब भी क्यों नहीं पहुँच पाए हैं। कल तक ही क्यों वे आज भी चीन न बन पाने के दुःख से भरे हुए हैं। भारत सरकार की आलोचना करनेवाले हमवतन लोगों को ही वे धमकी देते हैं कि काश कि यह देश चीन होता तो फिर इन आलोचकों को आटे-दाल का भाव मालूम हो जाता। इन लोगों में चीन न हो पाने की कलक पिछले कुछ वर्षों में व्यक्त होती रही है।

भारत के राष्ट्रवादियों के मन में एक चीन-ग्रंथि है। यह दोतरफ़ा काम करती है। चीन के प्रति आदर और चीन से घृणा, दोनों ही इस स्वभाव में शामिल हैं। घृणा अब दिखलाई पड़ रही है जीवन के हर क्षेत्र में चीन के बहिष्कार के आह्वान में। चीन भारत के ‘चिर शत्रु’ पाकिस्तान का संरक्षक रहा है, वह हमारी सीमाओं को नहीं मानता है, ये कुछ ऐसी बातें हैं जो चीन के प्रति मन में दुराव पैदा करती हैं। इसके बावजूद चीन के साथ हम उसी तरह पेश नहीं आ सकते जैसे पाकिस्तान के साथ, यह बोध हमारे चीन विरोधी राष्ट्रवाद को यथार्थवादी होने को बाध्य करता है। कमज़ोर आँख दिखलाए तो उसे औक़ात बता देनी चाहिए लेकिन मज़बूत पीट दे तो बुद्धि से काम लेना चाहिए। तुरत जवाब देने से लेने के देने पड़ सकते हैं।

 दोनों ही स्थितियों में वीरता नामक भाव की कोई जगह नहीं है। या वह कभी थी ही नहीं। यानी पाकिस्तान के साथ पिछले दिनों जो हुआ उसमें भी मान लिया गया कि भारत ने वीरता दिखला दी है। पूरी दुनिया ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के भारत सरकार के दावों पर शक करती रही लेकिन सरकार अपना वीराख्यान सुनाती रही। जनता को राष्ट्रवाद के नाम पर उस गल्प को मान लेने पर मजबूर किया गया। लेकिन उस पूरे प्रकरण में जो रणनीतिक चूक हुई, उसे भी इस राष्ट्रवाद ने नज़रअंदाज़ कर दिया। पाकिस्तान ने भारत की वायु सीमा में घुसकर भारत के लड़ाकू विमानों पर हमला किया और एक को मार गिराया, एक पायलट को पकड़ लिया, इस तथ्य को इस राष्ट्रवाद ने विचारणीय ही नहीं माना। इसलिए इसे रणनीतिक या अवसरवादी राष्ट्रवाद कहा जा सकता है जिसका मूल तत्त्व चतुराई और कायरता है। यह वही चतुर कायरता है जो यह क़बूल नहीं कर रही कि चीन  उस इलाक़े में घुसकर बैठ गया है जिसे कल तक भारत अपना मानता रहा था। इस राष्ट्रवाद के मुख्य प्रवक्ता के मुँह से इस पूरे प्रकरण में एक बार चीन शब्द न सुनकर भी इसके अनुयायी अपने नेता पर न्योछावर हैं कि वह कितना चतुर सुजान है।

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