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आम बजट 2022-23:स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) पर फिर से ध्यान देना जरूरी क्यों?

-डाउन टू अर्थ, 

क्या हमारा ध्यान प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) से हट रहा है। इसका जवाब जो भी हो, तथ्य यह है कि अगर हम ऐसा कर रहे हैं, तो हम इसकी भरपाई नहीं कर सकते।

अक्टूबर 2019 में ग्रामीण भारत को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया गया था। इस घोषणा से केंद्र सरकार के जल-शक्ति मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले पेयजल और स्वच्छता विभाग का आशय यह था कि गांव के हर परिवार की शौचालय तक पहुंच हो गई है।

स्वच्छ भारत मिशन के ताजा आंकड़े के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों में 16 करोड़ परिवारों के लिए शौचाालय तैयार किए गए हैं। सरकार, एक परिवार में सदस्यों की संख्या पांच मानती है, इस हिसाब से लगभग 84 करोड़ लोग इन शौचाालयों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

तैयार किए गए ये शौचाालय तकनीकी तौर पर इस तरह से बने होने चाहिए कि वे मल का उसी जगह पर निस्तारण करने में सक्षम हों। ग्रामीण भारत में स्वच्छता की स्थिति की थर्ड पार्टी ऑडिट रिपोर्ट, नेशनल एन्युल रूरल सैनिटेशन (नार्स) 2018-19 के सर्वेक्षण के मुताबिक, लगभग 34 फीसद शौचालयों में सोकवे पिट्स वाले सेप्टिक टैंक हैं, जिनमें मल के पानी में घुलने के बाद उसके उचित निस्तारण की व्यवस्था होती है। तीस फीसदी शौचाालय ट्विन लीच पिट वाले हैं, जिनमें शौचाालय में मल के निस्तारण के लिए आसपास दो गड्ढे तैयार किए जाते हैं।

सर्वेक्षण में पाया गया कि इनके अलावा बाकी बचे शौचालय सिंगल-लीच पिट्स वाले हैं, जिनमें  बंद नालियां और बंद गड्ढों वाला सीवर सिस्टम है, इन्हें भी सरकार ने ‘सुरक्षित शौचालय’ माना है। इन्हीें के आधार पर नार्स के 2019-20 सर्वेक्षण के मुताबिक, राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 99.9 फीसद परिवार मल का सुरक्षित और स्वच्छ तरीके से निस्तारण करते हैं।

सवाल यह है कि सिंगल-लीच पिट्स शौचालय ऐसे हैं कि उनमें सुरक्षित और स्वच्छ तरीके से मल-निस्तारण किया जा सकता है ? पेयजल और स्वच्छता विभाग की ताजा नियमावली में इस बारे में कहा गया है कि मल के उसी जगह पर उचित निस्तारण के लिए सिंगल-लीच पिट्स शौचालय को मधुमक्खी के छत्ते वाली संरचना जैसे ड्यूल-लीच पिट वाले शौचालयों में बदलने की जरूरत है।

दिल्ली स्थित गैरलाभकारी संगठन, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के शोधकर्ताओं ने देश के कुछ चुने हुए राज्यों में इससे जुड़ी अच्छी और ‘उतनी अच्छी नहीं ’ दोनों तरह की स्थितियां देखीं।

कुछ राज्यों ने मल को सुरक्षित रूप से परिष्कृत किया और केवल परिष्कृत मल को नालियों और जलाशयों में निकाला, यही नहीं वहां इसका पुनः उपयोग भी किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर, शोधकर्ताओं ने पाया कि कुछ राज्यों के गांवों में बिना उचित परिष्करण के जलाशयों और खुले स्थानों में बड़ी मात्रा में मल फेंका गया है।

कई राज्य ऐसे भी हैं, जहां शौचालयों को सही तरीके से डिजाइन करके तैयार नहीं किया गया।

पिछले बजट 2021-22 में गांवों में मल के निस्तारण के प्रबंधन के लिए अलग से कोई फंड नहीं दिया गया था। हालांकि बाद में अगस्त 2021 में स्थानीय ग्रामीण इकाईयों को इस काम के लिए 1.4 लाख करोड़ रुपये संयुक्त फंड के तौर पर दिए गए थे। इसमें से 71.042 करोड़ रुपये 2025-26 तक गांवों में मल-कीचड़ प्रबंधन सहित स्वच्छता कार्य के लिए निर्धारित किए गए थे। केंद्रीय वित्त मंत्रालय के मुताबिक, स्वच्छता प्रोजेक्ट के तहत यह राशि केवल स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत ही खर्च की जा सकेगी।

मल-कीचड़ के उपचार के लिए बुनियादी ढांचे के निर्माण के समानांतर जिले के अधिकारियों को नीचे दिए गए बिंदुओं पर काम करने की भी जरूरत है -
1. खराब शौचालयों की मरम्मत करना
2. पीने के पानी के स्रोतों की रक्षा के लिए मल-कीचड़ प्रौद्योगिकियों का सुरक्षित निपटान करना
3. गुणवत्ता और सुरक्षा के विश्लेषण के लिए मधुमक्खी के छत्ते के आकार वाले शौचालयों से मल-कीचड़ का परीक्षण करना और इस तरह पीने के पानी की सुरक्षा में मदद करना
4. मल-कीचड़ के सुरक्षित संचालन और परिष्कृत मल-कीचड़ के सुरक्षित पुनः उपयोग के बारे में जागरुकता फैलाना

सुरक्षित और टिकाऊ पेयजल-स्रोत के लिए धरती पर मौजूद जल और भूजल को साफ करने के लिए मल-कीचड़ का सुरक्षित प्रबंधन महत्वपूर्ण है। अगर यह मानें कि एक व्यक्ति प्रतिदिन 128 ग्राम मल-पदार्थ का निस्तारण करता है, जैसा कि 2015 में पबमेड वेबसाइट के एक पेपर में बताया गया था, तो हर दिन लगभग 1,20000 मल-पदार्थ का निस्तारण किया जाता है। यह आंकड़ा स्वच्छता विभाग द्वारा तैयार किए गए ग्रामीण परिवारों के लिए तैयार शौचालयों के हिसाब से है।

हमें ऐसी प्रणाली तैयार करने की जरूरत है जिसमें, या तो मल का शौचालय के अंदर ही बेहतर परिष्करण हो जाए अथवा बाहर खुले स्थानों या जलाशयों में मिलने से पहले इसका उचित निस्तारण कर दिया जाए।

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