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‘डॉक्टर बनना है’, छत्तीसगढ़ में बांस के बने ‘पोर्टाकेबिन’ स्कूल आदिवासी बच्चों के सपनों को कर रहे पूरा

दिप्रिंट, 19 जनवरी

रविवार का दिन है. दोपहर में सूरज की चमक नीचे तक आ रही है और बांस से बने पोर्टाकेबिन वाली कक्षा में बच्चों के फुटबॉल खेलने की आवाजें सुनाई दे रही है. मगर, इन सब के बीच चौदह वर्षीय रिंकू कुमार बाहर से आती किलकारियों और हंसी से बेखबर अपनी बायोलॉजी की पाठ्यपुस्तक को पूरी तल्लीनता के साथ देखते हुए बैठा है, उसके सामने खुले पन्नों पर मानव हृदय का आरेख (डायग्राम) बना हुआ है.


रिंकू छत्तीसगढ़ के बस्तर के कोंगेरा गांव में रहता है, जो एक ऐसी जगह है जहां स्वास्थ्य सेवा की सुविधाएं न के बराबर है. उसका कहना है कि वह ‘एक हरफनमौला डॉक्टर बनना चाहता है, जो सबके लिए सुलभ हो, मानव शरीर को अच्छी तरह से जानता हो, और किसी को भी ठीक कर सकता हो.’
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