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कम ही लोग जानते हैं कि चे गेवारा भारत आए थे और न के बराबर यह कि वे यहां क्या करने आए थे

-सत्याग्रह,

वे छह महीने पहले क्यूबा में हुई सशस्त्र क्रांति के बड़े नायक थे. सरकार के गठन के बाद राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने उन्हें तीसरी दुनिया के देशों से संबंध कायम करने का जिम्मा सौंपा. क्यूबा की क्रांति के दूत बनकर चे ने कई देशों की यात्रा की. भारत सरकार से उन्हें खास बुलावा था, जिसने फिदेल कास्त्रो की सरकार को फौरन मान्यता दी थी. मिस्र होते हुए चे गेवारा भारत आए. 30 जून, 1959 की शाम को हवाई अड्डे पर विदेश मंत्रालय के प्रोटोकॉल अधिकारी डीएस खोसला ने उनकी अगवानी की. क्यूबा के उस प्रतिनिधिमंडल में पांच लोग थे. चे की सुनहरे तारे वाली बगैर छज्जे की टोपी, लंबा सिगार और ऊंचे फीतों वाले जूते उन्हें बाकी लोगों से अलग करते थे.

प्रतिनिधिमंडल को चाणक्यपुरी में नए बने अशोक होटल में ठहराया गया. अगले ही रोज चे गेवारा और उनके सहयोगी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिले. उनके साथ भोजन किया. उसके बाद ओखला औद्योगिक क्षेत्र में लकड़ी को आकार देने वाली मशीनों का कारखाना देखा. शाम को वे वाणिज्य मंत्री नित्यानंद कानूनगो से मिले. भारत और क्यूबा के भावी व्यापारिक रिश्तों के लिहाज से यह महत्त्वपूर्ण बैठक थी, जिसमें दोनों देशों के बीच आयात-निर्यात पर चर्चा हुई. अगले रोज क्यूबा से आया यह प्रतिनिधिमंडल योजना आयोग गया. वे लोग कृषि अनुसंधान परिषद भी गए, जहां उन्होंने गेहूं की एक उन्नत किस्म का जायजा लिया.

तीन जुलाई को चे ने दिल्ली के पास पिलाना गांव में सामुदायिक (सहकारी) परियोजना के कुछ कार्यक्रम देखे. खेत और एक स्कूल देखा. लौटकर दल सामुदायिक विकास और सहकारिता मंत्री एसके डे से मिला. चार जुलाई को खाद्य व कृषि मंत्री एपी जैन से उनकी भेंट हुई. फिर वाणिज्य और उद्योग मंत्रालयों के अधिकारियों से, जिन्होंने उन्हें भारतीय चाय और कॉफी भेंट दी. यह सब जानकारी फोटो प्रभाग के निदेशक देवतोष सेनगुप्त से तस्वीरों के साथ मिली. लेकिन काफी खोजबीन के बाद. क्योंकि हम लोग वहां चे गेवारा का नाम ढूंढ़ रहे थे. जबकि वहां चे चे नहीं थे. फाइलों में उनका नाम अर्नेस्ट गेवारा दर्ज था!

इस दौरान चे - जैसा कि उन्होंने खुद लिखा है - रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन और सैन्य अधिकारियों से भी मिले. पांच या छह जुलाई को दल कोलकाता (तब कलकत्ता) के लिए रवाना हो गया. हवाना के दस्तावेजों में आठ जुलाई को लखनऊ का कोई चीनी अनुसंधान केंद्र देखने का भी जिक्र है. इसकी पुष्ट जानकारी नहीं मिल सकी.

भारत से चे शायद बर्मा गए और फिर आगे वियतनाम. उनके पत्रों में बीत्रिज नामक किसी रिश्तेदार को रंगून से लिखा एक पत्र है जिस पर 13 जुलाई, 1959 की तारीख पड़ी है. फिर भी चे की भारत यात्रा का विस्तृत ब्योरा हमारे यहां उपलब्ध नहीं है. भारत से लौटने के बाद वे क्यूबा के राष्ट्रीय बैंक के अध्यक्ष और फिर उद्योग मंत्री - व्यवहार में वित्त मंत्री - बने. भारत का उनका दौरा लंबा था. छह-सात दिन वे दिल्ली में रहे. बाद में दूसरे शहरों में गए. पर देश में छपी सामग्री में कहीं उस दौरे का ब्योरा नहीं मिलता. थोड़ी ही जानकारी मुझे मिली. पर चे के विचार-दर्शन में विश्वास करने वालों को यह काम गंभीरता से करना चाहिए.

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