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इस कठिन समय में चरवाहों पर ध्यान देने की फुर्सत किसी को नहीं, तो क्या वे इतने ही गैर जरूरी हैं?

शाम होने को है. आसमान में बादलों ने अपना घेरा डाल लिया है. तितलियां उड़-उड़कर यह बतला रही हैं कि जुगनू का पट ओढ़े आएगी रात अभी. धीमे-धीमे हवा अपना ताना बुन रही है. बटेर झाड़ियों में छिप रहे हैं.

मध्य प्रदेश राज्य के रतलाम ज़िले की झालरा तहसील का मामनखेड़ा गांव. यहां से करीब चार किलोमीटर दूर जंगल मे भेड़-बकरियों का बड़ा रेवड़ बैठा है. करीब 2000 से ज्यादा भेड़-बकरियां होंगी. साथ मे कुछ गधे भी हैं.

भेड़-बकरियों के गले मे बंधी घंटियां उनके वहां होने का अहसास करवा रही हैं. कुछ छोटे मेमनों के मिमियाने की आवाज भी.

रेवड़ के बाईं तरफ एक बुजर्ग सर पर मोटी पगड़ी, कमर पर ढीली-ढाली सी धोती, ऊपर बग्तरी, पैरों में जूतियां, हाथ में मोटा कड़ा पहने एक गीत गुनगुना रहा हैं:

‘बिंजारी भई ए, आछी-आछी बोल तू तो

प्यारी-प्यारी बोल, मीठी-मीठी बोल

बांता थारी रह ज्यासी’

टोले के नजदीक कुछ महिला और पुरुष भेड़-बकरियों का दूध दुह रहे हैं. कुछ जानवरों के छोटे जन्मे बच्चों को दूध पिला रहे हैं. किसी के हाथ में लोटा तो किसी के पास गिलास है. सभी का पहनावा लगभग एक जैसा है.

बुजर्ग का नाम पूनाराम हैं. उम्र करीब 65 वर्ष होगी. वे ‘देवासी’ घुमन्तू समाज से आते हैं. इन्हें राजस्थान में रायका ओर गुजरात में रैबारी बोला जाता है. इनका मूल काम ऊंटपालन रहा हैं लेकिन अब भेड़-बकरी पालन भी करते हैं.

पूनाराम पिछले 50 वर्षों से भेड़-बकरी के रेवड़ में काम कर रहे हैं. वे पिछले 10 वर्षों से टोले के पटेल हैं. पटेल मतलब पूरे रेवड़ का सरदार. उसकी बहुत बड़ी ज़िमेदारी होती है. पूरा रेवड़ उसकी सूझ-बूझ ओर अनुभव का सहारा लेता है. पटेल ही गांव के बड़े-बुजर्गों से उनके खेतों में अपने रेवड़ को लाने की अनुमति लेता है. रेवड़ की दिशा उसका रास्ता तय करता है. उसे कहां रोकना, बिठाना है यह भी वही तय करता है. उसके लिए पानी-चरागाह की तलाश करता है. रेवड़ की भेड़-बकरियों का इलाज भी वही करता-करवाता है.

पूनाराम देवासी राजस्थान के सिरोही ज़िले की शिवगंज तहसील के रहने वाले हैं. उनके रेवड़ में 1500 भेड़-बकरी ओर 12 गधे हैं. इनको संभालने के लिए उनके साथ चार महिलाएं और सात पुरुष और हैं. इनमें से ज्यादातर उनके परिवार के लोग ही हैं. टोले में मौजूद सारी भेड़-बकरियां ओर गधे सिर्फ पूनाराम के नहीं हैं. वे प्रकाश रायका, जीवा राम, खेमा राम व अन्य कई चरवाहा परिवारों की साझा जमा-पूंजी हैं.

पूनाराम वर्ष के आठ महीने अपने ज़िले से बहुत दूर भेड़-बकरियों को चराते हुए अपना समय गुजारते हैं. वर्ष के अंतिम चार महीने अपने गृह ज़िले सिरोही व उसके नजदीकी क्षेत्रों - पाली, जालौर आदि - में रहते है. वे ये काम सदियों से करते आ रहे हैं. वे हर वर्ष नवम्बर-दिसम्बर से ही सिरोही से पानी और चरागाह की तलाश में निकल लेते हैं. अपने रेवड़ को लेकर बस्ती-बस्ती, पहाड़, नदी-नालों और जंगलों को पार करते हुए मध्य प्रदेश में उज्जैन तक जाते हैं. अगस्त के अंत तक पूनाराम का कारवां वापस सिरोही लौटता है. तब तक रेगिस्तान में बारिश हो जाती है ओर पूनाराम को अपने रेवड़ के लिए पानी और घास प्रयाप्त मात्रा में मिल जाते हैं.

लेकिन कोरोना वायरस के चलते इस वक्त वे बड़ी मुसीबत में हैं. ऐसा पहली बार नहीं है कि उनके टोले को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. पूनाराम बताते हैं कि उनकी हर बार की यात्रा में कम से कम 4-5 भेड़-बकरियों को तो हिंसक पशु ही उठाकर ले जाते हैं. पहले ऐसी घटनाएं ज्यादा भी हो जाती थीं लेकिन अब जंगल कटने से ऐसा कम होता है. कई बार उनके झुंड में बीमारी फैल जाती है और अगर जल्दी उसका इलाज नहीं हुआ तो वह पूरे रेवड़ को खत्म कर सकती है. इसके चलते उन्हें ओलों ओर बारिश का बहुत ध्यान रखना पड़ता है. यदि बारिश में भेड़ें भीग गईं तो उनके बीमार पड़ने का खतरा बहुत ज्यादा होता है.

‘रास्ते में पड़ने वाले किसी खेत-खलिहान में यदि फसल है और गलती से हमारी भेड़-बकरी उसमें चली गई तो खेत के किसान हमें बहुत गालियां देते हैं, कई मार भी देते हैं लेकिन वे सब हमारे हमारे अन्नदाता है. हम ये सब अनुभव करके ही चलते हैं’ पूनाराम कहते हैं, ‘अभी हमारा रेवड़ सिरोही से निकलकर, बीजापुर-गोरिया-गोविंदा-उदयपुर-डाबार-मंगलवास-सोराया-बड़ी सादड़ी-छोटी सादड़ी-धमोत्तर-प्रतापगढ़-हड़ौत-बांसमठ-ढूंढाल होते हुए यहां आया है. हमारी इस अढ़ाई महीने की यात्रा में आप ये कहीं नहीं पायेंगे कि हमने किसी भी किसान की फसल को नुकसान पहुंचाया हो. या किसी गांव में बिना पूछे घुसे हों. किसी से झगड़ा किया हो. किसी को पलटकर जवाब दिया हो. कोई चोरी की हो. हम गरीब जरूर हैं लेकिन अपना जीवन ईमानदारी से जीते हैं.’

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