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लॉकडाउन: बंगाल के बंद जूट मिलों के मज़दूरों ने कहा, हालत ख़राब है, राशन-पानी ख़त्म हो रहा है

-द वायर,

‘लॉकडाउन के कारण जूट मिल (चटकल) बंद होने से बहुत-बहुत मुश्किल में हैं… क्या बताएं आपको… अगले 10-15 दिन में हम लोग भुखमरी के कगार पर जाने वाले हैं.’ 45 साल के कृष्णा दास जब फोन पर ये बातें कहते हैं, तो वह बार-बार ‘बहुत’ शब्द पर जोर देकर लॉकडाउन के दौरान सामने आईं कठिनाइयों की भयावहता को महसूस कराना चाहते हैं.

कृष्णा दास पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के नैहट्टी में रहकर यहां के जूट मिल में काम करते हैं. वह अपने कुनबे में तीसरी पीढ़ी के हैं, जो नैहट्टी जूट मिल में काम करते हैं. एक समय उनके दादा-दादी यहां काम किया करते थे. फिर उनके पिताजी ने इस मिल में काम करना शुरू किया और 17 साल की उम्र में उन्होंने जूट मिल का लूम पकड़ा.

कृष्णा दास मूल रूप से बिहार के वैशाली के रहने वाले हैं, लेकिन उनके पिता नैहट्टी जूट मिल में काम करते थे, तो उनका बचपन नैहट्टी में ही गुजरा. जूट मिल में काम करते हुए उन्हें 28 साल हो चुके हैं.

वह बताते हैं, ‘जूट मिलें बंद तो पहले भी होती थीं, लेकिन तब हमें पता होता था कि जूट मिल बंद होने वाली है. हम इसके लिए तैयार रहते थे. फिर ऐसा भी होता था कि जूट मिल बंद हो जाती, तो कुछ दिन के लिए हम लोग दूसरी मिल में या कोई दूसरा काम कर लेते थे.’ कृष्णा आगे कहते हैं, ‘यह लॉकडाउन अचानक हो गया. हमें जरा भी अंदाजा नहीं था. लॉकडाउन है, तो दूसरे काम भी बंद हैं. हालत बहुत खराब है. जो राशन-पानी था, खत्म हो रहा है.’

पश्चिम बंगाल में जूट उद्योग की शुरुआत 17वीं शताब्दी में हुई थी. वर्ष 1850 के बाद इस उद्योग का व्यापक विस्तार हुआ. बंगाल से जूट का निर्यात यूरोप तक होने लगा था. हालांकि तब सिर्फ कच्चे जूट का निर्यात हुआ करता था और ये काम ईस्ट इंडिया कंपनी ही किया करती थी.

बाद में भारत में ही जूट मिलें खुलने लगीं. चूंकि बंगाल में जूट की खेती सबसे ज्यादा होती थी और हुगली नदी के किनारे कोलकाता बसा है, तो जूट से तैयार माल जलमार्ग से विदेशों में भेजना आसान था, तो जूट के कारोबारियों के लिए कोलकाता के आसपास जूट मिल स्थापित करना मुफीद लगा.

इन जूट मिलों में ही कई सारे पावरलूम लगे होते हैं.

देश की पहली जूट मिल कोलकाता से 25 किलोमीटर दूर हुगली ज़िले के रिसड़ा में जार्ज ऑकलैंड ने खोली और उसी के नाम पर इस जूट मिल को ऑकलैंड जूट मिल कहा जाने लगा. इसके बाद हुगली नदी के किनारे एक के बाद जूट मिलें खुलने लगीं. वर्ष 1939 तक बंगाल में 68,377 पावर लूम चलते थे.

उस दौर में जूट मिलों में काम करना शान की बात होती थी. 70 के दशक तक जूट उद्योग खूब फूला-फला, लेकिन इसके बाद इस उद्योग के दुर्दिन शुरू हो गए. जूट मिलों में लॉक आउट और कार्यस्थगन की नोटिस बहुत आम बात हो गयी थी. कई जूट मिलें बंद स्थायी तौर पर बंद कर दी गईं तो कुछ में एक नियमित अंतराल पर तालाबंदी होने लगी. पिछले 22 सालों में 14 जूट मिलें बंद हो चुकी हैं.

पश्चिम बंगाल इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में फिलहाल 59 जूट मिलें हैं, जिनमें 39,733 पालरलूम लगे हैं. फिलहाल, इनमें से 54 जूट मिलें चल रही हैं, जिन पर ढाई लाख परिवार निर्भर है.

जूट मिलों में आए दिन तालाबंदी से ये मजदूर वैसे ही परेशान थे, मगर फिर भी किसी तरह जी रहे थे, लेकिन कोरोना वायरस की वजह से अचानक हुए लॉकडाउन के कारण जूट मिलों की मशीनें जब खामोश हो गई हैं तो मजदूरों के सामने दाना-पानी का संकट पहाड़ की तरह खड़ा हो गया है. किसी तरह कर्ज लेकर वे अभी गुजारा कर रहे हैं, लेकिन कब तक कर पाएंगे, उन्हें खुद पता नहीं है.

कृष्णा दास अब तक 8000 रुपये कर्ज ले चुके हैं.

उन्होंने कहा, ‘कुछ दिन पहले 8000 रुपये कर्ज लिया था. वो पैसा खत्म हो चुका है. पिछले दिनों हम लोगों ने आंदोलन किया तो मिल प्रबंधन ने 22 अप्रैल को 4000 रुपये एडवांस दिया था. मेरा पांच लोगों का परिवार है. खर्च ज्यादा होता है. एडवांस में मिला पैसा भी खत्म हो गया है.’ बिहार में हाजीपुर के रहने वाले 40 वर्षीय विनोद सिंह साल 2003 से ही नैहट्टी जूट मिल में काम कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, ‘मेरे पिताजी जूट मिल में काम करते थे तो मैं भी इसी में काम करने लगा. मैंने कभी सोचा नहीं था कि ऐसा दिन कभी आएगा.’

विनोद सिंह के घर का चूल्हा भी कर्ज के पैसे से जल रहा है. वह कहते हैं, ‘हालत बहुत खराब है. इधर-उधर से कर्ज लेकर घर चला रहे हैं, लेकिन अब लोगों ने कर्ज देना भी बंद कर दिया है. मिल बंद है, इसलिए दिनभर घर में बैठा रहता हूं.’

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