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कोविड-19 लॉकडाउन: 28 फीसदी प्रवासी मजदूरों को कमरे के किराये के लिए किया गया परेशान

-डाउन टू अर्थ,

कोविड-19 को लेकर मार्च से शुरू हुए लॉकडाउन से प्रवासी मजदूरों को सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ी। खासकर वे मजदूर-कामगार ज्यादा परेशान हुए, जो गृह राज्य छोड़कर राजधानी दिल्ली में नौकरी कर रहे थे। अव्वल तो उनका काम-धंधा बंद हो गया था, तो रोजी-रोटी का संकट आया और उस पर मकान मालिकों के अड़ियल रवैये ने जख्म पर नमक का काम किया। 

हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क (एचएलआरएन) की तरफ से दिल्ली में काम करने वाले अलग-अलग राज्यों के करीब साढ़े तीन सौ लोगों को लेकर किए गए सर्वेक्षण में 16% लोगों ने बताया कि दिल्ली में वे जिस किराये के कमरे में रहते थे, उसके मालिक ने किराये के लिए बहुत परेशान किया। वहीं, 12% प्रवासी मजदूरों को किराया नहीं देने के कारण मकान मालिकों ने कमरे से निकाल दिया, जिस कारण उन्हें दिल्ली छोड़ना पड़ा।

ऐसा तब किया गया, जब सरकार ने मकान मालिकों से किरायेदारों को परेशान नहीं करने की अपील करते हुए रूम किराया वसूली को स्थगित करने को कहा था। 

एचएलआरएन ने ये सर्वे दो चरणों में अगस्त और सितंबर में किया था। अगस्त में हुए सर्वे में 248 और सितंबर में हुए सर्वे में 105 प्रवासी मजदूर शामिल थे। सभी मजदूर राजधानी दिल्ली में काम करते थे, लेकिन वे मूल रूप से मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड व अन्य राज्यों के रहने वाले थे। सर्वे में जितने लोगों को शामिल किया गया था, उनमें से 56 % कामगार बिहार के थे और उत्तर प्रदेश के 27% कामगार थे।

“इन सर्च ऑफ होम: ए स्टडी ऑन माइग्रेंट वर्कर्स एक्सेस टू हाउसिंग एंड लैंड” नाम से जारी हुई एचएलआरएन की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे में शामिल लोगों में 86% किराये के मकान में रहते थे। इनमें से 66 फीसदी लोगों ने बताया कि रोटी-रोटी के संकट के कारण उन्हें दिल्ली छोड़कर अपने गांव लौटना पड़ा। 

गांवों में भी रोजी-रोटी का संकट बरकरार

राजधानी छोड़कर अपने गृह राज्य लौटे प्रवासी मजदूरों को उम्मीद थी कि गांवों में कोई काम कर वे अपनी आजीविका चला लेंगे। लेकिन, उन्हें गांवों में भी उसी संकट से दो-चार होना पड़ा, जिसके चलते वे तमाम दिक्कतें झेलकर लौटे थे।

एचएलआरएन के सर्वे में शामिल प्रवासी मजदूरों में से 86.7 फीसदी ने कहा कि गांवों में काम/आजीविका की कमी है। इनमें से 58.5% लोगों ने कहा कि उनके पास कोई काम नहीं है जबकि 20.6% लोगों ने बताया कि वे शारीरिक श्रम कर रहे हैं। सिर्फ 6.9 फीसद लोगों ने बताया कि वे रोजी-रोटी के लिए अपने खेत में खेती कर रहे हैं। हालांकि दिल्ली में भी ये लोग कोई अच्छा काम नहीं कर रहे थे। सर्वे में बताया गया है कि 41.5% लोग दैनिक मजदूर थे, जबकि 17.7% लोग ठेका मजदूर के रूप में काम कर रहे थे। 

सर्वे रिपोर्ट से ये भी पता चलता है कि जिन लोगों को दिल्ली पलायन करना पड़ा, उनमें से एक बड़ी आबादी के पास खेती-बारी के लायक जमीन नहीं है। करीब 54% प्रवासी मजदूरों ने बताया कि जीवनयापन के लिए उनके पास गांव में पर्याप्त जमीन नहीं है। 

महज 1.2% लोगों को मिला मनरेगा के तहत काम

सितंबर में लोकसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, लॉकडाउन के कारण अलग-अलग राज्यों से 1.04 करोड़ प्रवासी मजदूर अपने गृह राज्य लौटे थे। हालांकि अनधिकृत आंकड़े इससे काफी ज्यादा हैं क्योंकि बसों, यातायात के दूसरे साधनों और पैदल आने वाले प्रवासी मजदूर इसमें शामिल नहीं हैं।

 महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) इनके लिए एक बड़ी राहत हो सकती थी। सरकार ने भी इन कामगारों को मनरेगा के तहत काम देने की पहलकदमी की थी। जून में केंद्र सरकार की तरफ से शुरू किए गए गरीब कल्याण रोजगार अभियान में मनरेगा को भी शामिल किया गया था। इसके तहत 4 महीने तक प्रवासी मजदूरों को काम दिया जाना था। अभियान के लिए केंद्र सरकार ने 50,000 करोड़ रुपए आवंटित किये थे।

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