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कोविड: तीन राज्यों में आधिकारिक आंकड़े से 3.5 लाख ज़्यादा मौतें, मुआवज़ा पाना टेढ़ी खीर

-द वायर,

पिछले साल, जिस समय नोवेल कोरोना वायरस ने मूल से कहीं ज्यादा घातक रूप अख्तियार कर लिया था- जिसने भारत में कोविड-19 की दूसरी प्रचंड लहर को जन्म दिया- उसी समय श्रवण सिंह खुद को सुरक्षित रखने के लिए अपने घर आ गए.

सिंह को लगा कि तमिलनाडु की तुलना में, जहां वे काम करते थे, राजस्थान के सीकर में उनके कोरोना से बचने की संभावना कहीं ज्यादा है.

धोद स्थित अपने गांव पहुंचने के डेढ़ महीने बाद 14 मई को उनमें कोविड-19 के लक्षण प्रकट हुए. उनके परिवार ने उन्हें सांस लेने में दिक्कत होने पर सीकर के सरकारी अस्पताल में भर्ती करवाया. 16 मई को उनकी कोविड रिपोर्ट पॉजिटिव आई और अगले दिन वे गुजर गए.

उनके भाई जीतू सिंह ने द रिपोर्टर्स कलेक्टिव से बात करते हुए कहा, ‘यह सब बहुत ही अचानक हुआ.’ लेकिन श्रवण की गिनती कोविड से होने वाली आधिकारिक मौतों में नहीं की गई, जबकि उनकी मृत्यु सरकारी अस्पताल में इस संक्रमण से हुई थी.

जीतू ने बताया, ‘मेरे भाई के मृत्यु प्रमाण-पत्र पर मृत्यु का कारण दर्ज नहीं था. हमें अस्पताल से ऐसा कोई कागज नहीं दिया गया, जिससे यह पता चलता कि मेरे भाई की मौत कोविड से हुई.’

चूंकि कोविड पॉजिटिव रिपोर्ट के आने के बावजूद कोविड-19 को उनकी मौत का कारण नहीं माना गया, इसलिए उनकी पत्नी रीना राठौड़ कोविड-19 के मृतकों की विधवाओं के लिए राज्य सरकार द्वारा घोषित एक लाख रुपये की मदद की पात्र नहीं हो पाईं.

इस योजना की घोषणा जून, 2021 में की गई थी. मुख्यमंत्री की ‘कोरोना सहायता योजना’ के लिए आनेवाले आवेदनों की छंटनी का काम ग्राम पंचायत करती है. ग्राम पंचायत द्वारा परिवार को बताया गया कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में श्रवण के कोविड-19 से संक्रमित होने को लेकर कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कोविड-19 से मरने वाले सभी व्यक्तियों के परिजनों को 50,000 रुपये का मुआवजा देने का वादा किया था. राठौड़ इस मुआवजे की पात्र हो सकती थीं. इसके पात्र लोगों में वे सब शामिल थे, जिनकी मृत्यु टेस्ट में कोविड पॉजिटिव आने या क्लीनिकल तौर पर नोवेल कोरोना वायरस की पुष्टि होने के 30 दिनों के भीतर हो गई थी.

हालांकि, राज्य सरकार ने प्रमाण-पत्र दिलाने के लिए हर जिले में शिकायत निपटारा समितियों का गठन किया है, लेकिन सिंह के परिवार को इसकी प्रक्रिया के बारे में जानकारी नहीं है.

द रिपोर्टर्स कलेक्टिव  द्वारा देशभर के जिलों से जमा किए गए मृत्यु रजिस्ट्रेशन के आंकड़ों से जानकारी मिलती है कि सिंह अकेले नहीं हैं. वे उन लाखों लोगों में शामिल हैं, जिनकी मृत्यु को कोविड से होने वाली मृत्यु के आधिकारिक आंकड़ों में नहीं गिना गया था.

मृत्यु के आंकड़े को छिपाने के पीछे मंशा संभवतः महामारी के कुप्रबंधन के आरोपों से बचने की रही हो. हालांकि, सर्वोच्च न्यायाल के दबाव में कोविड से होने वाली मृत्यु की सरकारी परिभाषा में बदलाव हो सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हजारों मामलों में कोविड-मृत्यु के आधिकारिक रिकॉर्ड या जरूरी कागजात की गैरमौजूदगी या अफसरशाही के मकड़जाल के कारण मुआवजे का दावा खारिज हो सकता है.

द रिपोर्टर्स कलेक्टिव  ने आधिकारिक आंकड़ों के अतिरिक्त मृत्यु की गणना करने के लिए राजस्थान, झारखंड और आंध्र प्रदेश का चुनाव किया. इसके तहत रिपोर्ट न की गई मौतों की संख्या का पता लगाने के लिए महामारी के दौरान हुई सभी मौतों की तुलना सामान्य साल में होने वाली मौतों से की गई.

हालांकि, सामान्य से ज्यादा होने वाली सभी मौतों का कारण कोरोना को नहीं माना जा सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कई मौतों के पीछे एक कारण कोविड-19 हो सकता है.

तीन राज्यों में मार्च, 2020 से जून, 2021 के बीच 2019 के उन्हीं महीनों की तुलना में 3,59,496 अतिरिक्त मौतें दर्ज की गईं. इसका अर्थ है कि भारत की 13 फीसदी आबादी में हुई (आधिकारिक से) अतिरिक्त मृत्यु लगभग आईसलैंड की जनसंख्या के बराबर थी- जबकि केंद्र सरकार के हिसाब से 4 जनवरी तक (सिर्फ) 4,82,107 मृत्यु ही हुई है.

जनवरी तक इन राज्यों में कोविड-19 से हुई मृत्यु का आधिकारिक आंकड़ा 28,609 था. हमारे आकलन के अनुसार सिर्फ इनके परिवारों को कुल 140 करोड़ रुपये मुआवजा मिलना चाहिए. अगर हम सभी अतिरिक्त मौतों को वास्तव में कोविड से हुई मौतें मानें तो यह रकम कई गुना हो जाएगी.

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