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क्यों पूरे देश में फ़सलों का एक न्यूनतम समर्थन मूल्य होने से किसानों का नुकसान है

-द वायर,

केंद्र सरकार ने हाल ही में रबी सीजन 2020-21 के लिए धान, ज्वार, बाजरा, मक्का समेत विभिन्न फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय कर दिया है.

सरकार का दावा है कि उसने लागत का डेढ़ गुना एमएसपी निर्धारित किया है, हालांकि हकीकत ये है कि मोदी सरकार ने कम लागत मूल्य के आधार पर एमएसपी तय की है.

स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, किसानों को सी2 लागत पर डेढ़ गुना दाम मिलना चाहिए, जिसमें खेती के सभी आयामों जैसे कि खाद, पानी, बीज के मूल्य के साथ-साथ परिवार की मजदूरी, स्वामित्व वाली जमीन का किराया मूल्य और निश्चित पूंजी पर ब्याज मूल्य भी शामिल किया जाता है.

हालांकि सरकार ए2+एफएल लागत के आधार पर डेढ़ गुना एमएसपी दे रही है, जिसमें पट्टे पर ली गई भूमि का किराया मूल्य, सभी कैश लेन-देन और किसान द्वारा किए गए भुगतान समेत परिवार श्रम मूल्य तो शामिल होता है, लेकिन इसमें स्वामित्व वाली जमीन का किराया मूल्य और निश्चित पूंजी पर ब्याज मूल्य शामिल नहीं होता है.

ए2+एफएल लागत सी2 लागत से काफी कम होता है, नतीजतन इसके आधार पर तय की गई एमएसपी भी कम होती है.

लेकिन ये समस्या यहीं पर नहीं रुकती है. कई राज्यों के किसानों के लिए ए2+एफएल लागत पर भी डेढ़ गुना एमएसपी निर्धारित नहीं की जाती है. इसकी प्रमुख वजह केंद्र सरकार की एमएसपी निर्धारण की नीति है.

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अधीन संस्था कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) फसल लागत का आकलन और न्यूनतम समर्थन मूल्य को सिफारिश करने का काम करती है. सीएसीपी सभी राज्यों की फसल लागत का औसत निकालकर उसके आधार पर एमएसपी तय करती है. इसके कारण कुछ राज्यों को लागत की तुलना में ज्यादा दाम मिलता है और कुछ को कम.

इस मामले पर गंभीर चिंता जाहिर करते हुए भाजपा शासित समेत विभिन्न राज्यों ने पिछले साल रबी सीजन के फसलों की एमएसपी निर्धारित करते वक्त कृषि मंत्रालय पत्र लिखा था और राज्य-वार लागत के हिसाब से एमएसपी निर्धारित करने की मांग की थी.

सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत प्राप्त किए गए दस्तावेजों से पता चलता है कि छत्तीसगढ़, हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पुदुचेरी, तमिलनाडु, ओडिशा और कर्नाटक सरकार ने खरीफ सीजन 2019-20 के लिए केंद्र द्वारा निर्धारित एमएसपी पर असहमति जताई थी.

राज्यों ने उनके यहां की उत्पादन लागत के हिसाब से समर्थन मूल्य तय करने की सिफ़ारिश की थी, लेकिन केंद्र ने सभी प्रस्तावों को खारिज कर दिया था.

धान के सबसे बड़े उत्पादक राज्य पश्चिम बंगाल ने केंद्रीय कृषि सचिव संजय अग्रवाल के पत्र का जवाब देते हुए कहा था कि राज्य सरकार के आकलन के आधार एमएसपी और अधिक होनी चाहिए. पिछले साल धान की एमएसपी 1,815 रुपये तय की गई थी, जबकि राज्य सरकार ने इसे 2,100 रुपये करने को कहा था.

राज्य के संयुक्त सचिव जितेंद्र रॉय ने आठ मई 2019 को भेजे अपने पत्र में कहा, ‘पश्चिम बंगाल के श्रम विभाग द्वारा तय की गई न्यूनतम मजदूरी को ध्यान में रखते हुए 2017-18 के दौरान धान की लागत का सी2 मूल्य 1,751 रुपये था. चूंकि अब लागत में शामिल विभिन्न चीजों और लेबर चार्ज में औसत 9 फीसदी की बढ़ोतरी आई है, इसलिए 2019-20 सीजन के दौरान राज्य में धान की सी2 लागत की अनुमानित राशि 1,909 रुपये है.’

मालूम हो कि फसल लागत में शामिल लेबर चार्ज, परिवार की मजदूरी, परिवहन खर्च, सिंचाई खर्च, खाद-बीज व्यय, ब्याज इत्यादि राज्य-वार अलग-अलग होते हैं, जिसके कारण लागत मूल्य में भी काफी अंतर रहता है.

छत्तीसगढ़ सरकार ने भी तीन मई 2019 को भेजे अपने तीन पेज के पत्र में राज्य की खरीफ फसलों की लागत का विस्तार से गणना करते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने के लिए कहा था.

राज्य ने श्रम पर व्यय, ऋणों पर ब्याज, लगान भूमि भाड़ा, रखवाली पर व्यय, परिवहन पर व्यय, बीज पर खर्च, जैविक खाद पर व्यय, दवाई उपचार पर व्यय, यंत्र औजारों पर मरम्मत पर व्यय, जुताई, सिंचाई, निराई-गुड़ाई पर पारिश्रमिक खर्च समेत कई बिंदुओं को शामिल करते हुए प्रदेश में लागत की स्थिति बयां की थी.

देवेंद्र फड़णवीस की अगुवाई वाली महाराष्ट्र की तत्कालीन भाजपा-शिवसेना सरकार ने भी कहा था कि राज्य सरकार द्वारा सिफारिश की गई लागत के आधार पर एमएसपी तय नहीं की गई है और उन्होंने एमएसपी बढ़ाने की मांग की थी.

खास बात ये है कि राज्य सरकार की लागत के आधार पर सिफारिश की गई एमएसपी और केंद्र द्वारा निर्धारित एमएसपी में बहुत ज्यादा अंतर है.

उदाहरण के तौर पर साल 2019 में केंद्र ने धान की एमएसपी 1,815 रुपये निर्धारित की थी जबकि महाराष्ट्र ने इसकी एमएसपी 3,921 रुपये तय करने के लिए कहा था. इसी तरह बाजरा की एमएसपी 2,000 रुपये तय की गई थी जबकि राज्य ने इसे 4,002 रुपये निर्धारित करने को कहा था. ज्वार की एमएसपी केंद्र ने 2,550 रुपये तय की थी जबकि राज्य सरकार ने इसे 3,628 रुपये करने को कहा था.

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