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दिल्ली दंगा: सरकार के मदद के आश्वासनों के बाद पीड़ितों को मिला 10 फीसदी से भी कम मुआवज़ा

-द वायर,

उत्तर पूर्वी दिल्ली का मौजपुर चौक इलाका पहले की ही तरह सामान्य होकर अपनी धुन में चल रहा है. सड़कें हर समय गाड़ियों से भरी रहती हैं, चारों तरफ हॉर्न का शोर सुनाई देता है और बजबजाते लंबे नाले से लगातार दुर्गंध आती रहती है. ज्यादातर बिहार और उत्तर प्रदेश से आए लोग यहां की संकरी गलियों में किसी तरह अपने जीवन की गाड़ी खींच रहे हैं.

ऊपर से देखकर ऐसा नहीं लगता है कि एक साल पहले यहां हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे हुए थे, लेकिन इससे पीड़ित हुए लोगों के घाव अब भी हरे हैं.

इनकी दास्तां सरकारी दावों को उसी तरह आईना दिखाते हैं, जिस तरह मौजपुर का मेट्रो स्टेशन है, जो ऊपर से खूब चमचमाता रहता है, लेकिन जिस पिलर पर ये खड़ा है उसकी नींव यहां के एक नाले में है.

मेट्रो से करीब 200 मीटर की दूरी पर सुबह 10 बजे मोहम्मद रफी अपनी पुराने कपड़ों की दुकान खोलते हैं, लेकिन उनमें कोई उत्साह नहीं है और वे थके-हारे से लगते हैं. उनके माथे पर शिकन और डबडबाई आंखों से उनकी तकलीफों का अंदाजा लगाया जा सकता है.

‘जब पहली बार अपनी जली हुई दुकान देखा तो पैरों के नीचे से जमीन निकल गई, ऐसा लगा कि जैसे हम खुद कब्र में हैं, हमारी जिंदगी भर की कमाई, 25 साल की मेहनत एक दंगे में खत्म हो गई,’ अपनी भरी हुई आंखों और कांपते होठों से रफी ने ये कहा.

पिछले साल 24 फरवरी को सांप्रदायिक दंगे के दौरान मोहम्मद शफीक की दो मंजिला दुकान को उपद्रवियों ने जला दिया था. इसे उनके पिता ने 25 साल पहले उन्हें तोहफे में दिया था.

वे कहते हैं कि ये बात अब भी उनकी समझ से बाहर है कि आखिर कैसे और क्यों यहां पर दंगा हुआ. उन्होंने बताया, ’23 फरवरी को यहां दंगा शुरू हो गया था. हम सभी डरकर अपनी दुकान बंद करके अपने घरों में बैठ गए थे. तभी अगले दिन दोपहर में किसी ने कॉल किया कि मेरी दुकान में आग लगा दी गई है. मैंने और मेरे पूरे परिवार ने फायर ब्रिगेड और पुलिस को सैकड़ों कॉल किए, लेकिन कोई जवाब नहीं आया. हमारी आंखों के सामने मेरी दुकान धू-धूकर जलके खत्म हो गई, लेकिन प्रशासन ने कुछ नहीं किया.’

रफी ने आगे कहा, ‘इसके बाद केजरीवाल सरकार ने आश्वासन दिया था कि वे नुकसान की भरपाई  करेंगे. लेकिन हम भीख मांगने के लिए मजबूर हो चुके हैं, हमारी ये स्थिति हो चुकी है कि कर्ज देने वाले लोग परेशान करते रहते हैं. मेरे ऊपर साढ़े चार लाख का कर्जा हुआ है, लेकिन नहीं चुका पा रहा हूं.‘

मोहम्मद रफी का दावा है कि दंगे में उनका 12 लाख का नुकसान हुआ है, लेकिन दिल्ली सरकार ने उन्हें सिर्फ 51,700 रुपये पकड़ाकर मामले को रफा दफा कर दिया.

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