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जब दिशा रवि और नवदीप कौर पत्रकारिता की एक कक्षा में पहुंचीं

-न्यूजक्लिक,

हम एक ऑनलाइन क्लासरूम में बैठे हुए थे, जिसमें भारत के अलग-अलग हिस्सों से ताल्लुक रखने वाले करीब़ 20 छात्र मौजूद थे। यहां हम मीडिया में नई अवधारणाओं और तकनीकों के साथ-साथ जीवन की वास्तविकताओं को समझने की कोशिश कर रहे थे। परंपरागत ढंग से पढ़ाने के बजाए बेहतर होता है कि पाठ योजना को हम सवाल-जवाब के विमर्श में बदल लें। मैंने छात्रों से पूछा, "पत्रकारों के लिए टूलकिट क्या होती है?" इसके बाद माहौल में चुप्पी और तनाव छा गया। थोड़ी देर बाद आईं कुछ टिप्पणियां इस तरह थीं-
"क्या कहा मैडम?"
"क्या आपने-आपने अभी-अभी ‘T’ से शुरू होने वाला वह शब्द कहा?"
“अगर कोई हमारी निगरानी रख रहा होगा तो क्या होगा?"
"क्या हम यह शब्द बोल सकते हैं, या फिर इस शब्द के उपयोग के लिए हमें पहचानकर जिम्मेदार ठहराया जाएगा?"
दिशा रवि पर एक सोशल मीडिया "टूलकिट" का संपादन करने का आरोप है। इस टूलकिट को बाद में अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने भी ट्वीट किया था। 22 साल की दिशा रवि को एक हफ़्ते तक जेल में रहना पड़ा। सरकार ने यहां यह हर मायने में हद से आगे जाते हुए कार्रवाई की थी। इसका मक़सद भारत के युवा लोगों, खासकर अंग्रेजी बोलने वाले युवाओं में संदेश पहुंचाना था। 

मुख्यधारा की मीडिया ने दिशा रवि की "टूलकिट" केस में जिस तरीके से छवि खराब की, उससे रवि की तरह के कई युवा चुप रहने पर मजबूर हुए होंगे। इसका प्रभाव सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी दिखाई दिया, जिसका इस्तेमाल यह युवा अपने विचार व्यक्त करने और मुद्दों को उठाने के लिए करते हैं। 
अगर दिशा रवि चाहतीं, तो वो भी इस क्लासरूम का हिस्सा हो सकती थीं। वह क्लास में मौजूद किसी बच्चे की तरह ही है- अंग्रेजी बोलने वाली, हाल में कॉलेज से बाहर निकली, टीशर्ट और जैकेट पहनने वाली, पर्यावरण मुद्दों को उठाने वाली, तख़्तियों पर नारे लिखने वाली और सड़कों पर होने वाले प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाली।

अगर इस क्लासरूम में मौजूद किसी छात्र ने नए भारत में मौजूद सत्ता का विरोध किया होता, तो वो भी दिशा रवि की जगह हो सकता था। पिछले कुछ महीनों में इन लोगों को मीडिया से जुड़े जो भी काम मिले हैं, उनमें से एक तिहाई किसान आंदोलन के आयामों और उससे जुड़े लोगों के बारे में रहे हैं। यह लोग बोलना सीख रहे हैं, यह लोग मुख्यधारा की मीडिया द्वारा दिखाए जाने वाले और ना दिखाए जाने वाले तथ्यों के अंतर के साथ-साथ मीडिया स्वामित्व और ख़बरो के चयन का तरीका भी समझ रहे हैं। यह लोग मीडिया की किसी मुद्दे को बढ़ाने की ताकत से भी रूबरू हो रहे हैं।

हां, पत्रकारों के लिए टूलकिट। जो लोग कई सालों से पत्रकार हैं, वो आसानी से इसे समझ सकते हैं। पत्रकारों की टूलकिट में ठीक-ठाक स्तर का संशयवाद, व्यक्तिगत और पेशेवर सम्मान, दिमागी आज़ादी, न्याय, संवैधानिक मूल्यों के प्रति जागरुकता, नागरिकों के लिए सबसे ज़्यादा जरूरी जानकारी पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता, सच कहने की प्रबल इच्छा (खासकर सत्ता से) और अपनी कहानी को लिखने या बोलने की अच्छी क्षमता शामिल होती है।

पत्रकार अपनी टूलकिट को नौकरी के दौरान पुख्ता करते हैं और उसमें नई क्षमताएं जोड़ेते हैं। वे अपने काम के मुताबिक़ टूलकिट की सामग्री को जमाते हैं, लेकिन टूलकिट के मूल में मौजूद तत्व शायद ही कभी बदलते हों। जो लोग इन मूल तत्वों को बदल देते हैं, जैसे सत्ता से सच बोलने की इच्छा, वे खुद को पत्रकार बुलाना जारी रख सकते हैं, लेकिन इन लोगों की पहचान सत्ता में बैठे लोगों के प्रचार-प्रबंधकों की होती है।

‘पत्रकारों की टूलकिट’ विषय पर कक्षाओं में निश्चित तौर पर विमर्श होना चाहिए और इसे सिखाना चाहिए। कई सालों से ऐसा ही होता आया है। लेकिन अब कोई इस टूलकिट का इस्तेमाल कैसे करे, जब यह शब्द ही विवादित हो गया है? जब भी मीडिया रवि के बारे में बात करता है, तो जानबूझकर या बिना सोचे समझे "टूलकिट गैंग", "टूलकिट केस" और "टूलकिट विवाद" जैसे वाक्यांशों का उपयोग करता है। एक गैर-नुकसानदेह शब्द को गलत भावनाओं के साथ जोड़ दिया गया है, यह वह गुण है जो किसी पत्रकार की टूलकिट में नहीं होना चाहिए।

हां यह जरूर है कि गैर-नुकसानदेह “टूलकिट” को 26 जनवरी की हिंसा के साथ नहीं जोड़ा गया था। ऐसा किया भी नहीं जा सकता था, लेकिन वह दूसरी कहानी है। कोई कथित पत्रकार सुधीर चौधरी को क्या कहे, जिन्होंने अपने प्राइमटाइम शो में इस शब्द को बदनाम किया और कुछ भारतीयों को "टूलकिट गैंग" कहकर संबोधित किया? जबकि इनकी खुद की "पत्रकारिता" बेहद निंदनीय है?

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