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यूपी का अगस्त : बच्चों का काल, फिरोजाबाद और आस-पास डेंगू और संक्रामक बीमारी का प्रकोप

-डाउन टू अर्थ, 

"अगस्त के महीने में बच्चे मरते ही हैं।" उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने सरकार बनने के बाद ही यह विवादित बयान 2017 में दिया था, जब गोरखपुर में 30 से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई थी। इत्तेफाक से सरकार का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने को है और 2021 के अगस्त महीने में ही फिरोजाबाद में आधिकारिक तौर पर 36 बच्चों और 5 व्यस्क लोगों की जान बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में वायरल और डेंगू बुखार के कारण चली गई। 
 
मेरा छह बरस का भतीजा भी बेहतर इलाज के अभाव में मर गया। फिरोजाबाद के सुदामा नगर बस्ती में टैंपू चलाने वाले रंजीत सरिता डाउन टू अर्थ से बताते हैं कि जब उनके भतीजे की मृत्यु हुई तो पिता जेल में थे। वह बताते हैं कि 24 अगस्त को उसको बुखार आया था। बुखार काफी हल्का था तो लोकल में ही एक डॉक्टर से पूछकर दवा ले लिया। फिर 26 तारीख को उसके पेट में काफी दर्द हुआ। फिरोजाबाद मेडिकल कॉलेज पहुंचे तो वहां कहा गया कि बेड खाली नहीं है। इसके बाद फिरोजाबाद सिटी हॉस्पिटल (प्राइवेट अस्पताल ) में 27 अगस्त को भर्ती कराया। एक दिन का खर्चा 30 हजार रुपए लिया फिर जवाब दिया कि बच्चे की हालत खराब हो गई है इसे कहीं और ले जाएं। 28 अगस्त को बच्चे ने दम तोड़ दिया। रंजीत ने बताया कि उनके मोहल्ले में और भी बच्चों ने दम तोड़ा है। सभी में डेंगू की पहचान हुई थी। 
 
स्थानीय स्वतंत्र पत्रकार जिज्ञासु तिवारी ने डाउन टू अर्थ को जानकारी दी कि सिर्फ बच्चे ही नहीं व्यस्क भी बुखार वाली बीमारी के शिकार हो रहे हैं। फिरोजाबाद जिला मुख्यालय से 8 किलोमीटर दूर नारखी ब्लॉक के नगला अमान गांव में 25 अगस्त को हरिशंकर की मां मोहनदेवी को बुखार आया था। नजदीक के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जाटऊ पर चिकित्सक नहीं मिले। इसके बाद 26 अगस्त को उनकी हालत बिगड़ गई और उन्हें फिरोजाबाद ट्रामा सेंटर ले जाया गया। 27 अगस्त को उनकी मृत्यु हो गई।
 
स्थानीय पत्रकार सौरभ शर्मा बताते हैं कि गांव में बीमार पड़ने वाले कई बच्चों और दर्जनों परिवारों को ऐसी ही परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। कुछ लोगों को प्राइवेट अस्पतालों की तरफ जाने के लिए मजबूर होकर जाना पड़ा। क्योंकि जिले के अस्पतालों में बेड हासिल करना कोविड के समय उभरी चुनौती की तरह बन गया था। इसीलिए लोग प्राइवेट अस्पतालों की तरफ कूच कर रहे हैं। 
 
कोविड प्रोटोकॉल के बावजूद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर ताला बंद था। जिज्ञासु बताते हैं कि 25 अगस्त के आस-पास वहां के झोला छाप चिकित्सकों ने बीमार लोगों के घरों को ही चिकित्सा केंद्र बना दिया। कतारों में चारपाई लगाकर लोगों को ग्लूकोज की बोतलें चढ़ाई जा रही थीं। इसीलिए 30 अगस्त को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी को वहां के जिलाधिकारी ने हटा दिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दौरे के बाद इसके बाद गांव के नजदीक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का ताला खोला गया। अब सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर 30 बेड का अस्पताल बनाया गया है। 
 
वहीं, एक सितंबर को आगरा मंडल के अपर निदेशक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं एके सिंह ने फिरोजाबाद में मृत्यु की संख्या का ऑडिट करने के बाद कहा कि कुल 41 लोगों की मृत्यु हुई है। इनमें प्रमुखता से (36) बच्चे हैं। लेकिन स्थानीय जनप्रतिनिधि मृत्यु के इस आंकड़ों पर सवाल उठ रहे हैं। 
 
प्रेस वार्ता में भी बताया गया कि लोगों ने झोला छाप डॉक्टर से इलाज कराया, इस वजह से कुछ मामलों की स्थिति बिगड़ गई। वहीं, तीसरी कोविड लहर की आशंका के बीच बच्चों और व्यस्कों में बुखार और बीमारी की वजह को लेकर ढेर सारे कयास लग रहे हैं।
 
समुचित स्वास्थ्य सेवाओं के न होने के कारण ही इस वक्त दूसरे जिलों से पहुंचे हुए डॉक्टर्स की टीम स्थितियों को संभालने के लिए काम कर रही हैं। 15 डॉक्टर्स की टीम इस वक्त जिले में बच्चों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए मौजूद है। 
 
डीएम के जरिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी को पहले हटाया गया, बाद में 1 सितंबर को जिले की मुख्य चिकित्सा अधिकारी का भी तबादला कर दिया गया। वरिष्ठ अधिकारियों ने यह स्वीकार किया कि शुरुआत में स्वास्थ्य विभाग की ओर से लापरवाही बरती गई, जिसकी वजह से स्थितियां भयावह हुईं।  
 
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से 1 सितंबर को जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि आईसीएमआर की 11 सदस्यीय टीम ने फिरोजाबाद पहुंचकर नमूनों की जांच की जिसकी प्राथमिक रिपोर्ट में कोविड की पुष्टि नहीं हुई है। अगर यह कोविड नहीं है तो क्या यह वाकई एक रहस्यमयी बुखार के तहत हुआ?
 
स्वायत्त राज्य चिकित्सा कॉलेज (एएसएमसी)  फिरोजाबाद की प्रिंसिपल और डीन डॉक्टर संगीता अनेजा ने डाउन टू अर्थ को बताया कि रहस्यमयी कुछ भी नहीं है। फिरोजाबाद और मथुरा व आस-पास के जिलों से जो सैंपल राजधानी लखनऊ के आईसीएमआर में जांच के लिए भेजे गए थे, उनमें  डेंगू, लेप्टोस्पायरोसिस और स्क्रब टाइफस की पुष्टि हुई है। यह सभी बेहतर तरीके से पहचानी हुई बीमारियां हैं। बीमार पड़ने वालों में बच्चों में 1 वर्ष से लेकर 16 वर्ष तक के किशोर शामिल हैं। 
 
लेप्टोस्पायरोसिस जानवरों के स्लाइवा को छोड़कर इंफेक्टेड यूरिन या अन्य फ्लूज के पानी या मिट्टी में मिलने से संपर्क में आने के कारण हो सकता है। या मिट्टी या पानी में इंफेक्टेड बैक्टीरिया के कारण भी यह रोग हो सकता है। 

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