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किसान आंदोलन: हक लेने का हौसला

-आउटलुक,

“प्रतिकूल मौसम, साथियों की मौतें भी किसानों के हौसले पस्त करने में नाकाम, किसानों की एकता ने गाढ़ी की सरकार की चिंता”
हाड़ कंपाती ठंड और कई दिनों की बारिश के बीच राजधानी दिल्ली की सीमा पर हर ओर तकरीबन पांच-छह मोर्चे पर डटे किसान आंदोलन को लगातार तेज करते जा रहे हैं। सरकार बातचीत के तकरीबन आठ दौर संपन्न होने के बाद भी किसानों को नए कृषि कानूनों के पक्ष या कुछ संशोधन पर मनाने में नाकाम रही। किसान सितंबर 2019 में पारित हुए तीनों विवादास्पद कृषि कानूनों को खारिज करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी स्वरूप देने पर अड़े हैं। इन दो प्रमुख मांगों को लेकर किसान संगठनों की 4 जनवरी को केंद्रीय मंत्रियों के साथ हुई आठवें दौर की बेनतीजा बातचीत से संकेत है कि सरकार इन दोनों मांगों पर हां कहने को तैयार नहीं है। बातचीत जारी है क्योंकि कोई भी पक्ष यह नहीं चाहता कि उस पर पीछे हटने की तोहमत लगे। लेकिन सरकार के रवैए और किसानों के कड़े होते तेवर से टकराव के आसार बन रहे हैं।

उधर, सरकार के लिए यह सिर्फ नाक का सवाल ही नहीं है, बल्कि ऐसा लगता है कि वह देश के मात्र 6 फीसदी किसानों से गेहूं, धान, दलहन और तिलहन की एमएसपी पर खरीद और सार्वजनिक वितरण प्रणाली से भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) पर सालाना डेढ़ लाख करोड़ रुपये से अधिक के बोझ को हल्का करना चाहती है। इसलिए सरकार की योजना कृषि व्यापार में कॉरपोरेट का हस्तक्षेप बढ़ाकर इस क्षेत्र से भी पल्ला झाड़ने की लगती है। कृषि कानून बनाने वाली टीम में हिस्सा रहे एक कृषि अर्थशास्त्री नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहते हैं, “सरकार का एजेंडा चरणबद्ध तरीके से एमएसपी पर सरकारी खरीद को खत्म करने की है इसलिए कृषि कानून में किसानों के लिए खुला बाजार बढ़ाने पर जोर दिया गया है।” उनका कहना है कि केंद्रीय पूल में एफसीआइ के पास गेहूं और चावल का स्टॉक जरूरत से करीब साढ़े तीन गुना अधिक है। 250 लाख टन जरूरी बफर स्टॉक की तुलना में 700 लाख टन गेहूं और चावल एफसीआइ गोदामों में है। ऐसे में एमएसपी न देने और अनाज न खरीदने का दबाव साल दर साल बढ़ता जा रहा है।

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