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जायज नहीं किसान आंदोलन पर बेहिसाब उम्मीदों का बोझ लादना

-कारवां,

साल भर से भी ज्यादा समय हो गया है नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा तीन कृषि कानूनों को पारित किए हुए. लेकिन उनके खिलाफ जारी प्रतिरोध आंदोलन आज के भारत में एक व्यापक और सतत विरोध आंदोलनों में से एक रहा है. अपनी व्यापकता और दृढ़ता के साथ यह आंदोलन विभिन्न समूहों के लिए उम्मीद की किरण लेकर आया और इससे सभी की अपनी-अपनी उम्मीदें रही हैं. इनमें से कई तो उन मुद्दों से संबंधित हैं जो कभी भी आंदोलन का हिस्सा नहीं थे. सरकार की विराट प्रचार मशीनरी, जिसमें मुख्यधारा की लगभग सारी मीडिया शामिल है, ने इन उम्मीदों को हवा दी और हर गलती को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया और आंदोलन और सहभागी समूहों के बीच दरार को चौड़ा करने का काम किया. इसने आंदोलनों को ऐसी कसौटी पर रख दिया जिसे अमल में लाना मुमिकन ही नहीं है.

सिंघु बॉर्डर पर लखबीर सिंह की लिंचिंग ने एक बार फिर जाति के मुद्दे सहित इन मुद्दों को तेजी से फोकस में ला दिया है. खबरों के मुताबिक सिख धर्म में धर्मान्तरित दलित समुदाय के लखबीर को अक्टूबर में निहंग सिखों ने काटकर हत्या कर दी. उस पर एक धार्मिक किताब की बेअदबी का आरोप लगाया गया था.

इस घटना को ध्यान में रखते हुए इस बात को फिर से दोहराना बेहतर होगा कि यह आंदोलन किसका प्रतिनिधित्व करता है. इसके निशाने पर नए कानूनों के तहत प्रस्तावित कृषि का निगमीकरण है जिसके प्रभाव पर मैंने इस पत्रिका के मार्च अंक में विस्तार से चर्चा की है. इन कानूनों को उन क्षेत्रों में सबसे मजबूत चुनौती का सामना करना पड़ा है जहां सरकारी खरीद के मौजूदा मॉडल के तहत कृषि संगठित और टिकाऊ है, जो किसानों को एक मामूली वित्तीय सुरक्षा देती है. मोटे तौर पर पंजाब से पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैली इस बेल्ट में जमीन पर बड़े पैमाने पर जट्ट सिख और हिंदू जाट किसानों का मालिकाना है और वही खेती भी करते हैं. इन्होंने हरित क्रांति के दौरान सरकारी प्रोत्साहनों को सबसे बेहतर ढंग से अपनाया.

जमीन के मालिकाने और सत्ता में जातीय असमानताएं इन क्षेत्रों में भी सामाजिक संबंध की भारतीय हकीकत को दर्शाती हैं. किसान आंदोलन का कैडर न तो ऐसी सामाजिक वास्तविकता से है जो विश्वमानव होने के करीब हो और न ही इस हकीकत को बदलने के नजरिए से आंदोलन कर रहा है. जो बात आंदोलनकारियों को साथ लाती है वह यह अहसास है कि नए कानूनों के जरिए पेश किया गया वैकल्पिक आर्थिक मॉडल मौजूदा हालात से भी बदतर है. खासकर जट्ट और जाट किसानों के लिए और क्योंकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था इन्हीं की कमाई पर टिकी है तो पूरे ग्रामीण समुदायों के लिए. बिहार जैसे राज्यों की स्थिति से इस तबाही का अंदेशा हो जाता है जहां इन कानूनों का एक रूप दशक भर से ज्यादा समय से विनाशकारी नतीजों के बावजूद लागू है.

आंदोलन का नेतृत्व काफी हद तक इसी पृष्ठभूमि से है, भले ही उनकी वैचारिक और धार्मिक प्रेरणाएं अलग-अलग हैं. आंदोलन के प्रमुख समर्थन क्षेत्र, पंजाब के ज्यादातर आंदोलन के नेता इस इलाके में रही वामपंथी सक्रियता की लंबी परंपरा से आते हैं जो आर्थिक असमानता की धुन में सधे देश के बाकी वामपंथियों की तरह जाति की हकीकत से प्रभावी ढंग से निपटने में विफल रहे थे. हालांकि आंदोलन के नेतृत्व ने किसी भी अन्य की तुलना में, दूसरे समुदायों तक पहुंचने की कोशिश की है. यह नेतृत्व काफी हद तक जट्ट सिखों से बना है. पंजाब से अलग आंदोलन के एकमात्र प्रमुख नेता राकेश टिकैत हैं जो भारतीय किसान यूनियन के जरिए अपने पिता की विरासत पर टिके हैं जो जाट खाप के लोकाचार पर आधारित है.

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