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फसल बीमा योजना की सफलता के गान के बीच निजी कंपनियों ने ख़ारिज किए 75 फीसदी दावे

-द वायर,

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे देशव्यापी आंदोलन के मद्देनजर अपनी सरकार को ‘किसान हितैषी’ दिखाने के एजेंडा के तहत 13 जनवरी को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) का गुणगान किया और योजना के पांच साल पूरा होने को लेकर किसानों को बधाई दी थी.

अपने एक ट्वीट में उन्होंने दावा किया कि इस योजना ने प्रकृति के प्रकोप से किसानों को बचाया है और करोड़ों किसानों को लाभ पहुंचाया है. इसी तरह नैनीताल के एक किसान खीमानंद पांडे के पत्र का जवाब देते हुए मोदी ने कहा कि फसल बीमा योजना के तहत दावा निपटारे की पारदर्शी प्रक्रिया, किसानों के कल्याण के लिए उनकी कोशिशों को दर्शाता है.

हालांकि आधिकारिक दस्तावेज दर्शाते हैं कि किसानों द्वारा दायर किए गए फसल बीमा दावों को खारिज करने की संख्या में नौ गुना की बढ़ोतरी हुई है. इसमें से 75 फीसदी से अधिक दावे प्राइवेट कंपनियों द्वारा खारिज किए गए हैं.

आलम ये है कि बीमा कंपनी एचडीएफसी एर्गो ने कम से कम 86 फीसदी और टाटा एआईजी ने किसानों द्वारा दायर किए गए 90 फीसदी से अधिक दावों को खारिज कर दिया. वहीं रिलायंस जनरल ने 61 फीसदी से अधिक और यूनिवर्सल सोम्पो ने 72 फीसदी से अधिक फसल बीमा दावों को खारिज किया है.

द वायर  द्वारा सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत प्राप्त किए गए दस्तावेजों के तहत ये जानकारी सामने आई है.

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के प्रावधानों के अनुसार व्यापक स्तर पर प्रभावित करने वाली सूखा या बाढ़ जैसी प्राकृति आपदा आने पर किसानों को नुकसान का दावा करने की जरूरत नहीं पड़ती है, क्योंकि इसका आकलन उत्पादन में आई कमी के आधार पर कर लिया जाता है.

वहीं यदि छोटे स्तर पर नुकसान होता है तो इसके लिए दावा करने की अलग प्रक्रिया है. इस तरह के नुकसान स्थानीय ओलावृष्टि, भूस्खलन, सैलाब, बादल फटना या प्राकृतिक आग के चलते होती है.

ऐसी स्थिति में किसान को संबंधित बीमा कंपनी, राज्य सरकार या वित्तीय संस्थाओं को इसकी जानकारी देनी होती है, जिसके बाद राज्य सरकार और बीमा कंपनी के प्रतिनिधियों की एक संयुक्त समिति नुकसान का आकलन करती है.

हालांकि आंकड़े दर्शाते हैं कि बहुत बड़ी संख्या में इस तरह के दावों को बीमा कंपनियों द्वारा खारिज किया गया है.

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के दस्तावेजों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2016-17 से 2019-20 के बीच छोटे स्तर पर हुए नुकसान को लेकर किसानों द्वारा दायर किए गए कम से कम 13.03 लाख दावों को खारिज किया गया है. इस दौरान किसानों ने सरकारी एवं प्राइवेट कंपनियों के सामने कुल 1.02 करोड़ दावे दायर किए थे.

इसमें से 22.56 लाख दावे प्राइवेट कंपनियों के यहां दायर किए थे, जिसमें से 9.87 लाख दावे खारिज कर दिए गए. इस तरह प्राइवेट कंपनियों ने किसानों के 43.75 फीसदी दावों को खारिज कर दिया.

वहीं सरकारी बीमा कंपनियों के सामने किसानों ने इस तरह के 54.53 लाख दावे दायर किए थे, जिसमें से 3.16 लाख दावों को खारिज कर दिया गया.

दस्तावेज से यह भी पता चलता है कि जॉइंट वेंचर कंपनी एसबीआई जनरल, जिसमें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की 70 फीसदी हिस्सेदारी है, के यहां कुल 25.35 लाख दावे दायर किए गए थे और इन्होंने ने सभी का भुगतान किया है.

कुल मिलाकर देखें, तो साल 2017-18 में किसानों के 92,869 दावे, 2018-19 में 2,04,742 दावे और वित्त वर्ष 2019-20 में 9,28,870 दावों को खारिज किया गया है. मंत्रालय ने कहा है कि साल 2020-21 के लिए फसल बीमा दावों की गणना प्रक्रिया अभी चल रही है.

राज्य-वार स्थिति

इस मामले में यदि राज्य-वार आंकड़े देखें तो छोटे स्तर पर हुए नुकसान के चलते किसानों द्वारा दायर किए गए फसल बीमा दावे सबसे ज्यादा राजस्थान में खारिज किए गए हैं.

यहां 2017-18 से 2019-20 के बीच बीमा कंपनियों ने कुल 3,84,017 दावों को खारिज किया है. इसमें से 3,61,984 दावे, साल 2019-20 में ही खारिज किए गए थे.

इसके बाद दूसरे नंबर पर गुजरात है, जहां 2018-19 और 2019-20 में बीमा कंपनियों ने किसानों के 2,78,376 दावों को खारिज किया था. इसमें से 2,74,466 दावे सिर्फ 2019-20 में खारिज किए गए.

रिकॉर्ड के मुताबिक राज्य में 2017-18 में इस तरह के किसी फसल बीमा दावे को खारिज नहीं किया गया था.

तीसरे नंबर पर हरियाणा है, जहां बीमा कंपनियों ने तीन सालों में 1,96,795 फसल बीमा दावों को खारिज किया है. इसमें से 2017-18 में 22,851 दावे, 2018-19 में 83,540 दावे और 2019-20 में 90,404 बीमा दावों को खारिज किया गया था.

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